आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने हाल के छात्र आंदोलन में 23 दिनों तक भूख हड़ताल की। इस आंदोलन ने देशभर में शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और जवाबदेही के सवालों को जोरदार तरीके से उठाया। सत्य हिंदी के खास कार्यक्रम ‘आशुतोष की बात’ में नेहा बोरा ने अपनी पूरी कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि यह सिर्फ एक अनशन नहीं था, बल्कि युवाओं के भविष्य और लोकतंत्र की लड़ाई थी।
 
नेहा बोरा ने कहा कि इससे पहले उन्होंने कभी भूख हड़ताल नहीं की थी। वे और उनके पांच साथी सोनम वांगचुक के साथ अनशन पर बैठे थे। धीरे-धीरे साथियों की तबीयत खराब होने लगी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अंत में सिर्फ मनीष आमीन और वे बचे। रोज मेडिकल जांच होती थी, खून और यूरिन टेस्ट होते थे। उनका तीन बार ईसीजी भी हुआ। भूख हड़ताल के दौरान स्वाद और गंध की इंद्रियां लगभग बंद हो गई थीं। पूरा ध्यान सिर्फ शरीर की जरूरत और भूख पर रहता था।

'सबसे बड़ा अनुभव रोज आने वाले लोग थे'

बोरा ने कहा कि लेकिन सबसे बड़ा अनुभव भूख नहीं, बल्कि रोज आने वाले लोग थे। कई बीजेपी समर्थक भी आए और बोले, “हमने बार-बार बीजेपी को वोट दिया। यह हमारी गलती है। हमारे कारण आपको भूख हड़ताल करनी पड़ रही है और बच्चों की जान गई।” गुजरात से एक पिता आए जिनके बेटे ने नीट के बाद आत्महत्या कर ली थी। वे बोले, “मैं खुद भाजपा को वोट देता था, लेकिन अब मेरा बच्चा वापस नहीं आएगा।” लोगों का यह गुस्सा और दर्द नेहा और उनके साथियों के लिए ताकत बना।भूख हड़ताल का फैसला अचानक नहीं लिया गया था। यह पूरी तरह सोच-समझकर किया गया था। सोनम वांगचुक के अनशन की खबर से पहले ही चर्चा चल रही थी। छात्र कार्यकर्ताओं ने पहले भी गिरफ्तारियां, लाठियां और हिरासत झेली थीं। यह संघर्ष सालों से चल रहा था। इसलिए छात्रों ने भी एकजुटता में अनशन पर बैठने का फैसला किया।
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भूख हड़ताल पर क्या बोलीं?

नेहा ने कहा कि भूख हड़ताल के लिए पुराने साथियों ने पहले से तैयार कर दिया था। उन्होंने बताया कि पांचवें-सातवें दिन शरीर बहुत कमजोर पड़ता है, फिर थोड़ा स्थिर हो जाता है। उन्नीस-बीस दिन बाद फिर मुश्किल होती है। सबसे जरूरी मानसिक मजबूती है। हंसते-बोलते रहो, बातचीत करो। नेहा ने डायरी भी बनाई थी जिसमें लिखा करती थीं कि आज आम या सेब खाने का मन कर रहा है। जब हालत खराब होती तो वे मजाक में कहते कि दोष बीजेपी और धर्मेंद्र प्रधान का है। सोनम वांगचुक साठ साल के हैं और डटे हुए हैं, तो हम कैसे पहले उठ सकते हैं? आत्मसम्मान भी प्रेरणा देता था।

नेहा बोलीं कि अनशन तोड़ने का दबाव लगभग एक हफ्ते पहले से शुरू हो गया था। चंद्रशेखर आजाद, प्रकाश राज, कुणाल कामरा, शबाना आजमी समेत कई सांसद, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता आए। उन्होंने कहा कि सरकार को जान की परवाह नहीं है, इसलिए अब संघर्ष का रूप बदलो। नेहा ने साफ कहा कि यह गांधीवादी तरीके से सत्ता की अंतरात्मा जगाने का प्रयास नहीं था। वे जनता की अंतरात्मा को जगाना चाहते थे। आखिरकार 20 तारीख को, 23वें दिन, अनशन समाप्त कर दिया गया।

शुरुआत में जंतर-मंतर पर भीड़ कम लग रही थी, लेकिन नेहा को कभी नहीं लगा कि आंदोलन सीमित रह जाएगा। देशभर से संदेश आ रहे थे। छात्र अपने शहरों में प्रदर्शन कर रहे थे। छोटे कस्बों में भी चर्चा हो रही थी। आखिरी दस-बारह दिनों में समर्थन तेजी से बढ़ा। लोग सिर्फ देखने नहीं, बल्कि खुद को हिस्सा मानने लगे। कई पहली बार धरने पर आए, परिवार और बच्चों के साथ।

प्रधान के इस्तीफ़े पर क्या बोलीं?

नेहा ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा महत्वपूर्ण उपलब्धि था, लेकिन सबसे बड़ी जीत नहीं। सबसे बड़ी जीत यह है कि लोगों को फिर महसूस हुआ कि संगठित प्रतिरोध का असर हो सकता है। लाखों युवाओं ने जाना कि उनकी समस्या निजी नहीं, सामूहिक है। शिक्षा का सवाल समाज से जुड़ा है। परीक्षा समय पर न होना, पेपर लीक, नौकरियों में देरी—ये सब युवाओं को असुरक्षा में धकेलते हैं। परिवार अपनी बचत खर्च कर देते हैं, फिर सब बेकार हो जाता है। यह प्रशासनिक विफलता नहीं, सामाजिक अन्याय है। नेहा ने बताया कि सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि लोग अभी भी उम्मीद करना नहीं भूले हैं। दूर-दूर से आए, समय और संसाधन दिए। कई वर्षों बाद आंदोलन में शामिल हुए। इससे साबित हुआ कि लोकतांत्रिक राजनीति की जमीन अभी बाकी है।
नेहा ने कहा कि सबसे भावनात्मक पल अपनी मां से जुड़ा था। शुरू में मां बहुत चिंतित थीं। लेकिन बाद में खुद जंतर-मंतर पहुंचीं, छात्रों और प्रभावित परिवारों से मिलीं। उनका नज़रिया बदल गया। जब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर आई तो मां ने फोन करके सभी को बधाई देने को कहा।

यह आंदोलन अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों को एक मंच पर ले आया। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही जैसे सवालों पर लोग एकजुट हो सकते हैं। आंदोलन विश्वविद्यालय की सीमा से बाहर निकल गया। माता-पिता, नौकरी की तैयारी कर रहे युवा, शिक्षक और आम लोग आए। इससे साफ हुआ कि शिक्षा का सवाल सामाजिक सवाल है।

आंदोलन ने राजनीतिक निराशा को भी चुनौती दी। लोग मानने लगे थे कि विरोध बेकार है। लेकिन इसने याद दिलाया कि संघर्ष बिना कोई बदलाव नहीं आता। आंदोलन अपनी मूल मांग से आगे निकल गया। यह युवाओं की बेचैनी, असुरक्षा और गुस्से का माध्यम बन गया।
हिंसा के मुद्दे पर नेहा ने साफ कहा कि अगर किसी प्रदर्शनकारी ने गलत किया तो उसका समर्थन नहीं। लेकिन राज्य की संगठित कार्रवाई को उससे बराबर नहीं माना जा सकता। सुरक्षा बलों की तैयारी, इस्तेमाल किए गए उपकरण और बाद में आई शिकायतें नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। महिलाओं के दुर्व्यवहार के आरोप और गंभीर चोटों की जांच होनी चाहिए। जवाबदेही सिर्फ निचले अधिकारियों की नहीं, ऊपर से तय होनी चाहिए। गृह मंत्री और दिल्ली पुलिस नेतृत्व की भी जिम्मेदारी बनती है। स्वतंत्र जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई हो।

नेहा बोरा ने कहा कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। शिक्षा का सवाल, युवाओं का भविष्य और जवाबदेही अभी बाकी है। संघर्ष का रूप बदल सकता है, लेकिन सवाल मौजूद हैं। सबसे बड़ी विरासत यह है कि लोगों ने अपनी सामूहिक ताकत महसूस की।
 
आशुतोष ने बातचीत खत्म करते हुए कहा कि उम्मीद है कि देश में राजनीतिक नेतृत्व और संस्थाओं की जवाबदेही मजबूत हो, और किसी भी छात्र या नागरिक के साथ बर्बरता न हो। यह बातचीत साफ दिखाती है कि 23 दिन की भूख हड़ताल सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के गुस्से और उम्मीद का प्रतीक बन गई।