क्या हम एक भयभीत भारत में रह रहे हैं? शायद हां, शायद ना! जब हम सरकार, शासक वर्ग, उसके समर्थक वर्ग और मीडिया की ओर निगाह दौड़ाते हैं तो लगता है कि वे बेहद डरे हुए हैं। उन्हें अमेरिका का भय है, उन्हें चीन का भय है, उन्हें पाकिस्तान के राजनीतिक पैंतरों का भय है। उन्हें विदेशी आंदोलनों का भय है और अब तो देशी आंदोलनों का भय है। हाल में भारत तिब्बत सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर चीनी घुसपैठ और उससे चलने वाली झड़पों का जिक्र किया। वह चिंता की बात है। उससे भी अधिक चिंता की बात यह तथ्य भी है हमारे पास जो हथियार हैं वे पचास साल पुराने हैं जबकि चीन की तैयारी काफी आगे की है। सरकार तुरंत इस मामले की लीपापोती में लग गई। महानिदेशक महोदय का वीडियो आईटीबीपी की साइट से हटवा दिया गया और विदेश मंत्रालय ने अपने बयानों में इसे सामान्य झड़पों की श्रेणी में डाल दिया।
मार्को रूबियो की जामनगर यात्रा
एक विचित्र घटना उस समय भी हुई जब अमेरिका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो तमाम राजनयिक प्रोटोकाल को दरकिनार करके भारत की राजधानी के बजाय जामनगर और मुंबई पहुंचे। जब वे अंबानी की रिफायनरी को अमेरिका द्वारा अनैतिक और गैर कानूनी रूप से बनाए गए उपनिवेश वेनेजुएला के गाढ़े तेल की सफाई के लिए तैयार कर रहे थे, तभी भारत के पेट्रोलियम मंत्री का एपस्टीन फाइल का वीडियो जारी कर दिया गया। सरकार और सरकार समर्थक मीडिया इस पर भी खामोश रहा। उल्टे सरकार की चाटुकारिता में लगे रांची के एक पत्रकार ने इसी तरह का सोनिया गांधी का फर्जी वीडियो जारी कर दिया।
विडंबना देखिए कि देश भर में चल रहे एसआईआर विरोधी आंदोलन की खबरें मुख्यधारा के दरबारी चैनलों और अखबारों से गायब रहती हैं लेकिन फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल और अल्बानिया में चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन के समाचारों को बढ़चढ़ कर दिखा रहे हैं। वहां की हिंसा को दर्शा कर भारत के आंदोलनों को बदनाम किया जा रहा है और डराया जा रहा है कि देश की तरक्की से जलने वाली विदेशी शक्तियों की साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है। ऐसे में भारत के पौराणिक इतिहास में वर्णित इंद्र नामक देवता की कहानी बड़ी याद आती है। वैदिक युग में इंद्र बहुत प्रतिष्ठित और युद्ध विजेता वाले देवता के रूप में उपस्थित हैं। लेकिन उनकी ईर्ष्या की प्रवृत्ति सभी को अखरती है। जब भी कोई कहीं तप करने लगता है और देवत्व प्राप्त करना चाहता है तो उनका सिंहासन डोलने लगता है। वे किसी भी तरह से उसके तप को भंग करने का इंतज़ाम करते हैं। यानी इंद्र एक भयभीत देवता के रूप में उभरने लगते हैं। शायद इसी वजह से परवर्ती काल में वे ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग।
SIR से 13 करोड़ मताधिकार छीना जाना मुद्दा नहीं?
भारत के मौजूदा शासकों के बारे में कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। बिना इस बात पर विचार किए कि भारत में एसआईआर यानी 13 करोड़ लोगों के मताधिकार छीने जाने के विरुद्ध चलने वाला आंदोलन अभी भी शांतिपूर्ण है, शासक वर्ग अपने भय से ग्रसित होकर उसके विरोध में हल्ला मचाने में लगा है। वह अपना भय मिटाने के लिए जनता को भयभीत करने में लगा है। अपने समर्थक वर्ग को इस तरह सामने ला रहा है जैसे अगर गृहयुद्ध हो जाए तो बेहतर। यानी भयभीत और चरित्रहीन इंद्र के आसन की तरह उसका आसन डोल रहा है। वास्तव में जो किसी को डराता है वह अभय नहीं हो सकता। अभय की परिभाषा ही यही है कि जो न किसी से डरे और न किसी को डराए। यह स्थिति तभी बनती है जब संवाद कायम रहता है और अहंकार पर आरूढ़ जिद नहीं की जाती। वह जिद न तो सरकार की ओर से होनी चाहिए और न ही नागरिकों की ओर से।
अगर सरकार जनता द्वारा जनता के लिए और जनता की है तो उस सरकार को अपनी जनता से संवाद करने में डर कैसा। अगर किसी सरकार को ईमानदारी और निष्पक्ष और कानूनी तरीके से जनता ने चुना है तो जनता को उससे शिकायत हो सकती है, लेकिन न तो उस पर अविश्वास हो सकता है और न ही भय।
लेकिन आज भारत में स्थिति उलट गई है। सरकार भयभीत है और जनता अभय हो चली है। अखंड भारत का नारा लगाने वाला संघ परिवार अरुणाचल और लद्दाख में चीन की घुसपैठ को लेकर खामोश है। चीन देश की सीमा पर गांव बसा रहा है और संघ परिवार को भारत में घुसे बांग्लादेशी दिखाई पड़ रहे हैं। वह स्वयं तो दशहरे पर शस्त्रपूजन करता है लेकिन अपने सुरक्षा बलों को शस्त्र मुहैया ही नहीं करा पाता। उल्टे उसे रिजीम चेंज का डर सता रहा है।
अभय नागरिकों का वर्ग सड़क पर उतरा
लेकिन भयभीत शासक वर्ग के विरुद्ध देश में अभय युवा, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और वामपंथी दलों के नेता खड़े हो गए हैं। भयभीत सरकार और अपने लिए आज्ञापालक समाज बनाने में लगे संघ परिवार के विरुद्ध देश में अभय नागरिकों का एक वर्ग अब घरों से बाहर निकल कर सड़कों पर आ चुका है। इसमें युवा, किसान, मजदूर और कर्मचारी सभी हैं। वे तमाम बुनियादी मुद्दों को उठा रहे हैं और अहिंसक तरीके से एक नई बहस को जन्म दे रहे हैं। एक तरह से भारत और दुनिया को फ्रांस, इटली, पुर्तगाल के आंदोलनों से सबक लेने के बजाय उन्हें भारत के आंदोलनों से सबक लेना चाहिए और इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। यह आंदोलन गांधी के रास्ते पर चलकर बुनियादी सवालों को उठा रहा है। उदाहरण के लिए वामपंथी छात्र संगठन आइसा की प्रमुख नेहा बोरा ने मजिस्ट्रेट के तौर पर काम कर रहे पुलिस अधिकारी के शांति बांड पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर एक नई बहस छेड़ दी है। नेहा ने हाई कोर्ट के सामने भी यह सवाल उठाया है कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना शांतिभंग है? क्या संविधान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को भारतीय न्याय संहिता और भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता की धाराओं से खारिज किया जा सकता है। नेहा वोरा, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और उनके जैसे कई नागरिकों ने तमाम बुनियादी शब्दों की परिभाषा को लेकर बहस छेड़ दी है। कोई भी बहस जब आंदोलन के साथ चलती है तो उसकी धार तेज होती है और उसका प्रभाव नीचे तक जाता है।
शांति क्या है?
शांति क्या है? क्या जब आपके अधिकारों का हनन हो रहा हो तब खामोश बैठना ही शांति है? क्या शांति में न्याय या सामाजिक न्याय की भी कोई अवधारणा है या वह उससे रहित है? क्या बिल्ली के सामने चूहे का खामोशी से समर्पण कर देना, क्या हिरण का बाघ के सामने चुपचाप खड़े रहना ही शांति है? क्या मत्स्य न्याय के आगे चुपचाप बैठने को शांति कहते हैं? क्या घर में चोर डकैत आ जाए तो उसके आगे हाथ बांधकर खड़े रहने को शांति कहते हैं? भारत सरकार और उसकी पुलिस ने लोकतंत्र, नागरिक अधिकार, कानून व्यवस्था और शांति, पुलिस के अधिकार की भयातुर परिभाषाएं गढ़ी हैं। उसके अनुसार सरकार का काम नागरिकों को नियंत्रित करना है न कि उसका कल्याण करना । बल्कि वे नियंत्रण को ही कल्याण मनाते हैं। विकास की परिभाषा में वे अपने संगठन और पूंजीपतियों के विकास को रखते हैं।
सवाल उठा रहे हैं जागरूक नागरिक
भारत का दरबारी मीडिया, दरबारी बुद्धिजीवी और वेतनभोगी प्रोफेसर और पुरस्कारजीवी साहित्यकार उस पर चुप हैं। लेकिन भारत का युवा और जागरूक नागरिक उस पर बहस कर रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं। ध्यान रहे कई बार बुनियादी शब्दों पर बहस भी सामाजिक परिवर्तन का मजबूत कदम साबित होता है। पंद्रहवी सदी के दार्शनिक रघुनाथ शिरोमणि ने अपने सामान्य किंतु मौलिक हस्तक्षेप से बहुत बड़ा परिवर्तन ला दिया था। उनके पहले के नव्य न्याय के दार्शनिक गंगेश उपाध्याय ने कहा था कि यह संसार पीड़ा से ग्रसित है दर्शन उससे राहत देने वाला विचार है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए रघुनाथ ने कहा कि संसार का अर्थ सिर्फ तीन वर्ण ही नहीं हैं उसमें अछूत और स्त्रियां भी शामिल हैं। यह अपने में क्रांतिकारी सुझाव था जिसने आगे के विचार को दूर तक प्रभावित किया।
आज प्रश्नाकुल युवाओं और उनके आंदोलन ने भयभीत सरकार के समक्ष एक अभय सोच और समाज को खड़ा किया है। ऐसा ही भारत हमें भी चाहिए और ऐसा ही दुनिया को भी चाहिए। भारत के वे लोग नासमझ हैं जो फ्रांस के आंदोलन की हिंसा को देखकर या बांग्लादेश और नेपाल की हिंसा को यादकर हमारे लोगों को डरा रहे हैं। नया भारत बनाने को बेचैन युवा एक अभय भारत बनाने को तत्पर है और इसी रास्ते पर चलकर एक अभय विश्व भी बनेगा। उसे दूसरे आंदोलनों से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है। उसके पास आजादी की लड़ाई की महान विरासत है जिसके कारण उसके पास दुनिया को सिखाने की सामर्थ्य है।