एक कारण यह हो सकता है कि राहुल गांधी 2-3 अप्रैल के पहले तक तय नहीं कर पा रहे हों कि उन्हें किसकी सलाह मानकर अंतिम निर्णय लेना चाहिए ? निचली अदालत की सज़ा के ख़िलाफ़ अपील में हुए विलंब से अब यह संदेश अवश्य जा सकता है कि महत्वपूर्ण मसलों पर भी कांग्रेस अंदर से एकमत नहीं है। ऐसा मानकर चलने से राहुल गांधी की कोई अवमानना भी नहीं हो जाएगी कि जिस तरह की सहानुभूति उन्होंने सज़ा सुनाए जाने और लोकसभा की सदस्यता से निष्कासन के बाद देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त की थी न सिर्फ़ उसमें ही बल्कि उनकी अविस्मरणीय ‘भारत जोड़ो यात्रा ‘ की उपलब्धियों में भी पार्टी के असमंजस और उनकी लीगल टीम की कमज़ोरियों ने सेंध लगा दी !
इस सवाल का उत्तर किसी आगे की तारीख़ के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है कि क्या पार्टी के किसी प्रभावशाली ख़ेमे के दबाव के चलते ही राहुल को आगे की क़ानूनी कार्रवाई के लिए राज़ी होना पड़ा ? कांग्रेस के एक तबके की ऐसी सोच भी रही है कि चाहे कुछ समय के लिए ही सही राहुल को एक बार तो जेल अवश्य जाना चाहिए। ऐसा हो जाने से कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में ज़्यादा आक्रामक बनकर प्रकट होगी ! पार्टी की अंदरूनी लड़ाइयाँ भी बंद हो जाएँगी और वह एक होकर भाजपा से मुक़ाबले के लिये जुट जाएगी।