बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने सात महीने में टीम बनाई। दिल्ली को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। कोई उपाध्यक्ष, महामंत्री या सांसद नहीं लिया गया। वीरेंद्र सचदेवा भी बाहर। सिर्फ दो मामूली नेताओं को जगह मिली। पढ़िए, वरिष्ठ पत्रकार दिलबर गोठी का विश्लेषण।
बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी टीम बनाने में सात महीने लगा दिए। 20 जनवरी को अध्यक्ष बने और 18 अगस्त को उनकी टीम के 64 और सदस्यों को जोड़ा गया। अभी टीम का विस्तार किया जा सकता है लेकिन अब तक की टीम से राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं कि आखिर दिल्ली को इतना नजरअंदाज क्यों किया गया है? राष्ट्रीय टीम में कभी दिल्ली का ही बोलबाला रहा करता था। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके थे। आडवाणी तो दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष भी रहे और यहीं से उनकी राजनीति की शुरुआत भी हुई।
बलराज मधोक, विजय कुमार मल्होत्रा, मदन लाल खुराना, केदारनाथ साहनी, कंवरलाल गुप्ता, साहिब सिंह वर्मा, डॉ. हर्षवर्धन आदि बीजेपी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री या ऐसे ही उच्च पदों पर रह चुके हैं लेकिन इस बार न कोई उपाध्यक्ष और न कोई महामंत्री दिल्ली से लिया गया है। दिल्ली के किसी सांसद को राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिली। यहाँ तक कि प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए गए वीरेंद्र सचदेवा को भी भुला दिया गया।
दिल्ली के दो नेताओं को मिली ऐसी ज़िम्मेदारी
अगर देखा जाए तो दिल्ली से केवल दो नेताओं जयप्रकाश जेपी और राजीव बब्बर को ही नितिन नवीन की टीम में जगह मिली है लेकिन इन दोनों के लिए यह व्यक्तिगत उपलब्धि अवश्य हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर उन्हें कोई महत्वपूर्ण जगह नहीं दी गई। राजीव बब्बर को संबित पात्रा की टीम में नॉर्थ-ईस्ट सह संयोजक पद पर रखा गया है। राजीव बब्बर का भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से क्या लेना-देना है, यह किसी को पता नहीं है। जहां तक जयप्रकाश जेपी का सवाल है तो उन्हें 16 मंत्रियों में से एक बनाया गया है। उनका कद जरूर बढ़ा है लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि दिल्ली को महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व मिल गया है।
दिल्ली के नाम पर जो पदाधिकारी नितिन नवीन टीम में हैं, उन्हें दिल्ली के कोटे से कैसे जगह मिल गई, यह बीजेपी ही बता सकती है। कहने को दिल्ली के कोटे से प्रदीप भंडारी और सिद्धार्थ यादव को मीडिया टीम में सह संयोजक और शिवानंद द्विवेदी को सोशल मीडिया टीम में सह संयोजक बनाया गया है। इन पदों को राजनीतिक नहीं माना जा सकता। बीजेपी में सबसे पॉवरफुल महामंत्री होते हैं संगठन महामंत्री और इस पद पर बी.एल. संतोष को फिर से लिया गया है लेकिन वह कर्नाटक की बजाय दिल्ली के प्रतिनिधि के रूप में दिखाया गया है।
बीएल संतोष के अलावा सुनील बंसल भी दिल्ली के कोटे से ही महामंत्री हैं। उपाध्यक्षों की सूची में राम माधव भी दिल्ली के कोटे से दोबारा मेनस्ट्रीम में लाए गए हैं जबकि इन सभी नेताओं का दिल्ली की राजनीति से कोई वास्ता नहीं है।
डॉ. संदीप पाठक आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में आए तो उन्हें पार्टी में मंत्री पद दिया गया है लेकिन वह भी पंजाब से राज्यसभा सदस्य हैं, दिल्ली से नहीं। इसी तरह मंत्री बनाए गए डॉ. स्वदेश सिंह को दिल्ली का कोई राजनेता नहीं जानता।
दिल्ली के सांसद-विधायक को भी जगह नहीं
सबसे ज़्यादा हैरानी दो बातों पर हुई है- पहली तो यह कि दिल्ली के किसी भी सांसद या फिर विधायक को राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिली। सांसदों के लिए मोदी सरकार के मंत्रिमंडल के विस्तार की संभावनाएँ छोड़ दी गई हैं। हर्ष मल्होत्रा के प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद मंत्रिमंंडल से उनका हटना स्वाभाविक है और उनकी जगह किसे मंत्री बनाया जाता है, इसके कयास लग रहे हैं लेकिन विधायकों में से भी किसी को भी राष्ट्रीय टीम के योग्य नहीं माना गया, यह आश्चर्यजनक है। दिल्ली में बीजपी सरकार को बने अभी डेढ़ साल ही हुआ है। इसलिए दिल्ली के मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना भी जल्दी नहीं बनती। वैसे भी दिल्ली में मुख्यमंत्री समेत सात ही मंत्री बन सकते हैं, इसलिए विधायकों को खपाने के लिए पद तलाशने पड़ते हैं।वीरेंद्र सचदेवा बाहर क्यों?
दूसरी बात जो सभी को हैरान कर रही है, वह है वीरेंद्र सचदेवा को नितिन नवीन की टीम में जगह न मिलना। दिल्ली में बीजेपी 27 साल बाद सत्ता में लौटी और यह वीरेंद्र सचदेवा के अध्यक्ष काल में ही संभव हो पाया। उन्हें इस बात का पूरा क्रेडिट भी दिया जाता है कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल की सरकार को अस्थिर करने में पूरी ताकत लगा दी और लगातार सक्रियता बनाए रखी। अब उन्हें इसका इनाम नहीं दिया गया तो अवश्य ही कोई कारण होगा। कहते हैं कि सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और सभी सांसद उनसे खुश नहीं थे। इसकी शिकायत हाईकमान तक भी गई थी। अब उन शिकायतों का असर है या फिर कोई और कारण है, यह तो हाईकमान को ही पता है लेकिन वीरेंद्र सचदेवा की राजनीति को फिलहाल विराम लगता दिखाई दे रहा है।
दिल्ली में अभी राज्यसभा चुनाव भी नहीं हैं। इसलिए उन्हें वहां से लाने की कोई संभावना भी दिखाई नहीं देती। वर्तमान राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल जनवरी 2030 तक है और दिल्ली विधानसभा चुनाव भी जनवरी 2030 में ही होने हैं। इस प्रकार बीजेपी के शासनकाल में दिल्ली में राज्यसभा चुनाव नहीं होंगे। वैसे, दिल्ली से राज्यसभा सदस्य स्वाति मालीवाल जरूर दलबदल करके बीजेपी के खाते में जा चुकी हैं। पार्टी में स्वाति मालीवाल को भी कोई स्थान नहीं मिला।
बीजेपी में अक्सर यह नीति रही है कि स्थानीय नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर पद देकर उन्हें ग्रोथ दी जाती है ताकि नई लीडरशिप उभर सके। इस नज़रिए से देखें तो नितिन नवीन की नई टीम में दिल्ली के नेताओं को कुछ खास नहीं मिला।