पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की बगावत क्या ऑपरेशन लोटस का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की नजर विधायकों पर नहीं, बल्कि सांसदों पर है। विधानसभा में बीजेपी को दो तिहाई बहुमत प्राप्त है। इसलिए टीएमसी से 60 और विधायकों के टूटने का राज्य की राजनीति पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा। लोकसभा में टीएमसी के 29 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। लोकसभा के दो तिहाई यानी करीब 20 सांसद टूट जाते हैं तो ये बीजेपी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। लोकसभा में बीजेपी के 240 सांसद हैं जबकि अकेले दम पर बहुमत के लिए 272 चाहिए। टीएमसी के 20 सांसद शामिल हो जाएँ तो बीजेपी बहुमत के आँकड़े के क़रीब पहुँच जाएगी और एनडीए के सहयोगी दलों पर उसकी निर्भरता कम हो जाएगी। टीएमसी की एक सांसद काकोली घोष दस्तीदार पार्टी से खुली नाराज़गी जता चुकी हैं। उन्होंने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है।

लोकसभा में बहुमत के प्रयास में बीजेपी?

इसी तरह 245 सदस्यों वाले राज्य सभा में बीजेपी के 113 सदस्य हैं और बहुमत के लिए 123 सदस्यों की जरूरत है। आम आदमी पार्टी के सात राज्य सभा सांसदों का दल बदल कराकर बीजेपी ने उच्च सदन में अपनी संख्या बढ़ा ली। लेकिन अभी भी बहुमत से दूर है। राज्यसभा में टीएमसी के 13 सदस्य हैं। हाल में संविधान के 131वें संशोधन के ज़रिए लोकसभा के सदस्यों की सांख्य 850 करने से संबंधित विधेयक पास नहीं हो सका था। इस विधेयक के ज़रिए लोकसभा क्षेत्रों के सीमांकन को भी बदलने का प्रस्ताव था। यह विधेयक महिला आरक्षण के नाम पर लाया गया था। 

इस विधेयक के गिरने से बीजेपी का प्लान 2029 लोकसभा चुनाव ध्वस्त हो गया था। इस विधेयक को दोबारा पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत है। बीजेपी की नज़र अब टीएमसी और डीएमके जैसी पार्टियों के सांसदों पर है। तमिलनाडु में हार के बाद डीएमके भी मुश्किल में है। खास कर इसलिए कि उसके गठबंधन में शामिल कांग्रेस और वाम पंथी पार्टियों ने मुख्यमंत्री जोसफ़ विजय को समर्थन दे दिया है। कांग्रेस तो विजय सरकार में शामिल भी हो गई है। डीएमके ने इंडिया गठबंधन से अलग होने का संकेत भी दे दिया है।
15 साल बाद विधानसभा चुनावों में हार के बाद टीएमसी में बौखलाहट दिखाई दे रही है। इसके कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उन्हें डर है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकती हैं। जो भगदड़ विधायकों में दिखाई दे रही है उसका अंदेशा सांसदों में भी दिखाई दे रहा है। बीजेपी सांसद सौमित्र खान का दावा है कि टीएमसी के 20 सांसद पार्टी के संपर्क में हैं। उन्होंने 50 विधायकों के भी पार्टी के संपर्क का दावा किया था। एक हद तक ये दावा सच साबित हुआ। उनका कहना है कि टीएमसी के बागी बीजेपी में शामिल होने को तैयार हैं। उन्होंने कहा था कि अगर बीजीपी चाहे तो टीएमसी ‘कुछ दिनों में खत्म’ हो सकती है। बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने दावा किया है कि कई टीएमसी सांसद-विधायक पार्टी में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन फिलहाल बीजेपी का “दरवाजा बंद” है।

टीएमसी में बगावत

विधानसभा का चुनाव नतीजा आने के तुरंत बाद सौ से ज़्यादा टीएमसी पार्षदों ने विभिन्न नगर पालिकाओं से सामूहिक इस्तीफ़ा दे दिया। ये पार्टी में बगावत का पहला संकेत था। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के क्षेत्रीय, प्रशासनिक बैठक में बारासात से 4 बार की टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार शामिल होने पहुंची थीं। उन्होंने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा भी दे दिया। उनका मुख्यमंत्री की बैठकों में शामिल होना बगावत का बड़ा संकेत माना जा रहा है। नदिया, कल्याणी बैठक में टीएमसी के 6 विधायक भी शामिल हुए। इनमें आनिसुर रहमान, डिगांगा से बुरहान-उल-मुकद्दीन, बदुरिया से बीना मंडल, स्वरूपनगर से सुरजीत मित्रा, बसीरहाट दक्षिण से उषारानी मंडल और हारोआ से अब्दुल मतीन शामिल हैं। उत्तर बंगाल में भी अलग बैठक में 13 टीएमसी विधायकों ने भाग लिया। 

शुभेंदु अधिकारी की बैठक में शामिल होने वाले ये नेता कहते हैं कि वे “प्रशासनिक और विकास कार्य” के लिए गए थे, लेकिन इसे टीएमसी में टूट का संकेत माना जा रहा है। इसका एक कारण तो ये है कि टीएमसी ने सरकार का पूर्ण बहिष्कार करने की घोषणा कर रखी है।

ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुली बगावत

ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुली बगावत शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने के मुद्दे पर शुरू हुई। 9 मई को पार्टी ने शोभनदेव को विपक्ष का नेता बनाने के लिए विधानसभा सचिवालय को एक पत्र सौंपा। इस पत्र पर टीएमसी के 70 विधायकों के हस्ताक्षर बताए गए थे। विधान सभा सूत्रों के अनुसार उस पर पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी का भी हस्ताक्षर था, हालाँकि वे विधायक नहीं हैं। सचिवालय सूत्रों के अनुसार कई विधायकों का हस्ताक्षर आधिकारिक रिकॉर्ड से मैच नहीं कर रहा था। कुछ हस्ताक्षर ब्लॉक लेटर्स में थे, और कुछ विधायकों ने दावा किया कि उन्होंने कोई ऐसा प्रस्ताव साइन नहीं किया या बैठक में प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ था। विधानसभा सचिवालय ने हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। सीआईडी ने जांच शुरू की, एसआईटी गठित की गई और अभिषेक बनर्जी को समन भेजा गया। वे बीमार बताकर नहीं पहुंचे। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने स्पीकर से शिकायत की है कि 6 मई की बैठक में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ। उनके हस्ताक्षर फर्जी हैं। उनकी शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज करायी गयी। टीएमसी ने दोनों विधायकों को एंटी-पार्टी एक्टिविटी के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया।

कुछ अन्य टीएमसी विधायकों जैसे बहरूल इस्लाम, अरूप राय सुभाषिस दास ने सीआईडी को बताया कि हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। स्पीकर ने शुरुआत में मीटिंग डेट और पर्याप्त हस्ताक्षर ना होने का हवाला देकर नेता विपक्ष की नियुक्ति रोक दी थी। और अब हस्ताक्षरों की सीआईडी जाँच की जा रही है। लेकिन ऋतब्रत बनर्जी ने जैसे ही 58 विधायकों की सूची सौंपी वैसे ही उन्हें विधायक दल और विपक्ष का नेता घोषित कर दिया गया।

ऋतब्रत बनर्जी का निलंबन

टीएमसी की बैठकों में विधायकों की लगातार अनुपस्थिति से पार्टी में विद्रोह का संकेत चुनाव नतीजा आने के बाद से ही मिलने लगा था। 31 मई को ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर आयोजित तीसरी बैठक में केवल 19-20 विधायक पहुंचे। बैठक रद्द कर दी गई। पार्टी ने बताया कि अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी और अन्य नेताओं पर हमलों के बाद विधायक क्षेत्रीय स्थिति संभाल रहे थे। पार्टी के भीतर असंतोष को दबाने के लिए ऋतब्रत बनर्जी और एक अन्य विधायक को निलंबित कर दिया गया। इसके पहले 7 मई को ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर हुई बैठक में 80 में से 71 विधायक शामिल हुए थे। यह बैठक चुनाव में पार्टी की हार की समीक्षा के लिए थी, जिसमें ममता ने आरोप लगाया कि पार्टी के साथ धोखा हुआ। उन्होंने हार के कारणों का पता करने के लिए जाँच समिति गठित करने की घोषणा की। इसके बाद 21 मई को विधानसभा परिसर में विरोध, धरना कार्यक्रम में लगभग 35 विधायक ही शामिल हुए। पार्टी ने अनुपस्थिति का कारण क्षेत्रों में चुनाव के बाद हिंसा और कार्यकर्ताओं का मुद्दा बताया।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल पुलिस टीएमसी विधायकों को धमका रही है, उन्हें पार्टी छोड़ने और बीजेपी में शामिल होने के लिए मजबूर कर रही है। उन्होंने इसे ‘पुलिस राज’ बताया। उन्होंने बीजीपी पर चुनाव के बाद हिंसा, नेताओं पर हमला और अराजकता फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि स्थिति इतनी ख़राब है कि ‘हिटलर ने भी ऐसे काम नहीं किए थे’।
पार्टी ने 1 जून को ब्लॉक, वार्ड स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए, और 2 जून को ममता ने खुद कोलकाता के रानी रश्मोनी रोड पर दिनभर के धरना का नेतृत्व किया हालाँकि उन्हें पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी। ममता ने दिल्ली में धरना देने की घोषणा भी की है। बताया जा रहा है कि टीएमसी के सांसदों, विधायकों और बड़े नेताओं को सीबीआई, ईडी और अन्य केंद्रीय एजेंसियों का डर सता रहा है। 2011 में टीएमसी के सत्ता में आने के बाद सीपीएम और वाम दलों के कैडर का एक बड़ा तबका टीएमसी में शामिल हो गया था। क्या बंगाल में इतिहास दोहराया जाएगा। ममता बनर्जी को स्ट्रीट फाइटर माना जाता है। चुनाव हारने के तुरंत बाद उन्होंने इंडिया गठबंधन को मज़बूत करने की घोषणा कर दी थी। बीजेपी के लिए ये भी ख़तरे का संकेत था। इंडिया गठबंधन के मज़बूत होने से सीधा नुक़सान बीजेपी को हो सकता है। बीजेपी को फ़ायदा इसी में है कि टीएमसी राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर समाप्त हो जाये।