6 अगस्त को मुंबई में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपना आक्रामक रुख़ छोड़कर जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा को वर्तमान पीढ़ी से ज़्यादा देशभक्त और ईमानदार बताया। ऐसा लगता है संघ ने सीजेपी के आंदोलन के भविष्य के बड़े ख़तरे को ठीक से समझकर अपने सुर बदल लिए हैं लेकिन यह एक दिखावटी, बनावटी और सजावटी बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है। सबको पता है कि संघ दस मुँह से बोलता है। असली सवाल यह है कि क्या संघ का राजनीतिक मुखौटा यानी बीजेपी सीजेपी के दबाव में अपना हिंदूवादी, पूंजीवादी और विभाजनकारी एजेंडा बदलने को मजबूर होगी?

सीजेपी और मोदी सरकार

दरअसल, बीजेपी और सीजेपी के एजेंडे में चंद मुद्दों पर थोड़े से मतभेद नहीं बल्कि दोनों के लक्ष्यों में ज़मीन आसमान का फ़र्क है। यह ठीक है कि मोदी सरकार को झुकाने का जो काम पिछले 12 साल में कांग्रेस, विपक्ष या इंडिया गठबंधन नहीं कर पाया वो सीजेपी ने 36 दिन में कर दिखाया। सीजेपी के साथ युवाओं का 26.2 प्रतिशत वोट खड़ा न हो जाए, यह डर संघ को है। उसके पास विपक्ष के नेताओं की तरह खोने को भी कुछ नहीं है। युवा होने के कारण वे निडर भी हैं। वे अपना भविष्य चौपट देखकर ‘करो या मरो’ की लड़ाई लड़ने के लिए सर पर कफ़न बांधकर मैदान में उतरे हैं। वे विरोध करने वालों को गालियां देने पर ईंट का जवाब पत्थर से देकर बीजेपी आईटी सेल और संघ को सकते में डाल देते हैं। वे सोशल मीडिया के संघ परिवार से बड़े खिलाड़ी हैं।
ताज़ा ख़बरें

अभिजीत दिपके की रणनीति

सीजेपी प्रमुख अभिजीत दिपके ने बीजेपी से कहा है कि वे भागवत की बात सुनें क्योंकि वे बीजेपी के मेंटर हैं। लेकिन सब जानते हैं कि बीजेपी नहीं सुनेगी क्योंकि वह जानती है कि भागवत एक रणनीति के तहत युवाओं को पटाने के लिये केवल लिप सर्विस कर रहे हैं। दिपके ने यह भी कहा है कि हमारी विचारधारा वही होगी जो हमारे संविधान की है। उनका यह भी कहना है कि वे तमाम दबाव और धमकी के बावजूद न तो बीजेपी में जाएंगे और न ही कोई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे। वे दिल्ली में आप और असम में आसू का हश्र देख चुके हैं। 

वैसे भी मान लो अगर किसी लालच में दिपके बीजेपी में चले भी जाएं या डरकर अपने घर बैठ जाएं तो भी इस आंदोलन की कमान कोई और संभाल लेगा। गुजरात के पटेल आंदोलन के मुखिया हार्दिक पटेल के बीजेपी में जाने की तरह सीजेपी का आंदोलन इससे खत्म नहीं होगा। दिपके कहते हैं वे राजनीति में इसलिए भी नहीं जाएंगे क्योंकि उससे जनता का भरोसा खत्म हो चुका है। ईडी, सीबीआई और चुनाव आयोग से दल तोड़े जा रहे हैं। वे कहते हैं देश को बड़े जन आंदोलन की ज़रूरत है। सीजेपी का दावा है हर वह हर आदमी गुलाम है जो अपने मन की बात नहीं कह सकता।

पेपर लीक विरोध से शुरू हुआ सीजेपी का आंदोलन शिक्षा सुधार से होता हुआ अब व्यवस्था परिवर्तन पर ज़ोर दे रहा है। हालांकि भागवत ने बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की बात भी कही लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिए फिर शिक्षा बजट मोदी सरकार ने घटाया क्यों?

मोहन भागवत से सवाल

भागवत इस अहम सवाल पर बचकर निकल गए कि छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज और पैलेट गन का इस्तेमाल क्यों हुआ? क्या यह संभव है कि उनको अपनी ही सरकार के इस फैसले का पता नहीं हो? सीजेपी ने आंदोलन के दौरान एक नारा दिया था "सरकार बीजेपी की हो, कांग्रेस की हो, आप की हो या आपके बाप की हो, सबकी जवाबदेही होगी"। यही वह टकराव का वास्तविक बिंदु है जिस पर सीजेपी बीजेपी को अपना एजेंडा बदलने पर मजबूर करना चाहती है।

सीजेपी ने अब इस जवाबदेही में कोर्ट को भी शामिल कर लिया है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा को जब सुप्रीम कोर्ट ने अंडों के डर से वर्चुअल पेशी की इजाज़त न देते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के सीने पर गोली खाने की दुहाई दी तो दिपके और सौरभ दास ने जज साहब को आड़े हाथ लेते हुए लिखा कि क्या सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि हर कोई गोली खाए? जब सुप्रीम कोर्ट के जज अपोजिशन लीडर्स के खिलाफ़ इस तरह के बयान देते हैं, तो आम आदमी के लिए क्या उम्मीद बचती है? सीजेपी के सह संयोजक सौरभ दास ने तो यहां तक कह दिया कि हमने किस तरह के बड़बोले लोगों को जज बनाया है? हमें ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी तय करने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की बेरोजगार युवाओं पर अपमानजक टिप्पणी के जवाब में बनी कॉकरोच जनता पार्टी अब सरकार के साथ ही कोर्ट जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी खुलकर सवाल उठा रही है। इससे सुप्रीम कोर्ट के रुख़ में भी बदलाव आए या नहीं आए लेकिन जज सफाई देते नज़र आ रहे हैं। दिपके ने अमेरिका में अपनी पढ़ाई के खर्च पर भी तीखा जवाब देते हुए कहा कि वे मेरे पेपर देखने से पहले मोदी की डिग्री और पीएम केयर फंड का हिसाब दें।

सरकार की जवाबदेही का सवाल  

सीजेपी बीजेपी की असली लड़ाई इसी मुद्दे पर है कि जनता नहीं सरकार सेवक है। इसीलिए उसकी ही जवाबदेही है। सीजेपी 70 साल से अधिक आयु के नेताओं को घर या आश्रम भेजने की भी मांग कर रही है जो संघ तो कभी भी स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि उनके यहां मरते दम तक प्रमुख बने रहने का नियम है। माना जाता है कि बीजेपी में 75 साल से अधिक आयु वालों को मार्ग दर्शक मंडल में भेजने का नियम है। सबको पता है संघ, बीजेपी सत्ता का इस्तेमाल अपने हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने के लिए कर रहे हैं। इसके लिए संविधान, लोकतंत्र और कानून के राज को भी ताख पर रख दिया गया है। शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। इतिहास बदला जा रहा है। कोर्स की किताबों में हिन्दू मुस्लिम के बीच नफ़रत की दीवार चौड़ी की जा रही है। 

देश में शिक्षा के हालात

सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। जिससे शिक्षा न केवल महंगी हो रही है बल्कि उसकी गुणवत्ता भी नीचे जा रही है। सरकारी संस्थाओं का निजीकरण करके चोर दरवाज़े से आरक्षण खत्म किया जा रहा है। सरकारी यूनिवर्सिटीज में संघी वीसी और कॉलेजों में संघी प्राचार्य भेजे जा रहे हैं। जहां वे तैनात नहीं हो पाए हैं, वहां एक संघी बड़े वेतन पर उनका ओएसडी या पीआरओ बनाकर डिक्टेट करने के लिए उनके सर पर रखा गया है। कॉर्पोरेट को ‘चंदा दो धंधा लो’ नीति के तहत खुलकर लूटने की छूट दे दी गई है। सरकारी ठेकों में कमीशन अब तक सबसे अधिक वसूला जा रहा है। इससे आए दिन पुल और एक्सप्रेस-वे ध्वस्त हो रहे हैं। बेसहारा जानवर सड़कों पर मौत की वजह बन रहे हैं तो खेतों में किसानों की फसल तबाह कर रहे हैं।

बीजेपी, आरएसएस को सीजेपी ने ठीक से परखकर आरपार की जंग छेड़ने का मन बना लिया है। उनका नारा भी है। "मोदी जब जब डरता है, हिंदू मुस्लिम करता है।" इसलिये यह साफ़ है कि सीजेपी बीजेपी के जनविरोधी शिक्षा व रोज़गार विरोधी एजेंडे को बदलने के लिए सतत संघर्ष का इरादा कर चुकी है।