ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बीजेपी संगठन में हुए भारी फेरबदल के बाद चुनी गई टीम को नितिन नवीन की टीम बताने की जगह बीजेपी की नई टीम मानते हैं। एकदम युवा और बेदाग नवीन का बीजेपी अध्यक्ष बनना सबके लिए चौंकाने वाला था तो काफी समय से रगड़ा खा रही बीजेपी की सांगठनिक टोली में बदलाव को भी लोग वैसा ही चौंकाने वाला चाहते थे। पिछले दिनों जंतर-मंतर पर हुए बच्चों के आंदोलन और अयोध्या से चढ़ावा चोरी का भंडाफोड़ होने के बाद गिरी पार्टी (और सरकार की भी) की प्रतिष्ठा को भी इस बदलाव से संभालने की उम्मीद की जा रही थी। फिर कई राज्यों के चुनाव आने वाले हैं। वहां के लोगों का संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाकर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिश भी हुई है। 

कैबिनेट में भी हेरफेर होगा?

ऐसा अनुमान कैबिनेट के हेरफेर से भी किया जा रहा है। दो को छोड़कर सारे महासचिवों की छुट्टी, सारे आनुषांगिक संगठनों के प्रमुखों की विदाई और उपाध्यक्षों में छह महिलाओं का नाम आना निश्चित रूप से बड़ी बात है लेकिन आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय की विदाई, बीजेपी युवा मोर्चा के प्रतापी अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या को हटाना और सारी चर्चा के बावजूद अनुराग ठाकुर जैसों को संगठन में जगह न मिलना सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
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इस बदलाव में एक पैटर्न है जो संकेत देता है कि पार्टी विवाद खड़ा करके लाभ की जगह घाटा कराने की लाइन छोड़ रही है। अमित मालवीय की जगह जानकार और सौम्य दीपक म्हस्के लाया गया है जिनके बारे में आम धारणा है कि वे सोशल मीडिया से दूर नहीं रहते लेकिन उसके उछल कूद से दूर रहते हैं। हां उनकी सहयोगी बनी प्रीति गांधी अपने उपनाम पर सार्वजनिक पश्चाताप करके और गोडसे उपनाम की ख्वाहिश करके पर्याप्त चर्चा पा चुकी है। इसमें भी अमित मालवीय की विदाई को तो काफी सारे लोग गोएबल्स के जर्मन परिदृश्य से गायब होने जैसा महत्व देकर उसकी तरह-तरह से व्याख्या कर रहे हैं। मालवीय प्रतिभाशाली रहे हैं और 2008 से ही बीजेपी के पक्ष में सोशल मीडिया समेत अनेक मंचों से माहौल बनाने का काम करते रहे थे। 2015 में उनको बीजेपी का सोशल मीडिया सेल का प्रभारी बना दिया गया।

आज सोशल मीडिया की जो पहुँच और रफ्तार है उसमें बीजेपी जैसी पार्टी का ग्यारह साल तक प्रचार देखना कोई कम बड़ी बात नहीं है और उनकी गोएबल्स से तुलना का मतलब मोदी जी को हिटलर बताना होगा। हम ऐसा नहीं कह सकते। उल्लेखनीय है कि जब 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने आत्महत्या की थी तब 1 मई को गोएबल्स और उसकी पत्नी मैगदा ने बच्चों समेत आत्महत्या कर ली थी। मोदी जी और मालवीय की उम्र लंबी हो और इनका चुनाव हुआ है, इन्होंने सत्ता हड़पी नहीं है।

इस बार बीजेपी ने सोशल मीडिया की तो पूरी टीम बदली है लेकिन मीडिया की टीम में भी बदलाव किया है। अमित मालवीय ने शरारतें कीं लेकिन वह शायद इस मीडिया का चरित्र भी है। पर उन्होंने और उनकी टीम ने गलतियां भी कीं जिसका नुकसान बीजेपी को हुआ।

ऐसी गिनती शुरू होगी तो बड़े नेताओं का नंबर पीछे नहीं होगा लेकिन मीडिया सेल का काम चीजों को संभालना भी होता है।

जंतर मंतर आंदोलन का असर?

और हमने देखा है कि जंतर मंतर आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया के भारी योगदान को देखते हुए और अपने मीडिया सेल द्वारा उसका जबाब न दे सकने से बेचैन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद से किस तरह रात बारह बजे रील बनाकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया। इस पोस्ट को सचमुच ‘संभालने’ की ज़रूरत थी क्योंकि इससे जितना लाभ हुआ उससे ज्यादा नुकसान हो गया। यह उपहास का विषय बन गया। बीजेपी के मौजूदा नेता लोगों में यह बेचैनी काफी समय से है। और उनको यह भी लगाने लगा है कि शुरू में सोशल मीडिया पर उनको जो बढ़त थी वह अब विपक्ष को हासिल हो गई है। इसमें अमित मालवीय टोली के बासी होने के साथ विपक्ष में ज्यादा तेज लोगों का होना भी कारण है। और जेन जी से नई तकनीक और संचार के मामले में जीतना तो और मुश्किल है। इसी के चलते कुछ समय पहले सरकार ने दिलीप मण्डल जैसे विवादास्पद व्यक्ति को सूचना और प्रसारं विभाग में सम्मानजनक स्थान दिया जो उससे पहले आम्बेडकरवादी और ओबीसी जमात के दुलारे बने हुए थे।
विश्लेषण से और

मीडिया का दुरुपयोग

और जब आप सत्ता में हों तो आपको और भी बहुत सूझता है जो परिणाम में मालवीय और सूर्या जैसों की गलतियों से भी भारी पड़ता है। कभी कांग्रेस सरकार ने दूरदर्शन और आकाशवाणी को अपनी दखलंदाजियों से चौपट कर दिया तो इस सरकार ने ज्यादातर इलेक्ट्रानिक मीडिया को भोंपू और अविश्वसनीय बना दिया है। वहां से भागे या भगाए लोग यू-ट्यूब और नेट पर सुपरहिट हो रहे हैं और खुलेपन के चलते सोशल मीडिया दनादन सरकार विरोधी कंटेन्ट को वायरल कर देता है। सरकार उस पर भी डंडा चलाकर ज्वार थामना चाहती है। आज की इंडियन एक्सप्रेस की खबर है कि पिछले पाँच महीनों में सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों से 1.95 लाख सामग्री रुकवाई यही। इसमें इंस्टाग्राम की सबसे ज्यादा सामग्री है और फिर फेसबुक का नंबर है जिसका ग्रोथ अब रुकने लगा गई।

आईटी कानून की धारा 79-3-बी और 69-ए से मिली ताकत से वह ऐसा कर सकती है पर सिर्फ राष्ट्रविरोधी और समाज को नुकसान पहुंचाने वाले कंटेन्ट को ही रोकना चाहिए। यहां राष्ट्र का मतलब भी बदल गया है। तीन घंटे में सरकारी एपीआई प्लेटफार्म सहयोग के माध्यम से सामग्री को गुजारना एक तरह का सेंसरशिप है लेकिन यह रोज हो रहा है। मेटा के खिलाफ मामले भी चल रहे हैं। वह अपने धंधे के चक्कर में कई बार सीमाएं लांघता है और जब रोज दस करोड़ कंटेन्ट अपलोड हो तो वैसे भी गड़बड़ की गुंजाइश रहती है। पर 60 करोड़ ग्राहकों के चलते यह उसका दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी है। लेकिन सरकार की बेचैनी और है और अमित मालवीय की विदाई भी उससे जुड़ी है।