प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर, किम लेन शैपेलेने अपने अध्ययन में पाया कि लोकतांत्रिक पतन की प्रक्रियाओं में न्यायपालिका पर नियंत्रण एक केंद्रीय तत्व है. जब अदालतें स्वतंत्र नहीं रहतीं और कानून को निष्पक्ष रूप से लागू नहीं कर पातीं, तब नागरिकों के लिए राज्य के विरुद्ध कानूनी प्रतिरोध के प्रभावी साधन समाप्त हो जाते हैं, जिससे कार्यपालिका की शक्ति लगभग आवारा हो जाती है. भारत में यही हो रहा है. चुनाव आयोग से कार्यपालिका मनमाने काम करवा रही है और न्यायपालिका ने आम नागरिकों के लिए कानूनी रास्ते बहुत मुश्किल कर दिए हैं.
‘संस्थाओं की निष्पक्षता’ भारत की सबसे बड़ी लक्ज़री बनकर उभरी है जिसका बोझ, भारत का लोकतंत्र वहन नहीं कर सकता. इसका उपभोग या तो सत्ता कर सकती है याफिर सत्ता के करीब बैठा उद्योगपति.
चुनाव परिणामों को भी इसी आलोक में समझना होगा. 5 राज्यों के चुनाव परिणाम आ चुके हैं. लेकिन इन परिणामों के विश्लेषण का तब तक कोई अर्थ नहीं जबतक निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित नहीं हो जाते. यह हार के बाद का ‘अलाप’ लग सकता है, कोई बहाना लग सकता है या ‘एस्केप रूट’ लेकिन निष्पक्ष चुनाव एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जितना प्रस्थान बिंदु के रूप में है उतना ही आरम्भ बिंदु के रूप में भी. बिना पारदर्शिता के किसी भी चुनाव परिणाम को समझाना सिर्फ़ जुगाली करना है. चुनावों में पारदर्शिता बनी रहे इसलिए संस्थाओं का निष्पक्ष होना जरुरी है.
चुनाव का अर्थ सिर्फ़ ‘मतदान’ नहीं है. यह चुनाव प्रक्रिया का वह हिस्सा है जिसकी संख्या और प्रतिशत देखकर लोकतंत्र के स्वास्थ्य का अंदाजा लगाना उतना ही मुश्किल है जितना बुख़ार देखकर कैंसर का अंदाजा लगाया जाना. चुनाव के कई अन्य अभिन्न अंग हैं जैसे- एक बेहद निष्पक्ष और सत्ता के दुरुपयोग से सतर्क निर्वाचन आयोग, चुनाव आचार संहिता, चुनाव प्रचार, मतदाता सूची, मतदान केंद्र, ईवीएम मशीनों की शुचिता, सुरक्षा बलों का प्रोफ़ेशनल और निष्पक्ष स्वरूप और अब आजकल SIR आदि. जबतक इन सभी पैमानों पर चुनाव ख़रा नहीं उतरता उसे निष्पक्ष चुनाव नहीं कहा जा सकता है. यदि केंद्रीय निर्वाचन आयोग(ECI) निष्पक्ष न रहे, और बार बार सत्ता के पक्ष में आचरण करता दिखे तो सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक कर्त्तव्य है कि ECI को संविधान में दी गईं तमाम शक्तियों के बावजूद उसे कानून और संविधान के रास्ते पर चलने के लिए बाध्य करे. 
शुम्पेटर (1943) से लेकर एडम प्रज़ेवोर्स्की (2000) तक ने अपने निबंधों और अध्ययनों में स्पष्ट किया है कि चुनाव प्रक्रिया को ही सामान्यतया लोकतंत्र के समतुल्य माना जा सकता है यानी इसे ही लोकतंत्र का सार माना जा सकता है बशर्ते नागरिक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में समान रूप से भाग ले सकें. लेकिन दुर्भाग्य से भारत में मतदान को ही चुनाव मान लिया गया, और ऐसे चुनाव को ही लोकतंत्र का सार, इसलिए इस बात की व्याख्या असंभव प्रतीत होने लगी कि जिन लोगों को लोकतंत्र में लगभग शून्य आस्था है वो चुनाव दर चुनाव कैसे जीतते जा रहे हैं.

जिस दिन बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर 47 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और इससे संबंधित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लंबित रहने के बावजूद चुनाव की इजाज़त दे दी गई उसी दिन से भारतीय लोकतंत्र में काले दिनों की शुरुआत हो गई थी. पूरे देश को यह बताया गया है कि जो मामला न्यायालय में लंबित होता है उस पर बात भी नहीं की जानी चाहिए, लेकिन यहाँ तो एक ऐसा मामला देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित था जो भारत के लोकतंत्र के लिए सबसे अहम था, इसके बावजूद देश की सर्वोच्च अदालत ने मतदान की इजाज़त दे दी. इसी तरह तमिलनाडु में भी 74 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया.

तमाम विशेषज्ञ इसके पीछे के कारण खोजते रहेंगे, कुछ इसे सराहेंगे तो कुछ इसकी आलोचना करेंगे. मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है कि जबतक भारत की सर्वोच्च अदालत किसी विषय पर अपना आधिकारिक फैसला नहीं देती वह उस मसले पर चुनाव आयोग के पक्ष में ‘इंटरमीडिएट फैसला’ दे देती है जिससे किसी को फ़ायदा हो सकता है, ऐसे में चुनाव करवाने की इजाज़त कैसे दी जा सकती है? न्याय के पदों पर बैठकर लोग किस न्याय के सिद्धांत का अनुसरण करते हैं जिसमें निर्णय को रोककर, पूरा फैसला सुनाए बिना भी फैसला एकतरफ़ा चुनाव आयोग के पक्ष में कर दिया गया? अब क्या न्यायिक फैसले भी ‘संविदा’ पर दिए जाएँगे? क्या यह न्याय प्रणाली का अलग स्वरूप तैयार किया जा रहा है जिसमें मुख्य फैसले के पहले भी एक फैसला किया जा सकता है जिसमें फ़ायदा हमेशा कार्यपालिका को ही होता है आम नागरिकों को नहीं. यह न्याय नहीं मजाक है.
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम पर अलग-अलग विशेषज्ञ अपनी राय देना शुरू कर चुके हैं, कोई ‘भौचक्का’ है तो किसी को ‘समझ में नहीं आ रहा’ है कि हुआ क्या है. कुछ फिर से SIR के मुद्दे पर आ जाएँगे तो कुछ को ईवीएम पर बात करते हुए पाया जाएगा. ये सभी लोग सही या ग़लत हो सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि यह चर्चा का विषय नहीं है, न आज है और ना ही कल था. चर्चा इस पर होनी चाहिए कि क्या पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव हुए? क्या पश्चिम बंगाल में चुनाव उसी तरह, उन्ही मानकों और आधारों पर करवाए गए जिन आधारों पर बाक़ी अन्य राज्यों में होते हैं. 

जब पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया पूरी ही नहीं हुई थी तो चुनाव आयोग द्वारा मतदान की इजाज़त क्यों दी गई? यदि चुनाव आयोग नहीं मान रहा था तो इस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक क्यों नहीं लगाई? जब अभी भी 27 लाख से अधिक नागरिकों के बारे में यह तय किया जाना बाक़ी था कि वो मतदाता हैं या नहीं, तो भी मतदान प्रक्रिया को क्यों नहीं रोका गया? समय पर 27 लाख लोगों के बारे में फैसला ना किए जाने का जिम्मेदार कौन था? यदि चुनाव आयोग की कमियां हैं तो मतदाता क्यों भोगें? अगर इस पर अभी फैसला नहीं आया कि 27 लाख में कितने मतदाता सूची में स्थान बनायेंगे तो किस आधार पर यह फैसला किया गया कि 27 लाख को मतदान ना करने दिया जाय?

जब पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया पूरी ही नहीं हुई थी तो चुनाव आयोग द्वारा मतदान की इजाज़त क्यों दी गई? यदि चुनाव आयोग नहीं मान रहा था तो इस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक क्यों नहीं लगाई? जब अभी भी 27 लाख से अधिक नागरिकों के बारे में यह तय किया जाना बाक़ी था कि वो मतदाता हैं या नहीं, तो भी मतदान प्रक्रिया को क्यों नहीं रोका गया? समय पर 27 लाख लोगों के बारे में फैसला ना किए जाने का जिम्मेदार कौन था? यदि चुनाव आयोग की कमियां हैं तो मतदाता क्यों भोगें? अगर इस पर अभी फैसला नहीं आया कि 27 लाख में कितने मतदाता सूची में स्थान बनायेंगे तो किस आधार पर यह फैसला किया गया कि 27 लाख को मतदान ना करने दिया जाय?
दुनिया की कौन सी अदालत है जिसे संविधान ने अभिरक्षक बनाया है, वो एक ऐसा फैसला देती है जो ख़ुद ही संविधान विरुद्ध है. लाखों की संख्या में मतदाताओं को मतदान से वंचित किया जाना अगर संवैधानिक और कानून सम्मत है तो निश्चित ही जिस संविधान की बात हो रही है वो किसी प्रतिनिधि लोकतंत्र का संविधान नहीं हो सकता है. क्योंकि प्रतिनिधि लोकतंत्र में सबसे पवित्र कोई नदी या धार्मिक स्थल नहीं होता बल्कि मतदाता सूची होती है. जब मतदाता सूची ही अपूर्ण और अशुद्ध है तो इसका मतलब है कि मतदान अशुद्ध है, चुनाव अशुद्ध है और इसलिए चुनाव परिणाम भी अशुद्ध है. यदि इस अशुद्ध चुनाव परिणाम के लिए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाएँ ज़िम्मेदार हैं तो यह निश्चित ही ऐतिहासिक और कालजयी दुर्भाग्य का विषय है.
वैसे तो पश्चिम बंगाल में तथाकथित ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ के लिए एक अप्रत्याशित फैसला किया गया जो किसी अन्य राज्य में नहीं किया गया था. यह अपने आप में आयोग की मंशा पर सवाल उठाता है फिर भी यदि सभी 27 लाख मतदाताओं की अर्ज़ी को, न्यायाधिकरणों द्वारा सुन लिया जाता, भले ही सबको मतदान सूची से हटा भी दिया जाता, तो भी यह माना जा सकता था कि निष्पक्ष चुनाव की कोशिश हुई है. जिन्हें लगता है कि ‘SIR इस चुनाव परिणाम का कोई फैक्टर नहीं है’, उन्हें इस बात का जवाब खोजना चाहिए कि अगर ऐसा है तो 27 लाख लोगों की वोट देने की योग्यता का निर्धारण हो जाने के बाद ही चुनाव का आयोजन क्यों नहीं हुआ? आख़िर चुनाव आयोग को इतनी जल्दी क्यों थी? सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब चुनाव परिणामों से ज़्यादा आवश्यक हैं. यदि इनके जवाब नहीं खोजे गए तो उत्तर प्रदेश भी पश्चिम बंगाल बनेगा और फिर से विपक्ष हाथ मलता रह जाएगा.

यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र में सत्ता से बाहर करने और सत्ता में लाने का अधिकार जनता को होना चाहिए न कि चुनाव आयोग और न्यायालयों को.

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डगलस नॉर्थ और बैरी वेंगास्ट ने अपने 1989 में प्रकशित लेख ‘कॉन्स्टिट्यूशंस एंड कमिटमेंट’ में लिखा है कि एक स्वतंत्र न्यायपालिका केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक ‘विश्वसनीय प्रतिबद्धता’ का उपकरण है जो कार्यपालिका की शक्ति को अनुशासित करता है. जबकि भारत में यहाँ की सर्वोच्च अदालत मनमाने फैसले लेने, अराजक माहौल बनाने, संवैधानिक अधिकारों को ‘होल्ड’ पर रखे जाने की इजाज़त दे रही है जो निश्चित ही विध्वंसक साबित हो सकती है. आम भारतीय लाइनों में लगकर यह साबित करने में लगा है कि वो भारत का नागरिक है और उसे वोट देने दिया जाय. वो लाइनों में लगा ही है और मतदान की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाती है. यह क्या है? भारत के नागरिकों को आधिकारिक रूप से यह क्यों नहीं बता दिया जाता कि अब यहाँ लोकतंत्र नहीं रहा.
स्टीवन लेविट्स्की और डैनियल ज़िब्लैट ने अपनी पुस्तक ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’(2018) में वेनेजुएला, हंगरी, तुर्की, पोलैंड, रूस और अन्य देशों का अध्ययन किया जहाँ उन्हें लोकतांत्रिक मृत्यु की लगभग समान संरचना दिखाई दी। दोनों का मानना है कि लोकतांत्रिक पतन के चुनावी मार्ग पर सड़कों पर टैंक नहीं होते, संविधान और अन्य लोकतांत्रिक संस्थाएँ नाममात्र की और यथावत बनी रहती हैं, और लोग मतदान करते रहते हैं. और इस तरह निर्वाचित तानाशाह का जन्म होता है, जो निर्वाचन और लोकतंत्र दोनों का ही दिखावा बनाये रखता है. 
लेखकों के अनुसार, लोकतंत्र को कमजोर करने के सरकारी प्रयासों में से कई "कानूनी" होते हैं, इस अर्थ में कि उन्हें विधायिका द्वारा अनुमोदित और न्यायालयों द्वारा स्वीकार भी किया जाता है इतना ही नहीं ऐसे तानाशाहों को लोकतंत्र को बेहतर बनाने के प्रयासों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जैसे- न्यायपालिका को अधिक कुशल बनाना या भ्रष्टाचार से लड़ना आदि. भारत का मामला भी अलग नहीं है. भारत को भी ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में परिभाषित किया जा रहा है(V-Dem रिपोर्ट). भारत में संसद के माध्यम से ‘सूचना के अधिकार’ जैसे क़ानूनों को कमजोर किया जाना, संसद के माध्यम से मुख्य निर्वाचन आयुक्त के चयन की प्रकिया को कमजोर किया जाना ऐसे ही उदाहरण हैं.
मुझे लगता है कि भारत में लोकतंत्र मरा नहीं है लेकिन ज़िंदा दिखने वाले ‘लक्षण’ भी तेजी से कम होते जा रहे हैं. स्टीवन लेविट्स्की और डैनियल ज़िब्लैट ने अपनी पुस्तक में “अंपायरों पर कब्ज़ा” को इस रूप में व्याख्यायित किया है कि निर्वाचित नेता एक महत्वपूर्ण और अक्सर कानूनी रणनीति के जरिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को भीतर से कमजोर करते हैं. उनका मानना है कि स्वतंत्र न्यायपालिकाएँ अक्सर ऐसे निर्वाचित तानाशाहों की पहली शिकार होती हैं. भारत में भी यह स्पष्टरूप से दिख रहा है. चाहे नोटबंदी को जायज़ ठहराना हो, चुनावी बांड के माध्यम से पहले अरबों कमाना और बाद में बिना कार्यवाही के छूट जाना, महाराष्ट्र में खुलेआम हॉर्स-ट्रेडिंग पर अनंत कालीन चुप्पी, अयोध्या-विवाद का विवादास्पद फैसला और उसके बाद पूरे देश में सांप्रदायिक माहौल का उमड़ना सबकुछ भारत की सर्वोच्च अदालत के माध्यम से किया गया.
अगर ऐसे ही ‘अंपायरों पर कब्ज़ा’ जारी रहा तो सिर्फ़ मैच ख़राब नहीं होगा, बल्कि ‘ऑडियंस’ और ‘मैदान’ दोनों अप्रासंगिक हो जाएँगे.
सम्पूर्ण विपक्ष को एकजुट होकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय से पूछना चाहिए कि अगर आपको ‘कार्यपालिका’ की ही बात माननी और सुननी है तो हमारा आपके पास आने से क्या फ़ायदा? यदि हर बात में सरकार ही सही है तो दूसरे पक्ष को अदालत तक आने की जहमत क्यों उठाना?
विपक्ष को माँग करना चाहिए कि हाल में जिन भी राज्यों में SIR हुए हैं और उनपर सुप्रीम कोर्ट का ‘अंतिम निर्णय’ नहीं आया है और इसके बाद भी चुनाव आयोजित हो गए हैं तो परिणाम चाहे कुछ भी आया हो, चुनाव अवैध माने जाने चाहिए क्योंकि यह चुनाव झूठे और आधे-अधूरे प्रतिनिधित्व पर आधारित हैं जोकि ‘सार्वभौमिक मताधिकार’ के अधिकार और सिद्धांत के पूरी तरह ख़िलाफ़ हैं. इस तरह बंगाल चुनाव में भाजपा की जीत बंगाल के ही 27 लाख मतदाताओं के मतदान के अधिकार की हत्या का परिणाम है.