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सोनिया-राहुल कांग्रेस की मजबूरी या पार्टी के लिए ज़रूरी?

सोमवार को सात घंटे चली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में चमत्कारिक फ़ैसला नहीं हुआ। कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी का कार्यकाल छह महीने और बढ़ा दिया गया। कांग्रेस अधिवेशन बुलाकर नए अध्यक्ष का चुनाव कराने की बात कही गई। सोनिया गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की, लेकिन कार्यसमिति ने उनका इस्तीफ़ा मंजूर नहीं किया। 
अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि राहुल गांधी ही पार्टी के अगले अध्यक्ष होंगे और कांग्रेस अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लगाई जाएगी। 
कार्यसमिति की इस बैठक से साबित हो गया है कि राहुल गांधी लाख कोशिश कर लें कि पार्टी उन्हें और उनके परिवार को छोड़कर बाहर के किसी नेता को अध्यक्ष बनाए, ऐसा मुमकिन नहीं है।
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राहुल की चुनौती किसी ने स्वीकार नहीं की!

राहुल गांधी सवा साल से यही बताने और समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर वह पार्टी नहीं चला पा रहे हैं, पार्टी को जीत नहीं दिला पा रहे हैं, तो पार्टी के दूसरे नेता जो ऐसा करने की क्षमता रखते हैं, वे सामने आएं और पार्टी चलाएं। राहुल गांधी की इस चुनौती को कांग्रेस का कोई नेता स्वीकर नहीं कर पाया। 
वे नेता भी कोई विकल्प पेश नहीं कर सके जो कांग्रेस मुख्यालय के अपने दफ़्तरों के बंद कमरों में बैठकर राहुल गांधी का मजाक ठीक वैसे ही उड़ाते हैं जैसे बीजेपी के नेता। पार्टी को मज़बूत करने की कोई योजना उनके पास नहीं है, पार्टी की बाग़डोर संभालने की हिम्मत दिखाना तो बहुत दूर की बात है। 

मजबूरी या ज़रूरी?

अब यह फ़र्क़ मिट गया है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी कांग्रेस की मजबूरी हैं या कांग्रेस के लिए ज़रूरी हैं। इसी लिए साल सोनिया के 1998 से दिसंबर 2017 तक लगातार 19 साल पार्टी अध्यक्ष बने रहने के बाद राहुल गांधी को पार्टी की बाग़डोर सौंपी गई। क़रीब डेढ़ साल अध्यक्ष रहने के बाद राहुल ने इस्तीफ़ा दिया तो फिर सोनिया गांधी को ही कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। 
साल भर बाद उनका कार्यकाल बढ़ाया गया। पार्टी ने साफ़ संकेत दे दिए हैं कि उसे अध्यक्ष पद पर राहुल के अलावा कोई और मंजूर नहीं। अब यह राहुल पर निर्भर करता है कि वह वापसी के लिए कितना और समय लेते हैं।    

राहुल की मर्जी से चलेगी कांग्रेस?

पार्टी के तमाम नेताओं का मानना है कि अब राहुल गांधी को अपनी ज़िद छोड़कर पार्टी की कमान संभाल लेनी चाहिए। राहुल के क़रीबी पिछले काफ़ी दिनों से संकेत दे रहे हैं कि राहुल फिर से तैयार हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी  के अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लग जाएगी। इस बीच, पार्टी संगठन में उनकी नई टीम भी तैयार हो जाएगी ताकि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद वह अपने मुताबिक निर्णय कर सके।
सूत्रों की मानें तो राहुल इसी शर्त पर वापसी को तैयार हैं कि उन्हें पार्टी अपनी मर्ज़ी से चलाने और सभी अहम फ़ैसले लेने की आज़ादी दी जाए।

फ़ुलटाइम पार्टी प्रेसीडेंट

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले नेताओं ने भी कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का विरोध नहीं किया, बल्कि राहुल से अध्यक्ष बनने का आग्रह किया है। उनका कहना सिर्फ़ इतना है कि पार्टी की बाग़डोर राहुल सभालें या कोई और, वह फुलटाइम राजनीति करे। इन नेताओं का कहना है कि अध्यक्ष पार्टी का कामकाज गंभीरता से करे, कार्यकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध हो।
इन नेताओं का कहना है कि अध्यक्ष ऐसा नेता हो जो पार्टी की दशा सुधार कर, उसे नई दिशा देकर आने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करे। पार्टी में तमाम नेताओं को लगता है कि यह काम सिर्फ राहुल गांधी ही कर सकते हैं।  

क्या कहा कार्यसमिति ने?

कार्यसमिति के मुताबिक, 'सरकार की विफलता और विभाजनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ सबसे ताक़तवर आवाज़ सोनिया गांधी और राहुल गांधी की है। राहुल गांधी ने बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ जनता की लड़ाई का दृढ़ता से नेतृत्व किया है।' बैठक के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने एक बार फिर दुहराया कि सभी कांग्रेसजनों की इच्छा है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाले।  
कोरोना काल में कांग्रेस अधिवेशन होने तक पार्टी अध्यक्ष के तौर सोनिया गांधी संगठन में ज़रूरी बदलावों को अंजाम दे सकती हैं। पार्टी के एक नेता ने कहा कि संगठन में राहुल गांधी की पसंद के नेताओं को जगह मिल सकती है। सीडब्ल्यूसी ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सोनिया गांधी को अधिकृत कर दिया है। 

परिवारवाद नहीं रहा मुद्दा

राजनीतिक हल्कों में भले ही यह मज़ाक का विषय हो कि कांग्रेस के पास नेहरू-गांधी परिवार के बाहर का कोई व्यक्ति अध्यक्ष बनने के लिए नहीं है, पार्टी के पास वाकई कोई विकल्प नही है। भले ही इसे मजबूरी कहा जाए, लेकिन कांग्रेस को यह ज़रूरी लगता है। अब तो ख़ैर मजबूरी और ज़रूरी के बीच का फ़र्क़ ही मिट गया है।
जिस परिवारवाद को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को बदनाम किया जाता रहा है, वह परिवारवाद देश की सभी पार्टियों में है। यहां तक कि संघ परिवार भी इस परिवारवाद से अछूता नहीं है।
भारतीय राजनीति से परिवारवाद को अलग करना फिलहाल और निकट भविष्य मे ख़त्म करना नामुमकिन लगता  है। अब कांग्रेस को यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है कि बीजेपी या संघ परिवार चाहे जो कहे, चाहे जितना ताना मारे, उसे नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व में ही रहना है। 

'असंतुष्ट'?

सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले कांग्रेस के जिन नेताओं को 'असंतुष्ट' कहा जा कहा गया है, दरअसल वे असतुंष्ट नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित है। दरअसल 'असंतुष्ट' कहे जा रहे कांग्रेस के इन नेताओं का मानना है कि पार्टी को अपनी मूल राजनीतिक विचारधारा की तरफ़ लौटना चाहिए। गांधी-नेहरू की वही विचारधारा जो आम आदमी को केंद्र में रख कर देश के सर्वांगीण विकास की बात करती है। 
इन नेताओं को लगता है कि इस विचारधारा को इसी परिवार का व्यक्ति आगे बढ़ा सकता है। आज जब मोदी सरकार देश उपक्रमों को एक-एक करके निजी हाथों में सौंपती जा रही है तो मज़बूती से इसके ख़िलाफ़ खड़े होने की ज़रूरत है। इसके लिए अगर सोनिया-राहुल पार्टी की मजबूरी हैं, तो मजबूरी ही सही। अगर यही ज़रूरी है तो इस ज़रूरत को कांग्रेस को जल्द से जल्द पूरा करना चाहिए।    

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यूसुफ़ अंसारी
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