ये तो होना ही था । हैरानी इस बात पर नहीं कि आप क्यों टूटी । हैरानी इस बात है कि इतनी देर से क्यों टूटी । आप संसदीय दल के दो टुकड़े होना, मेरे लिये वो खबर है, जिसके होने का लंबे समय से मैं इंतज़ार कर रहा था । आम आदमी पार्टी के राज्य सभा के सात सांसदों ने पार्टी छोड़ी और बीजेपी से जा जुडे़ । इन सात में तीन वो सांसद हैं जो कभी पार्टी नेता केजरीवाल के आंख और कान हुआ करते थे । जो दरअसल कभी पार्टी चलाते थे और उनके पास इतनी पावर थी कि पार्टी के बेहद वरिष्ठ लोग भी उनसे ईर्ष्या करते थे । केजरीवाल उनकी ही सुनते थे । लेकिन उन्हीं लोगों ने बगावत की जिन्हें पार्टी ने बनाया, सँवारा और कम उम्र में पहचान दी ।
बाहर के लोगों को ये सुनकर हैरानी हो सकती है । लेकिन जो केजरीवाल के पार्टी चलाने के तरीके से वाक़िफ़ है, वो जानते हैं कि एक दिन ऐसा होना ही था। दरअसल आप जिन परिस्थितियों और जिन उद्देश्यों के लिये बनी थी, जब वो उससे भटकने लगी, जब वो दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह हो गयी, और उनकी तरह बर्ताव करने लगी, तो ये होना स्वाभाविक ही था। आप की फ़ितरत में राजनीति करना नही था। जब पार्टी बनी और मेरे जैसे लोग पार्टी में शामिल हुये, तो ये नारा था “हम राजनीति करने नहीं, राजनीति को बदलने आये है”। लेकिन जैसे जैसे कारवां बढ़ता गया, सत्ता के खेल में जुड़ता गया तैसे तैसे ये नारा फीका पड़ता गया। वो परंपरागत राजनीति को बदलने आई थी, वो खुद परंपरागत राजनीति का शिकार हो गई। आज की तारीख में उसमें और दूसरे दलों में कोई फर्क नहीं बचा है।
आम आदमी पार्टी लाखों करोड़ों लोगों का एक ख़्वाब था । वो ख़्वाब जो इस देश को भ्रष्टाचार मुक्त देखना चाहता है, जो आम और ख़ास में फर्क न करे, जिसके नेता आम आज़मी की तरह रहे । अन्ना आंदोलन ने इस ख़्वाब को पंख दिये। जैसे जैसे आंदोलन बढ़ता गया, ये ख़्वाब सरपट भागने लगा । लाखों करोड़ों लोगों को लगा कि अब इस देश को भ्रष्टाचारी सिस्टम से मुक्ति मिलेगी, आम आदमी के साथ न्याय होगा, फैसले उनकी सहमति से होंगे और देश में सही मायनों में लोकतंत्र होगा। ये ख़्वाब नया नहीं था । ये वो ख़्वाब था जो गांधी, नेहरू और हज़ारों स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। गांधी का स्वदेश का नारा ऐसा ही नारा था जिसमें आख़िरी पंक्ति में बैठे व्यक्ति के आँखों में आये आँसू को पोंछने की बात थी।
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ये आदर्श आज़ादी के बाद कुछ साल चले पर जल्दी ही सत्ता लोलुप लोगों ने पूरे सिस्टम को हाईजैक कर लिया । इस सिस्टम से निकलने की जद्दोजहद का नाम था अन्ना आंदोलन और जब आंदोलन एक राजनीतिक दल बना तो लोगों को लगा अब सपने के सच होने का वक्त आ गया है । ये अकारण नहीं था कि एक पार्टी अपने जन्म के डेढ़ साल में दिल्ली में सरकार बना ले, दस साल मे पंजाब में सत्ता में आ जाये और राष्ट्रीय पार्टी का ख़िताब हासिल कर ले । लेकिन वो कहते हैं न सत्ता भ्रष्ट करती है और परम सत्ता पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है, वही आप के साथ हुआ । आप के नेताओं को सत्ता के स्वार्थ ने डस लिया और वो अभिशप्त हो गई । एक एक कर क्रांति के साथी पार्टी छोड़ते गये और पार्टी पर एक आदमी का कब्जा हो गया । जिसने पार्टी बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी, उसी ने पार्टी को निपटाना शुरू कर दिया।
पार्टी संगठन और सरकार में पारदर्शिता की बात करती थी, नीति निर्धारण में जनता की सहभागिता की बात करती थी, आला कमान कल्चर का विरोध करती थी, हर स्तर पर लोकतंत्र की वकालत करती थी, वो पार्टी एक आदमी में सिमट कर रह गई । वो देवता बन गया जिससे असहमति का अर्थ था सर्वनाश। ये अन्ना के आंदोलन की “एंटी थीसिस” थी और हर उस आदर्श का उलट जिसकी वकालत आप बनने के समय की गई थी । पार्टी में केजरीवाल के अलावा सब रोबोट हो गये । जिनमे जितना साफ्टवेयर डाला जाये, बस उतना ही काम करें । आगे के काम के लिये साफ्टवेयर अपडेट का इंतज़ार किया जाये।

पार्टी में लोकतंत्र खत्म हुआ तो स्वार्थी लोगों का जमावड़ा होने लगा । देश बदलने का नारा पीछे हो गया, आप कैरियर बनाने की मशीन बन गई । स्वार्थ पूर्ति का अड्डा हो गया । आदर्श और आदर्शवादी पीछे छूट गये, अवसरवादी कामयाबी की छलाँग लगाने लगे । इनको ये समझ में आ गया कि नेता की परिक्रमा करो, विधायक, सासंद और मंत्री बनो। लेकिन इसमें एक ट्विस्ट था।

पार्टी पूरी तरह से ट्रांजेक्शनल हो गई । नेतृत्व के लिये उपयोगिता सबसे बड़ा मूल्य हो गया । चूँकि नेतृत्व को इंसान नहीं मशीनों की ज़रूरत थी और चूँकि हर मशीन की एक “एक्सपायरी डेट” होती है, लिहाज़ा हर नेता चाहे वो कितना ही बड़ा क्यों न हो, या एक समय में कितना ही ताकतवर क्यों न हो, उसकी एक एक्सपायरी डेट तय हो गई, और जब वो डेट आ गई तो फिर वो नेता या शख्स अनउपयोगी यानी यूजलेस हो गया । ये इसी “यूज़ एंड थ्रो” पालिटिक्स का नतीजा है कि राघव चड्डा, संदीप पाठक और स्वाती मालीवाल जैसे लोग जो एक समय में पार्टी में बेहद शक्तिशाली थे, एक्सपायरी डेट गुज़र जाने के बाद पैदल हो गये।
जो कभी पार्टी में लोगों की क़िस्मत बनाते और बिगाड़ते थे, वो महीनों घर बैठे रहने लगे, और कोई उनसे बात नहीं करता था । जिनकी नेता के घर में फ्री एंट्री थी, जो हर मीटिंग की शोभा थे, वो फोन काल को तरस गये । जब कभी भी पार्टी एक व्यक्ति में समाहित हो जाती है तो ऐसा ही होता है । दुनिया में इसके सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं और भारत में भी । और जब पावरफुल नेता अपनी ही पार्टी में सड़क पर आ जाता है तो उसके पास दो विकल्प होते है या तो वो पार्टी में अपमानित होता रहे जहां उसने कभी राज किया था या फिर वो पार्टी छोड़ दे।
नेतृत्व को समझना चाहिये कि पार्टी एक जीवित संस्था होती है । जिसकी संवेदना का एक अलग संसार होता है । उसके अपने सुख दुःख और अरमान होते है । व्यक्ति मशीन नहीं हो सकता । वो हाड़ मांस का पुतला होता है । उसका भी एक “स्व” होता है । जब उसके “स्व” पर चोट पहुचंती है तो वो रिएक्ट करता है । और जो राजनीति में कैरियर बनाने आये है, वो नये अवसर खोजेंगे, पार्टी भी छोड़ेंगे और पार्टी टूटेगी भी । अभी तक ढेरों लोगों ने पार्टी छोड़ी । लेकिन अब पानी नाक ऊपर बहने लगा है लिहाजा पार्टी टूटने की नौबत आ गई है । जो आदर्शवादी थे उन्होंने अपना नया रास्ता चुन लिया लेकिन जो कैरियरवादी थे वो बीजेपी में शामिल हो गये ।
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मेरा ये कहने का बिल्कुल अर्थ नहीं है कि पार्टी में अब अच्छे लोग नहीं बचे हैं या आदर्शवादियों का अकाल पड़ गया है । अभी भी निःस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग है, ऐसे लोग है जिनको अभी भी लगता है कि पार्टी देश बदल सकती है । वो बिना कुछ मांगे निष्काम भाव से उस ख़्वाब को पूरा करने की चाह में खुद को खपा रहे हैं । ऐसे लोगों की कद्र पार्टी को करनी होगी तभी पार्टी आगे बढ़ पायेगी । पार्टी को अगर आगे बढ़ना है तो एक बार फिर उसे ड्राइंग बोर्ड पर जाना होगा, व्यक्तियों की कद्र करनी होगी, असहमति की आवाज को सुनने की आदत डालनी होगी, पार्टी में लोकतंत्र लाना होगा, पार्टी को व्यक्ति से निकाल कर संगठन पर केंद्रित करना होगा, नई रणनीति बनानी होगी। क्रांतियाँ इतनी आसानी से नहीं मरती । वो बलिदान माँगती हैं। क्या केजरीवाल खुद को बदलने को तैयार हैं?