राहुल गांधी समेत इंडिया गठबंधन के नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस
जब एक बहुत ही ठोस तार्किक आधार पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ़ से राहुल गांधी से मिलने से इनकार आ गया तो लगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की गड़बड़ियों के खिलाफ चलाने वाले आंदोलन को झटका लगा। चीफ जस्टिस ने कहा कि हम इसी मामले में कई अर्जियों पर विचार कर रहे हैं इसलिए किसी एक पक्ष से मिलने का मतलब फैसले पर उसकी छाया आने देना होगा। अगर आपको कोई शिकायत है तो आप भी याचिका के माध्यम से आइए हम उस पर सुनवाई करेंगे। बाक़ी देश ने इस राय को सही माना लेकिन केरल कांग्रेस ने झट से मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ही पोस्ट किया। पर उसे जल्दी हटाया गया और कांग्रेस ने तुरंत नई याचिका बनाई जिसमें ज्ञानेश कुमार को हटाने की असंभव मांग भी है। सबको मालूम है कि यह काम सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। लेकिन उसे दाखिल करने के बहाने उसने इंडिया गठबंधन का प्रभावशाली रोड शो ज़रूर तैयार कर लिया और पहली बार ग्यारह दलों के नेता साथ दिखाई दिए। यह मामला वैसे भी लीगल लड़ाई से ज्यादा राजनैतिक लड़ाई का बन चुका है और कांग्रेस के इस दाँव से लगा कि पहले दौर में उसकी बढ़त हो गई।
कांग्रेस ने आगे के लिए भी लंबा चौड़ा कार्यक्रम दिया है। भविष्यवाणी से बचना चाहिए लेकिन हमने देखा है कि ऐसा कर्यक्रम चलाना अब उसके संगठन के वश में नहीं रहता। राहुल कुछ कर जाते हैं और कांग्रेसी दम साध लेते हैं। पर इसी दौरान क़ानूनी लड़ाई के नतीजे भी आएंगे। कांग्रेस के साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी ने भी राउंड दो की घोषणा कर रखी है।
राहुल गांधी के सरप्राइज!
मौजूदा दौर में जिस तरह ज्ञानेश कुमार ने सैकड़ों सांसदों के साथ ज्ञापन देने आए विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मिलने से इनकार किया उससे भी आंदोलन को बल मिला। और आंदोलन पूरी शृंखला में आएगा यह उम्मीद भी नहीं थी। चुनाव आयोग के बाद राजघाट जाने का कार्यक्रम भी एक सरप्राइज था और सफल माना जा सकता है। पर विपक्षी इंडिया गठबंधन की तरफ़ से इस मामले में राष्ट्रपति को शिकायत करने वाला दाँव खास प्रभावी नहीं हुआ क्योंकि राष्ट्रपति ने बहुत ही आराम से मिलने का समय दिया, ज्ञापन रखा। उससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन वाले दिन ज़रूर चार पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत सात हजार से ज्यादा लोगों की गिरफ़्तारी और दिल्ली को छावनी में बदलने के बावजूद आंदोलनकारियों के हौसले ने सरकार को ही बैकफुट पर ला दिया था। लेकिन उसके नेताओं की सशर्त रिहाई की सच्ची, झूठी चर्चा ने हवा बिगाड़ी।ज्ञानेश कुमार बदलने को तैयार नहीं
मध्य दिल्ली को युद्ध क्षेत्र बनाने की लड़ाई के इस पहले दौर ने कई बातें साफ़ कीं। पहली तो यही कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर नरम पड़ने के बावजूद न तो ज्ञानेश कुमार बदलने को तैयार हैं और न सरकार उनका साथ छोड़ने जा रही है। और इसके लिए उसने दिल्ली को छावनी में बदलने से लेकर इटारसी तक से गिरफ्तारियां करने और ट्रेन, मेट्रो, बस बंद करने, दफ्तर दुकान बंद कराने तक से परहेज नहीं है। उसे उस जेन जी के खिलाफ जाने की भी खास परवाह नहीं है जिसे हाल तक प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख भी बहलाने-फुसलाने में लगे थे। मामला सिर्फ कानूनी तरीकों से शांतिपूर्ण विरोध को रोकने का नहीं था। इस बार तो अदालती आदेश के बावजूद मेट्रो बंदी समेत अनेक काम हुए। दूसरी तरफ जुलाई वाली जंतर मंतर की हिंसा के बाद भी अपराधियों और पुलिस की वर्दी में गुंडे उतारने का खेल बंद नहीं हुआ जिसको लेकर दुनिया भर में थू थू हुई। इस बार ऐसे गुंडों और पुलिस ने पत्रकारों, खासकर यूट्यूबरों को भी निशाना बनाया। और बीजेपी के प्रवक्ता दिन भर कुर्ता बंडी चढ़ाए तैयार रहे और टीवी चैनलों पर उनका प्रसारण जारी रहा। हाँ जिम्मेवार बड़े नेता ज़रूर मीडिया में आने से बचते रहे। पर दिल्ली को छावनी में बदलने और शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों के खिलाफ गैर जरूरी सख्ती ने आम लोगों को भी बीजेपी से नाराज किया।
प्रोटेस्ट ने इंडिया गठबंधन को एकजुट कर दिया
अब इस आंदोलन के राजनैतिक रंग लेने और एक दौर में विपक्ष के बढ़त बढ़ाने के कई मतलब है। राहुल-प्रियंका फोकस में रहे और बहुत योजना से बनाए गए। लेकिन इन आंदोलन ने इंडिया गठबंधन को एकजुट कर दिया। इसमें आईसा की आमद मजबूती वाला पक्ष बनी। इसमें ममता बनर्जी की सक्रियता एक नई चीज है। दूसरे यह भी हुआ कि बीजू जनता दल और द्रमुक कांग्रेस से नाराजगी के बावजूद एनडीए में जाने से बचे ही नहीं, बीजद तो आंदोलन में शामिल भी हुआ। आंदोलन की एक स्वतंत्र धारा कॉकरोच जनता पार्टी की रही जिसने अपनी ताक़त पहले दिखाई है और इस बार भी दस तारीख के उसके कॉल पर ही ज्यादा हंगामा हुआ। इसमें कांग्रेस ने हिस्सा नहीं लिया तब भी यह दमदार रहा और इसमें अरविन्द केजरीवाल के आप समेत वाम दलों ने खुलकर भागीदारी की। कहना न होगा कि इस धारा के किए धरे का राजनैतिक और चुनावी लाभ कांग्रेस को ही होगा। और अगर बीजेपी होशियारी से काम लेती तो चुनाव आयोग की गलतियों से निपटने के साथ इस तरह के राजनैतिक विभाजन का लाभ लेने की कोशिश करती। पर हुआ यह कि चिराग पासवान समेत एनडीए के कई साथी शांतिपूर्ण आंदोलन के समर्थन में दिखे तो बाकी साथी भी उस तरह ज्ञानेश कुमार के फैसलों के पक्ष में न लगे।लोकतंत्र के लिए संजीवनी बूटी
और ज्ञानेश कुमार रहें या जाएं, यह विशेष पुनरीक्षण अभियान आगे जो रूप ले, राहुल गांधी और विपक्ष की राजनीति जहां तक जाए, इस आंदोलन की सफलता न सिर्फ जरूरी है बल्कि इस मुल्क के लोकतंत्र के लिए संजीवनी बूटी का काम कर रही है। भारतीयों, खासकर इस मुल्क के गरीब-गुरबा और कमजोर जमातों को उनके हकों के प्रति जागरूक करने का काम सौ डेढ़ सौ साल से चल रहा है और अब जाकर समाज का कमजोर वर्ग उभरकर सामने आया है। चुनाव और मतदान यह बताते हैं कि आजादी के बाद से ही पूरा परिदृश्य कैसे बदला है-मण्डल के बाद तो यह हर किसी को दिख रहा है। दूसरी ओर इस कमजोर जमात को भी यह लग गया है कि वैश्विक पूंजीवाद के नंगे नाच के समय संविधान और मतदान का अधिकार न हो तो उनके लिए सांस लेना भी अब मुश्किल होगा। ऐसे में मतदाता सूची पुनरीक्षण के नाम पर तेरह करोड़ से ज्यादा नाम काटना सचमुच जीवन-मरण का सवाल है। और अगर इसके खिलाफ आंदोलन की चेतना बनती और आगे बढ़ती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। इसी लिहाज से आंदोलन के पहले चरण की बढ़त अहम है।