योगेंद्र यादव का कहना है कि जातिवार जनगणना अब व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुकी है, भले ही सरकार ने अभी इसकी औपचारिक घोषणा न की हो। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा अधिसूचित 40 सवालों की सूची में जाति का प्रश्न "खुला" रखा गया है — यानी कोई पहले से तय ड्रॉपडाउन सूची नहीं दी गई है, गणनाकर्मी वही दर्ज करेगा जो व्यक्ति बताएगा। यह ठीक वही तरीका है जो 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) में अपनाया गया था, जिसमें लगभग 46.7 लाख अलग-अलग जाति/उपजाति नामों की प्रविष्टियाँ मिली थीं, जिन्हें वर्गीकृत करना असंभव साबित हुआ और डेटा कभी प्रकाशित नहीं हो सका।

गौरतलब है कि 2021 में मोदी सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि 2011 की गणना में ड्रॉपडाउन मेन्यू होना चाहिए था। बिहार और तेलंगाना की जातिवार गणनाओं में यही तरीका अपनाकर सफलतापूर्वक काम भी हुआ। फिर भी 2027 की जनगणना में सरकार ने वही खुला प्रारूप चुना है, जिससे उपयोगी आँकड़े मिलने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।

जातिवार जनगणना और बीजेपी

योगेंद्र यादव के अनुसार, बीजेपी शुरू से जातिवार जनगणना के विरोध में रही है — इसे "अराजक" और "देश तोड़ने वाला" विचार बताया जाता रहा। लेकिन ओबीसी समुदाय के बढ़ते दबाव में अप्रैल 2025 में सरकार ने अचानक घोषणा कर दी कि जातिवार जनगणना होगी। उस वक्त भी शक बना रहा कि क्या सरकार वाकई इसे ईमानदारी से लागू करेगी।

यादव करते हैं कि जनगणना के पहले चरण — हाउसहोल्ड लिस्टिंग — में जब एससी, एसटी और "अन्य" जैसे मोटे कॉलम सामने आए, तो संदेह पहली बार पुख्ता हुआ। सरकार ने तब आश्वासन दिया कि असली चरण अभी बाकी है और गृह मंत्री ने संसद में भी भरोसा दिलाया। लेकिन अब जब दूसरे चरण के प्रश्न सार्वजनिक हो चुके हैं, वही आशंका सच साबित हुई है।
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सर्वे पद्धति की तकनीकी गुगली

यादव इसे सर्वे-पद्धति की भाषा में समझाते हैं। किसी भी बड़े सर्वेक्षण में दो तरह के सवाल होते हैं — ओपन-एंडेड (जिसमें व्यक्ति अपने शब्दों में जवाब देता है) और क्लोज्ड-एंडेड या स्ट्रक्चर्ड (जिसमें पहले से तय विकल्पों में से चुनना होता है)। थोड़े लोगों के सर्वे में ओपन-एंडेड सवाल चल जाते हैं, लेकिन 140 करोड़ लोगों की जनगणना में बिना पूर्व-निर्धारित सूची के जाति पूछना व्यावहारिक रूप से बेकार साबित होता है।

अगर ड्रॉपडाउन मेन्यू होता, तो जैसे ही कोई व्यक्ति "ओबीसी" कहता, राज्यवार पहले से तैयार सूची से मिलान करके तुरंत उसकी उपजाति दर्ज हो जाती और अगले दिन सुबह कंप्यूटर बता सकता कि किसी राज्य में किसी समूह के कितने लोग हैं। लेकिन खुले प्रश्न में हर व्यक्ति अपने ढंग से जवाब देता है — कोई जाति का नाम बताता है, कोई गोत्र, कोई सरनेम। एक ही परिवार में पिता "यादव" लिखवाता है तो चाचा "राव", कोई खुद को "अहीर" कहता है। नतीजा यह होता है कि एक ही सामाजिक समूह के दर्जनों अलग-अलग नाम दर्ज हो जाते हैं, जिनका विश्लेषण करना लगभग असंभव हो जाता है। ठीक यही 2011 में हुआ था — 46.7 लाख अलग प्रविष्टियाँ आईं, कमेटियाँ वर्षों बैठीं, 97% नामों का वर्गीकरण भी हो गया, लेकिन 2016-17 में मोदी सरकार ने ही आगे का काम रोक दिया और डेटा कभी जारी नहीं हुआ।

योगेंद्र यादव एक शोधकर्ता (विद्याथली) की किताब के हवाले से बताते हैं कि 2011 में संसद की सर्वसम्मत राय के बावजूद जाति जनगणना को नौकरशाही स्तर पर तकनीकी पेचीदगियों के जरिए बेअसर कर दिया गया था। इस बार भी वही पटकथा दोहराई जा रही है।

अखबार की रिपोर्ट और मंत्री का बयान

यादव इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जिसमें अधिकारियों ने माना कि यह "वही 2011 वाला खेल" होगा। एक अनाम कैबिनेट मंत्री का बयान भी उद्धृत करते हैं जिसका आशय था कि विपक्ष के दबाव में जनगणना करवा तो दी गई, अब जो नतीजा निकलेगा वह भुगता जाएगा। यादव के अनुसार यह साफ़ दिखाता है कि सरकार को शुरू से पता था कि आँकड़े उपयोगी नहीं निकलेंगे।

दो संभावित रणनीतियाँ

यादव दो संभावनाएँ रखते हैं। पहली— शुरू से ही सरकार की मंशा जनगणना को ठीक से न करवाने की थी, और घोषणा केवल राजनीतिक दबाव कम करने के लिए की गई, यह मानकर कि बाद में इसे "मैनेज" कर लिया जाएगा। दूसरी — शुरू में सरकार वाकई गंभीर थी, लेकिन बाद की दो घटनाओं ने रुख बदल दिया: पहला, यूजीसी से जुड़े विवाद में सवर्ण युवाओं में यह भावना बनी कि सरकार ओबीसी को जरूरत से ज्यादा रियायत दे रही है; दूसरा, हाल में हुए छात्र आंदोलन (जिसे यादव "जुलाई क्रांति" कहते हैं) में सड़क पर उतरने वाले ज्यादातर युवा सवर्ण पृष्ठभूमि के और परंपरागत बीजेपी समर्थक परिवारों से थे। इन दोनों घटनाओं ने सरकार को आशंकित किया कि उसका मूल (सवर्ण) वोट बैंक नाराज़ हो सकता है, इसलिए जातिगत गणना को व्यवहारिक रूप से कमजोर कर दिया गया।

क्या-क्या हाथ से निकल गया?

यादव के अनुसार जाति जनगणना से जो सबसे बड़ी बातें सामने आतीं, वे अब अधर में लटक गई हैं:
  1. ओबीसी की सही जनसंख्या— 37 साल से ओबीसी आरक्षण लागू है, लेकिन आज तक उनकी सही जनसंख्या किसी को पता नहीं। यादव का अनुमान है कि यह आँकड़ा 45 से 50 प्रतिशत के आसपास हो सकता है, जो मौजूदा 27% कोटे से कहीं ज्यादा है और इससे आरक्षण बढ़ाने का राजनीतिक दबाव बन सकता था।
  2. ओबीसी के भीतर की विषमता— ओबीसी कोई एक समान समूह नहीं है। इसमें कुछ भूस्वामी और आर्थिक रूप से सक्षम समुदाय हैं तो कुछ खानाबदोश या दलितों से भी बदतर हालत वाले समूह। बिना ठोस आँकड़ों के "क्रीमी लेयर" बहस और वास्तविक ज़रूरतमंद वर्गों की पहचान असंभव बनी रहेगी।
  3. सवर्ण समाज के विशेषाधिकारों की तस्वीर — किसी भी सामाजिक विषमता को पूरी तरह समझने के लिए सिर्फ वंचितों का नहीं, बल्कि लाभान्वित वर्ग का भी आंकड़ा जरूरी होता है (जैसे अमेरिका में नस्लीय विषमता समझने के लिए श्वेत आबादी का भी सर्वे होता है)। यह डेटा भी अब उपलब्ध नहीं होगा।
  4. नीति-निर्माण का औजार — शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी नीतियों को जातिगत आधार पर बेहतर बनाने के लिए जो डेटा चाहिए था, वह अब उपलब्ध नहीं होगा, और आरक्षण-सूची में जोड़-घटाव जैसे मसले तर्कसंगत आधार के बजाय राजनीतिक दंगल बनकर रह जाएंगे।

व्यावहारिकता का सवाल

मुकेश कुमार के इस सवाल पर कि क्या यह सिर्फ दो राज्यों (बिहार, तेलंगाना) तक सीमित उदाहरण है, यादव स्पष्ट करते हैं कि पूर्व-निर्धारित जाति-सूचियों के आधार पर सर्वेक्षण देश के कई राज्यों — कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश — में पहले भी हो चुके हैं। तेलंगाना में करीब 250-300 और बिहार में करीब 240 जातियों की सूची बनाकर लोगों से पूछा गया कि वे किस श्रेणी में आते हैं; जो सूची में नहीं मिले, उनका अलग से नोट बना लिया गया। यानी यह तरीका न सिर्फ संभव है, बल्कि व्यवहार में सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है — इसके बावजूद सरकार ने जानबूझकर इसे नहीं अपनाया।

क्या ओबीसी समाज को इसका एहसास है?

यादव मानते हैं कि ओबीसी का बौद्धिक-राजनीतिक नेतृत्व इस "खेल" को समझता है, लेकिन आम ओबीसी समाज तक अभी यह बात नहीं पहुँची है। वे मंडल कमीशन के दौर की मिसाल देते हैं, जब कई ओबीसी समुदायों को यह पता ही नहीं था कि आरक्षण उन्हीं के लिए है, और कुछ तो मंडल-विरोधी प्रदर्शनों में भी शामिल हो गए थे। स्थिति अब बेहतर है, लेकिन "ओपन-एंडेड सवाल" को सरकार आसानी से एक सुधार की तरह पेश कर सकती है, जिससे बहुत से लोग भ्रमित हो सकते हैं।

आगे क्या होगा यह इस पर निर्भर करेगा कि ओबीसी नेतृत्व और विपक्षी दल इस मुद्दे को कितनी शिद्दत से उठाते हैं। यादव के अनुसार, दुनिया भर में वंचित समुदाय अक्सर अपनी वंचना के बारे में खुद भी पूरी तरह अवगत नहीं होते — यह बदलाव धीरे-धीरे और नेतृत्व के प्रयासों से ही आता है, जैसा वी.पी. सिंह के मंडल कमीशन लागू करने के बरसों बाद ही व्यापक रूप से महसूस हुआ था।

फिलहाल विपक्ष भी असमंजस में है, क्योंकि हाल के छात्र आंदोलन के बाद जाति के सवाल को बहुत आक्रामकता से उठाने पर आंदोलन बंट सकता है या सवर्ण समर्थन खिसक सकता है। यादव के मुताबिक बीजेपी की गणना यही है कि सवर्ण वर्ग समझ जाएगा कि जाति जनगणना रुकवा दी गई, जबकि ओबीसी को इसका एहसास ही नहीं होगा।

क्या रास्ता बचा है?

अदालतों से यादव को उम्मीद नहीं दिखती, क्योंकि यह मामला पहले भी अदालतों में जा चुका है और कोई ठोस फैसला नहीं आया। उनका मानना है कि इस देश में सबसे वंचित तबके को जो कुछ मिलता है, वह अदालत से नहीं बल्कि राजनीति और सड़क से मिलता है। अगर बीजेपी के अपने ओबीसी सांसद-नेता खुलकर सवाल उठाएँ, तभी वास्तविक दबाव बन सकता है।

समय भी सीमित है — जनगणना का फॉर्मेट अलग-अलग इलाकों में अलग समय पर लागू होगा (जैसे लाहौल-स्पीति में नवंबर में ही शुरू हो जाएगी, बाकी जगह फरवरी में), और एक बार किसी क्षेत्र में गणना शुरू होने के बाद फॉर्म में बदलाव संभव नहीं रहेगा। यानी बदलाव के लिए सिर्फ कुछ ही हफ्तों की गुंजाइश बची है।

नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर की आशंका

बातचीत के दूसरे हिस्से में मुकेश कुमार यह सवाल उठाते हैं कि क्या जनगणना के बहाने चुपचाप NPR की तैयारी की जा रही है। इस बार जनगणना में फोन नंबर, पासपोर्ट और खासकर माता-पिता से जुड़े विवरण जैसे नए सवाल जोड़े गए हैं। यह अहम इसलिए है क्योंकि भारत के नागरिकता कानून में हुए बदलावों (1987 और 2004 के बाद) के तहत अब सिर्फ भारत में जन्म लेना नागरिकता के लिए काफी नहीं — माता-पिता में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना जरूरी है, और 2004 के बाद जन्मे लोगों के लिए यह भी साबित करना होगा कि दूसरा माता-पिता "अवैध प्रवासी" नहीं था।
यादव स्पष्ट करते हैं कि सेंसस कानूनन एक गोपनीय दस्तावेज़ है — किसी व्यक्ति-विशेष का उत्तर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, सिर्फ समग्र आंकड़े (जैसे किसी गांव में कितने प्रतिशत लोग किस समुदाय के हैं) जारी किए जा सकते हैं। इसलिए सेंसस डेटा सीधे तौर पर NPR के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता।

लेकिन साथ ही वे मानते हैं कि यह संदेह स्वाभाविक है कि यह पहला कदम हो सकता है — सूचना एकत्र होने के बाद, गृह मंत्रालय स्तर पर उसका विश्लेषण करके यह चिह्नित किया जा सकता है कि किन इलाकों में माता-पिता से जुड़ी जानकारी किसी और स्रोत से मेल नहीं खाती, और वहां आगे जांच शुरू हो सकती है। कानूनन सेंसस के आधार पर सीधे किसी को राशन कार्ड या किसी सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता, लेकिन इससे भविष्य में दुरुपयोग की एक खिड़की जरूर खुल सकती है — खासकर मौजूदा सरकार के कामकाज के तरीके को देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं लगती।

युवा असंतोष और आगे की राह

योगेंद्र यादव जुलाई में दिल्ली की सड़कों पर उतरे युवाओं के आंदोलन, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के गांवों तक फैली बेचैनी को एक बड़े, गहरे असंतोष की झलक बताते हैं। उनके अनुसार समाज में — खासकर युवाओं में — भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता और गुस्सा है, लेकिन अभी यह गुस्सा किसी स्थापित विपक्षी नेतृत्व के पीछे संगठित नहीं हो पाया है, जबकि चुनावी नतीजों में यह असंतोष सतह पर नहीं दिखता।

यादव उम्मीद जताते हैं कि यह बदलाव लोकतांत्रिक और संस्थागत दायरे में, शांतिपूर्ण तरीकों से हो। लेकिन आगाह भी करते हैं कि अगर संस्थाओं का गला घोंटा जाता रहा, आवाज़ों को दबाया जाता रहा, तो असंतोष किसी और, कम लोकतांत्रिक रास्ते से फूट सकता है — जो लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होगा। हालांकि उन्हें संदेह है कि मौजूदा सरकार इस चेतावनी को गंभीरता से लेगी।

(यह लेख मुकेश कुमार और योगेंद्र यादव की मूल बातचीत का संक्षिप्त रूप है।)