पश्चिम बंगाल के ताज़ा विधानसभा चुनाव के बारे में चुनाव आयोग के अनुसार 92.47% की बंपर वोटिंग हुई है जैसी पहले कभी नहीं हुई। चुनाव आयोग इसके लिए अपनी पीठ ठोक रहा है क्योंकि इसने 2011 के मतदान के आँकड़े 84.33% को काफ़ी पीछे छोड़ दिया है।
पत्रकार और विश्लेषक 92% के इस आँकड़े के आधार पर पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि मतदान में इतनी ‘भारी’ बढ़ोतरी आख़िर क्यों हुई? कुछ लोग कह रहे हैं कि पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के आतंक के कारण विपक्षी दलों के समर्थक वोट नहीं कर पाते थे मगर इस बार कर पाए, इसलिए मतदान अधिक हुआ। कुछ कह रहे हैं कि SIR के कारण कई लोग डरे हुए थे कि अगर इस बार वोट नहीं दिया तो नागरिकता ही न चली जाए, इसलिए भारी मतदान हुआ है। कुछ लोग इसके लिए बीजेपी द्वारा ट्रेनों या बसों में भरकर लाए गए लोगों को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं।
लेकिन पहला सवाल तो यह है कि क्या बंगाल में वाक़ई रिकॉर्ड मतदान हुआ है। कुछ विश्लेषक तो पहले चरण के मतदान के बाद से ही कह रहे हैं कि 92% वोटिंग का यह आँकड़ा छलावा है। उनके अनुसार SIR के कारण जिन 64 लाख वोटरों के नाम कटे हैं, उसी के चलते वोटिंग परसेंटेज में वृद्धि दिख रही है। आसान भाषा में इसे यूँ समझा जा सकता है कि पिछली बार 100 में 82 लोगों ने वोट दिया था तो परसेंटेज 82 आया था (82/100x100=82%)। अब अगर इन 100 में से 9 लोगों के नाम निकाल दिए जाएँ और वही 82 लोग इस बार भी वोट करें जिन्होंने पिछली बार वोट किया था तो यह संख्या 82/91*100=90% हो जाएगी।
यानी जितने लोगों ने पिछली बार वोट किया था, उतनी ही संख्या ने इस बार भी वोट किया हो तब भी परसेंटेज अपने-आप बढ़कर 82 से 90 हो जाएगा।
लेकिन इस बार की वोटिंग का वास्तविक परसेंटेज तो 90 नहीं, 92 से अधिक बताया जा रहा है। यानी पहले से कुछ तो अधिक लोगों ने वोट किया होगा।
बिल्कुल। लेकिन कितने अधिक लोगों ने वोट किया, जब इस बात की हमने जाँच-पड़ताल की तो चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि इस बार पिछले चुनाव के मुक़ाबले वोट देने वालों की संख्या में हुई बढ़ोतरी 20 सालों में सबसे कम है।
2021 के मुक़ाबले कितने अधिक लोगों ने वोट दिया?
आइए, सबसे पहले यह जानते हैं कि इस बार 2021 के मुक़ाबले कितने अधिक लोगों ने वोट दिया। चुनाव आयोग ने ऐसा कोई डेटा जारी नहीं किया है लेकिन उसके द्वारा जारी कुल वोटर संख्या 6.81 करोड़ का 92.47% निकाला जाए तो यह आँकड़ा 6.30 करोड़ के आसपास निकलता है। अगर पोलिंग का अंतिम आँकड़ा कुछ बदले तो यह संख्या एक-दो लाख बढ़ सकती है। लेकिन उससे अधिक नहीं।तो चुनाव आयोग के डेटा के आधार पर ही हम कह सकते हैं कि इस बार 6.30 करोड़ वोटरों ने वोट दिया है।
अब देखें, यह संख्या पिछली बार की संख्या से कितनी अधिक है।
चुनाव आयोग के डेटा के अनुसार 2021 में 6.04 करोड़ लोगों ने वोट दिया था।
ऐसे में कुल वृद्धि हुई 6.30 - 6.04 = 26 लाख।
यानी इस बार 26 लाख अधिक वोटरों ने मतदान किया।
अच्छा आँकड़ा है। लेकिन क्या यह शानदार है, अभूतपू्र्व है? चुनाव आयोग की ‘कोशिशों’ का नतीजा है? या चुनाव आयोग की ‘करतूतों’ का परिणाम है?
आइए, जानते हैं कि पिछले चुनावों में मतदाताओं की संख्या कितनी बढ़ी थी।
पिछले बंगाल चुनाव का आँकड़ा
यानी इस बार के विधानसभा चुनाव में मतदान करने वालों की संख्या में हुई बढ़ोतरी - 26 लाख - पिछले बीस सालों में सबसे कम है।
तार्किक विसंगति के कारण 27 लाख नाम काटे
और इस कमी में सबसे बड़ा हाथ है चुनाव आयोग का जिसने तार्किक विसंगति के कारण कोई 27 लाख लोगों के नाम काट दिए। यदि उन 27 लाख लोगों में से भी 92% ने मतदान किया होता तो मतदाताओं की संख्या 25 लाख बढ़ जाती। तब मतदाताओं की संख्या में वृद्धि 51 लाख के आसपास होती। 2021 के 57 लाख के आँकड़े से कुछ ही कम।
अब आप ही निष्कर्ष निकालें कि चुनाव आयोग की कोशिशों से मतदान करने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है या कमी और इसके लिए वह शाबाशी का हक़दार है या लानत का।