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क्या भारत के लिए चुनौती है श्रीलंका में राजपक्षे युग की वापसी?

श्रीलंका में हुए आम चुनावों में राजपक्षे युग को फिर सत्ता में आने का जनादेश मिला है। 2005 से 2015 तक श्रीलंका पर सख्ती से शासन करने वाले राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की कामयाबी का राज उनके छोटे भाई गोतबया राजपक्षे ही थे जिन्होंने रक्षा सचिव और सुरक्षा बलों के मुखिया के तौर पर श्रीलंका पर निरंकुश शासन किया और तमिल अलगाववाद को बेरहमी से कुचलने में कामयाबी पाई। इस दौरान उन्होंने श्रीलंका के मुसलिम अल्पसंख्यकों पर भी कहर ढाए, इसलिये गत सप्ताह सम्पन्न हुए इन चुनावों में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों ने साजित प्रेमदासा को वोट दिये। कोलम्बो में सात महीने पहले चर्च पर हुए आतंकवादी हमलों के पीछे मुसलिम कट्टरपंथियों का हाथ होने की वजह से भी गोतबया राजपक्षे को चुनावी हवा अपने पक्ष में करने में मदद मिली।

गोतबया राजपक्षे के राष्ट्रपति का चुनाव जीतने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें फ़ोन कर बधाई दी  है और भावी राष्ट्रपति ने भी भरोसा दिलाया है कि वह भारत के साथ रिश्तों को प्राथमिकता देंगे। लेकिन भारत के सामरिक हलकों में गोतबया राजपक्षे के इतिहास के साथ उनके चुनाव पूर्व उस बयान को जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि वह राष्ट्रपति का चुनाव जीते तो चीन के साथ पुराने रिश्ते फिर बहाल करेंगे, को भी याद किया जा रहा है। 

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वास्तव में राजपक्षे परिवार चीन का एहसानमंद है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर चीन ने ही सक्रियता से राजपक्षे शासन का बचाव किया है। इसी दौरान चीन ने श्रीलंका पर अपनी जमीनी पकड़ मजबूत बनाई और हमबनटोटा बंदरगाह और अन्य सहायक परियोजनाओं के विकास के लिये आठ अरब डालर का ठेका हासिल कर लिया। इसे चुकाने में श्रीलंका ने जब हाथ खड़े कर दिये तो चीन ने श्रीलंका से हमबनटोटा बंदरगाह और इसके आसपास की हजारों एकड़ जमीन को 99 साल की लीज पर ले लिया। 

राजपक्षे परिवार के श्रीलंका की सत्ता पर बने रहने के लिये चीन ने पिछले संसदीय चुनावों में दखलंदाजी की और इस परिवार को चुनाव जीतने के लिये वित्तीय मदद भी दी। लेकिन 2015 के चुनावों में राजपक्षे शासन का अस्थायी अंत हो गया। इससे भारत के सामरिक हलकों में राहत की सांस ली जाने लगी क्योंकि राजपक्षे शासन में  श्रीलंका ने चीन के साथ सीमा लांघ कर सुरक्षा सहयोग को गहरा किया। राजपक्षे शासन काल में ही 2015 में चीन की दो पनडुब्बियों को श्रीलंका के बंदरगाह पर ठहरने का मौका मिला था।

भारत के राजनयिक हलकों में माना जा रहा है कि पिछले साल मालदीव में चीन के पिट्ठू समझे जाने वाले वहां के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन का शासन काल समाप्त होने से हिंद महासागर में भारत को जो सामरिक लाभ मिला था, वह राजपक्षे शासन काल की वापसी से एक बार फिर चीन के पक्ष में जा सकता है। 

श्रीलंका को चीन के कर्ज जाल में फंसाने वाले राजपक्षे शासन काल के फिर बहाल होने से चीन श्रीलंका में अपने सामरिक, सुरक्षा व आर्थिक हितों की न केवल रक्षा कर सकेगा बल्कि अब वह इसे और गहराई दे सकेगा।
ऐसे चीन समर्थक श्रीलंकाई नेता के राष्ट्रपति बन जाने से भारत के लिये नई सुरक्षा चुनौती पैदा होगी। भारत की घेराबंदी के लिये हमारे इर्दगिर्द मोतियों का हार पिरोने की चीन की रणनीति श्रीलंका में राजपक्षे युग की वापसी से फिर मजबूती पकड़ेगी।

बेल्ट एंड रोड योजना को समर्थन

श्रीलंका ने चीन की बेल्ट एंड रोड योजना को समर्थन दिया है और इस नाते वह अपने देश को इस योजना में शामिल करने के लिये अपने सागरीय इलाक़े को चीन के पोतों की आवाजाही के लिये बेहतर सुविधाएं देने को तैयार होगा। इस तरह श्रीलंका चीन के साथ दोस्ती गहरी करने के लिये जायज बहाने खोजेगा। भले ही भारत की भावनाओं को सहलाने और भारत की चिंताओं को संतुलित करने के लिये नये श्रीलंकाई नेता ज़रूर भारत का पहला दौरा करेंगे लेकिन वह चीन जाने से भी गुरेज नहीं करेंगे। श्रीलंका को अपनी चेकबुक कूटनीति में फिर से फांसने की कोशिश चीन ज़रूर करेगा। कर्ज के बोझ में डूबे श्रीलंका के लिये चीन की मदद को ठुकराना आसान नहीं होगा।  

हालांकि भारत ने भी श्रीलंका के राष्ट्रीय विकास, राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता बहाल करने में कम सहयोग नहीं दिया है लेकिन चीन ने जिस तरह श्रीलंकाई नेताओं के साथ सीधा रिश्ता स्थापित कर वहां की राजनीति में दखलंदाजी की है, वह चीन और श्रीलंका के नवीनतम राजपक्षे शासन के बीच सहयोग को और गहरा करने में सहायक होगा।

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दूसरी ओर, पराजित नेता साजित प्रेमदासा को भारत और अमेरिका में पसंद किया जाने लगा था क्योंकि गत पांच सालों के दौरान चीन और श्रीलंका के बीच न केवल दूरियां बढ़ने लगी थी बल्कि चीन के साथ श्रीलंका ने सम्पर्क भी कम कर दिये थे। श्रीलंका में चीन को हमबनटोटा बंदरगाह और आसपास की हजारों एकड़ जमीन लीज पर दिये जाने के ख़िलाफ़ हमबनटोटा और आसपास के लोगों ने चीन विरोधी प्रदर्शन भी किये थे। लेकिन श्रीलंका की सिंहल आबादी ने इसे नजरअंदाज करते हुए गोतबया राजपक्षे को इसलिये अपना जोरदार समर्थन दिया क्योंकि तमिल अलगाववाद को उनकी ही सख्ती की वजह से कुचला जा सका था। इस वजह से गोतबया सिंहली लोगों के हीरो बने गए थे।

श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय की बागडोर अपने हाथ में रखने वाले गोतबया राजपक्षे ने सिंहल बहुमत वाले इलाकों में ही सर्वाधिक वोट हासिल किये जबकि  प्रेमदासा को तमिल और मुसलिम इलाकों से सबसे अधिक वोट मिले। चुनाव नतीजे आने के बाद मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने राजपक्षे को बधाई दे कर इसे ऐतिहासिक जीत की संज्ञा दी है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब इस द्वीप देश के साथ परस्पर भरोसे का रिश्ता बनाने और चीन के साथ राजपक्षे सरकार की नजदीकियों का असर भारत के सुरक्षा हितों पर नहीं पड़ने देने की होगी। 

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रंजीत कुमार
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