ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने टीएमसी के कुछ विधायकों और पार्षदों के साथ बैठक के बाद दस सदस्यीय राष्ट्रीय कार्य समिति का गठन किया। बागी गुट ने ममता के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को निलंबित करने की भी घोषणा की।
टीएमसी की संस्थापक ममता बनर्जी को तब एक और बड़ा झटका लगा जब इसके बागी गुट ने ममता को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा कर दी। बागी खेमे ने वरिष्ठ विधायक अरुप रॉय को नया चेयरमैन चुना है। रिपोर्टों के अनुसार बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उनकी ओर से गठित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी ही पार्टी की वैध संगठनात्मक इकाई है। इस फ़ैसले के बाद माना जा रहा है कि बागी गुट अब पार्टी का पूरा नियंत्रण लेने की कोशिश कर रहा है। बागी नेता पार्टी के चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश करने के लिए चुनाव आयोग का रुख कर सकते हैं।
तो सवाल है कि क्या बागी गुट अपनी मर्जी से पार्टी अध्यक्ष को इस तरह बदलने का फ़ैसला ले सकता है? आख़िर उन्होंने ऐसा क्या किया जिससे कि वह अपने दावे को साबित कर सकें? दरअसल, अध्यक्ष पद पर बदलाव के फ़ैसले से पहले बाग़ी गुट ने बैठक की। सोमवार शाम को कोलकाता के न्यू टाउन स्थित एक निजी होटल में बागी विधायकों, पार्षदों और पार्टी नेताओं की एक बैठक आयोजित की गई। मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि बैठक में अरूप रॉय, फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, जावेद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और अन्य कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। बताया गया कि कोलकाता, हावड़ा, मुर्शिदाबाद, बहरामपुर, उत्तरपाड़ा, श्रीरामपुर और अन्य जिलों के कई पार्षद और पूर्व जनप्रतिनिधि भी इस बैठक में शामिल हुए।
पार्टी में 'संवैधानिक संकट' का हवाला दिया
रिपोर्टों के अनुसार बैठक को संबोधित करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि पार्टी संविधान के अनुसार हर तीन वर्ष में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का पुनर्गठन होना चाहिए। इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि ऋतब्रत का दावा था कि फरवरी 2022 में बनी कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त हो चुका था, लेकिन नया संगठन नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि पार्टी संविधान का पालन नहीं होने के कारण संगठनात्मक संकट पैदा हो गया था और इसी वजह से नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी गठित करने की जरूरत पड़ी।
नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन
बैठक में सर्वसम्मति से एक नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी गठित की गई। इसके बाद अरूप रॉय को ध्वनिमत से पार्टी का चेयरमैन चुन लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार फिरहाद हकीम, अरूप विश्वास, रथीन घोष और सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान और संदीपन साहा को महासचिव बनाया गया। अखरुज्जमान अंसारी को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अलावा पार्टी के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के लिए स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त करने का भी फैसला लिया गया।ऋतब्रत के नेतृत्व में टीएमसी बागी गुट ने संगठनात्मक ढाँचे की घोषणा के तुरंत बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को निलंबित करने की भी घोषणा कर दी। माना जा रहा है कि यह कदम केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं बल्कि ममता बनर्जी परिवार के नेतृत्व को सीधी चुनौती है।
बागी गुट में कितने विधायक?
टीएमसी के इन बागी नेताओं का पहले दावा था कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से क़रीब 60 विधायक उनके साथ हैं। उनका अब कहना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में अब लगभग 65 विधायक उनके खेमे का समर्थन कर रहे हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में पार्षद भी उनके साथ हैं। कुछ सप्ताह पहले पार्टी के भीतर मतभेद तब खुलकर सामने आए थे जब अधिकांश विधायकों ने विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और ममता बनर्जी समर्थित उम्मीदवार को खारिज कर दिया था।
सांसदों ने भी कर दी बगावत
टीएमसी में अंदरूनी संकट केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संसद तक पहुँच गया है। यानी विधायकों के बाद अब टीएमसी के सांसदों ने भी बगावत कर दी है। बागी खेमे के अनुसार पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से क़रीब 20 सांसद तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल से अलग होकर नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं और उन्होंने केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को समर्थन देने का फ़ैसला किया है। यदि यह स्थिति बनी रहती है तो लोकसभा में TMC की ताकत काफी कमजोर हो सकती है।
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती
1998 में ममता बनर्जी द्वारा गठित तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी के इतिहास में इसे सबसे बड़े आंतरिक विद्रोहों में से एक माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी लगातार अंदरूनी असंतोष और नेताओं के पलायन का सामना कर रही है। अब पार्टी के संगठन, विधानसभा और संसद तीनों स्तरों पर चुनौती सामने आने से ममता बनर्जी के नेतृत्व पर दबाव बढ़ गया है।टीएमसी और इसके चुनाव चिह्न का क्या होगा?
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं बल्कि कानूनी भी हो सकती है। अभी तक ममता बनर्जी या उनकी आधिकारिक टीम की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर अधिकार को लेकर दोनों गुटों के बीच संघर्ष तेज होने की संभावना है। माना जा रहा है कि ममता खेमे से बागी गुट के इस फ़ैसले को क़ानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है।
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस पर असली नियंत्रण किसके पास रहेगा? ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला मूल गुट या ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले बागी गुट के पास?