बीजेपी सरकार उत्तराखंड, गुजरात, असम के बाद अब पश्चिम बंगाल में यूसीसी लाने की तैयारी में है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि यूसीसी का मसौदा 2 जुलाई को कैबिनेट के सामने लाया जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद अगस्त महीने में विधानसभा सत्र में समान नागरिक संहिता बिल पेश होगा। उन्होंने कहा कि कानून का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में कमेटी बनाई है।

दरअसल, बीजेपी ने 2026 के विधानसभा चुनाव में अपने 'संकल्प पत्र' में सरकार बनने के छह महीने के भीतर यूसीसी लागू करने का वादा किया था। अब सरकार उस वादे को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार ने यूसीसी का प्रारूप तैयार कर लिया है। इसे पहले कैबिनेट की मंजूरी के लिए रखा जाएगा। इसके बाद इसे विधानसभा में विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा।
ताज़ा ख़बरें
शुभेंदु ने कहा कि सरकार ने इस कानून को तैयार करने में उन राज्यों के मॉडल का अध्ययन किया है, जहां पहले ही यूसीसी लागू किया जा चुका है।

टीएमसी करेगी विरोध!

शुभेंदु सरकार के इस फ़ैसले पर टीएमसी ने कहा है कि यदि इसमें कुछ भी असंवैधानिक होगा तो वह विरोध करेगी। बंगाल विधानसभा में पेश होने वाले यूसीसी बिल पर टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने कहा, 'हम संविधान में पक्का यकीन रखते हैं। अगर कोई कानून असंवैधानिक है तो हम निश्चित रूप से उसका विरोध करेंगे। हमें यूसीसी के पीछे बीजेपी के इरादों को लेकर चिंता है। बीजेपी इन कानूनों का इस्तेमाल समुदायों के बीच नफरत फैलाने और ध्रुवीकरण करने के लिए करती है।'

रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में बनी थी समिति

इससे पहले मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि यूसीसी का मसौदा तैयार करने के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी। उन्होंने कहा था कि पश्चिम बंगाल सरकार गुजरात, उत्तराखंड और असम की प्रक्रिया का अनुसरण करेगी।

2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि सत्ता में आने के छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने भी कहा था कि पश्चिम बंगाल में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू किया जाएगा।

क्या है समान नागरिक संहिता?

समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानून लागू करना है। यदि यह क़ानून लागू होता है तो विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान कानून लागू होगा। हालांकि संविधान के तहत जिन समुदायों को विशेष छूट प्राप्त है, उनके अधिकारों को लेकर अलग प्रावधान बनाए जा सकते हैं।

किन राज्यों में पहले से लागू है UCC?

गोवा देश का एकमात्र राज्य है जहां पुर्तगाली सिविल कोड के आधार पर लंबे समय से समान नागरिक संहिता जैसी व्यवस्था लागू है। इसके अलावा आज़ाद भारत में उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बना। राज्य की बीजेपी सरकार ने इसको लागू कराया। वहां यह कानून 27 जनवरी 2025 से प्रभावी है।
गुजरात ने 24 मार्च 2026 को यूसीसी विधेयक पारित किया। इसमें शादी, लिव-इन, संपत्ति आदि में समान नियम का प्रावधान है और बहुविवाह पर प्रतिबंध है। असम ने 29 मई 2026 को यूसीसी कानून पारित कर पूर्वोत्तर का पहला राज्य बनने का दावा किया। इसमें बहुविवाह प्रतिबंधित और लिव-इन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य जैसे प्रावधान हैं। हालाँकि जनजातियों को छूट है।

अब पश्चिम बंगाल इस सूची में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में कमेटी गठित हो गई है और इस साल दिवाली तक लागू करने का लक्ष्य है। उत्तर प्रदेश में भी इरादा जताया गया है और उत्तराखंड मॉडल पर काम हो रहा है। राजस्थान में UCC ड्राफ्टिंग कमेटी गठित है। महाराष्ट्र में बिल ड्राफ्ट करने के लिए पैनल बनाया गया। छत्तीसगढ़ और हरियाणा में अध्ययन चल रहा है।
पश्चिम बंगाल से और खबरें

राजनीतिक मुद्दा बनेगा?

विपक्षी दल आरोप लगाते रहे हैं कि बीजेपी इन कानूनों का इस्तेमाल समुदायों के बीच नफरत फैलाने और ध्रुवीकरण करने के लिए करती है। इस लिहाज से पश्चिम बंगाल में यूसीसी का मुद्दा राजनीतिक रूप ले सकता है। बीजेपी लंबे समय से इसे समान अधिकार और समान कानून का विषय बताती रही है, जबकि विपक्षी दलों का कहना है कि इस मुद्दे पर सभी समुदायों से व्यापक चर्चा और सहमति जरूरी है।

यदि 2 जुलाई को कैबिनेट इस मसौदे को मंजूरी दे देती है, तो पश्चिम बंगाल विधानसभा में यूसीसी पर व्यापक बहस होने की संभावना है। इसके बाद राज्य देश का अगला ऐसा राज्य बन सकता है जहां समान नागरिक संहिता लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।