(अमेरिका की ढाई सौवीं सालगिरह पर, वाशिंगटन से)
वाशिंगटन में लगभग आधी रात हो चुकी थी, जब उसने बोलना शुरू किया। तूफ़ान ने नेशनल मॉल को ख़ाली करा दिया था, गरमी असहनीय थी, हवाई करतब रद्द हो चुके थे, भीड़ को हटाकर ग्यारह बजे लौटने को कहा गया था — और इसी सब ने अमेरिका की आज़ादी की ढाई सौवीं सालगिरह का वह भाषण देर रात तक टाल दिया।
आख़िरकार जब वह मंच पर आया, तो उसके चेहरे पर उस बालक का बेफ़िक्र आत्मविश्वास था जिसे अपने नंबरों का यक़ीन हो और मास्टर ने उसे कक्षा के आगे बुला लिया हो। उसने राष्ट्र से कहा — अमेरिका 'मानव इतिहास की सबसे ऊँची उपलब्धि' है, और यह तो बस 'सुनहरे युग की पहली किरण' है। देश को 'और बड़ा, और बेहतर, और मज़बूत' बनाया जाएगा। वह इसे और भी ज़्यादा प्रेम करेगा।
उसने पुराने झंडे निकाल कर दिखाए — एक, उसके कहे मुताबिक़, लिंकन के ताबूत पर पड़ा था — पीछे खड़े पुराने सैनिकों का आभार जताया, चाँद पर हो आए यात्रियों को सम्मानित किया, और फिर उसी साँस में, संस्थापकों और संविधान के साथ-साथ, साम्यवाद को उस नासूर से जा मिलाया जिसे काट फेंकना ज़रूरी है, और डाक से पड़ने वाले मतों पर रोक लगाने की क़सम खाई। और जब आतिशबाज़ी हुई, तो उसने विश्व-कीर्तिमान तोड़ने की कोशिश की।
इन वाक्यों में एक जानी-पहचानी-सी बात है, जो सोचने-समझने वाले श्रोताओं को निरुत्तर कर देती है। ये उस आदमी के शब्द नहीं हैं जिसने गणराज्य के बारे में सोचा हो; ये उसके शब्द हैं जो उसे बेच रहा है। 'और बड़ा, और बेहतर, और मज़बूत' — यह विज्ञापन-पर्चे की भाषा है, संस्थापन-लेख की नहीं। 'सुनहरा युग' नीलामी बोलने वाले का वादा है, इतिहासकार का नहीं। आदमी जवाब ढूँढ़ता है और नहीं पाता, क्योंकि यह ज़ुबान ही बहस से इनकार करती है : आप बिक्री की बोली से बहस नहीं कर सकते, आप बस ख़रीदने से इनकार कर सकते हैं। मगर भीड़ इनकार नहीं करती। वह पुराने झंडे पर, परास्त शत्रु पर, सुनहरे युग पर तालियाँ पीटती है और घर लौट जाती है। जो बिका, वह सौदे के वक़्त दिखाई नहीं देता। वह बाद में, पीछे छूटती दूरी में, साफ़ होता है।
क्योंकि उस देर रात के मंच पर खड़ी आकृति, चाहे मौक़े का लिबास कुछ भी हो, गणराज्यों की निर्माता नहीं थी। वह उनकी परिसमापक है।
गणराज्यों की स्थिति
वह गणराज्यों को गढ़ने नहीं, उन्हें बेच-बाच कर समेटने आता है। वह लेन-देन का आदमी है, जिसने ताड़ लिया है कि वह बड़ी हवेली — क़ानूनों, मर्यादाओं और चुपचाप चलती प्रक्रियाओं के जमा साज़ो-सामान से भरी — बे-पहरे खड़ी है। गल्ला खुला है; माल इधर से उधर हो सकता है। वह बहाली और भूले हुए गौरव की बातें करता है, पर संस्थाओं के बीच यों घूमता है जैसे कोई दुकानदार अपनी दुकान की समापन-बिक्री में घूमता है — जो कभी साझा था उस पर बट्टा लगाता, सार्वजनिक भरोसे को निजी नफ़े में भुनाता।
यह जंगल का शिकारी नहीं, जिसका इलाक़े और उत्तराधिकार का अपना ज़ाब्ता होता है। यह बाज़ार का शिकारी है — शोरगुल भरा, अपनी चमक-दमक में भोंडा, और ठीक उस घड़ी के लिए बना जब कोई समाज नागरिकता के लंबे अनुशासनों से ऊबने लगता है।
यह नस्ल पहले-पहल उन नए राष्ट्रों में दिखती है जो साम्राज्यों के मलबे से उठे। वहाँ नेता इतिहास के अपमानों को धोने का वादा लेकर आता है और अंत में राज्य को ही अपने घर-परिवार का विस्तार मान बैठता है। अदालतें असुविधा बन जाती हैं; लोक-सेवा, अपनी स्मृति और अपनी छोटी-छोटी ज़िदों समेत, हटा देने वाली अड़चन। नियुक्तियाँ पट्टे हैं; दस्तख़त लाभांश।
साझे भले की भाषा भाषणों में ज़िंदा रहती है, पर व्यवहार में सत्ता का लगातार खिसकना — निर्वैयक्तिक नियमों से हटकर निजी वफ़ादारी की ओर। जो सम्प्रभुता के शोर से शुरू होता है, वह लोक-क्षेत्र के चुपचाप निजी हो जाने पर ख़त्म होता है।
प्रबोधन की सोची-समझी ईजाद अमेरिका कुछ अलग होना चाहिए था। उसका ढाँचा जान-बूझकर बोझिल रखा गया था — अंकुश और संतुलन, स्वायत्त एजेंसियाँ, एक पेशेवर लोक-सेवा जो व्हाइट हाउस के किसी भी एक बाशिंदे से ज़्यादा टिके। फिर भी इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के मध्य तक वही आकृति केंद्र में जा बैठी। उसे बेहद पेचीदा, चलती-फिरती विरासत मिली, और उसने उसके साथ वही सुलूक किया जो अपने पिछले कारोबारों के साथ करता आया था : एक उधार की बाज़ी, जिसका घाटा दूसरों के मत्थे मढ़ा जा सके और जिसका ब्रांड बचा रहे।
बही-खाते के दिवाले राज्य के दिवाले बन गए। जब परिवार से जुड़े उद्यमों से होने वाली निजी कमाई पिछले राष्ट्रपतियों की सारी मर्यादाओं को बौना कर देने वाले आँकड़ों तक पहुँची, और जब वे उद्यम तकनीक-निर्यात तथा नियमन के रुख़ में पलटियों से जा गुँथे, तब आदमी और ओहदे के बीच का फ़ासला एक बिंदु में सिमट गया। गणराज्य किसी तख़्ता-पलट से नहीं गिरा। वह टुकड़ा-टुकड़ा, सबसे ऊँची बोली लगाने वाले या सबसे वफ़ादार मुलाज़िम को, पट्टे पर चढ़ता जा रहा था।
भारत का गणराज्य
भारत में यह सफ़र लंबा और ज़्यादा गड्डमड्ड रहा है। आज़ादी के बाद का राज्य ख़ुद एक मरम्मत की परियोजना था — बँटवारे के बाद, औपनिवेशिक शासन की लंबी क्षति के बाद। उसके शुरुआती नेता संस्थाओं को झुकाते वक़्त भी उन्हीं की भाषा बोलते थे। दशकों में एक और शैली उभरी : वह नेता जो कथा और निर्णय को अपने में समेट लेता है, जो बीच की संस्थाओं के सिर के ऊपर से सीधे जनता से बात करता है, जो वफ़ादारी को पुरस्कृत करता और प्रक्रियागत स्वायत्तता को अकुशलता, या उससे भी बुरा, मान बैठता है। लोक-सेवा, जो कभी फ़ौलादी ढाँचा मानी गई थी, बार-बार राजनीतिक दबाव में झुकाई गई — तबादले, चुनी हुई तरक़्क़ियाँ, वैचारिक कसौटियों का घुसेड़ा जाना।
नागरिकता पर, मीडिया पर, विश्वविद्यालयों पर, जाँच एजेंसियों पर बने क़ानून घर्षण घटाने के लिए गढ़े गए। अदालतें जब अड़ती हैं, तो उन्हें जन-इच्छा के रास्ते की रुकावट कहकर कोसा जाता है। नतीजा वह भोंडा ढहना नहीं जिसे नायपॉल ने अफ़्रीका और लातिन अमेरिका में देखा था, बल्कि एक धीमा, ज़्यादा सुघड़ खोखलापन है। ढाँचे बचे रहते हैं; भीतर की स्वायत्तता घुल जाती है। जिसे ताक़त और निर्णायकता कहकर पेश किया जाता है, वह क़रीब से देखने पर अक्सर यही निकलता है — संस्थागत स्मृति की जगह निजी जनादेश का लगातार रख दिया जाना।
ऐसे नेताओं के गिर्द जो लोग होते हैं, वे प्रायः विचारधारा के पक्के नहीं होते। वे उपयोगिता के कारिंदे होते हैं। वाशिंगटन में उनमें वे वकील हैं जो पुराने क़ानूनों में नई लचक खोज निकालते हैं, वे सलाहकार जो निजी शिकायत को राष्ट्रपति के आदेश में तर्जुमा कर देते हैं, और वे कारोबारी साझीदार जिनके उद्यम नीति की छाया में फलते-फूलते हैं।
ठेकेदारों और बिचौलियों का घेरा
नई दिल्ली में उनमें वे अफ़सर हैं जो नई राग-दरबारी सीख लेते हैं, वे मीडिया-मालिक जो अनुकूल कवरेज के बदले रसाई का सौदा करते हैं, और ठेकेदारों तथा बिचौलियों का फैलता घेरा, जो जानते हैं कि नज़दीकी ही पूँजी है। ये किसी भोंडे व्यंग्य-चित्र के 'ग़ुलामनुमा जीव' नहीं; ये उस व्यवस्था में समझदार कर्ता हैं जिसने वफ़ादारी को पहली मुद्रा बना दिया है। केंद्र के प्रति उनकी उपयोगिता के बाहर उनका कोई स्वतंत्र वजूद नहीं। केंद्र सरकता है, तो वे भी सरक जाते हैं। उनका भीतरी जीवन, अगर है भी, उस रोज़मर्रा के काम के नीचे दबा है — जो कभी नाजायज़ था उसे जायज़ ठहराने का काम।
क्रिप्टो का व्यापार और चुनावी बॉन्ड का खेल
'भ्रष्टाचार' शब्द इस सब के लिए बहुत छोटा है। भ्रष्टाचार का मतलब है किसी तय मानक से भटकना। यहाँ तो मानक ही नए सिरे से लिखा जा रहा है। हर वह नियम-ढील जो किसी जुड़े हुए हित को फ़ायदा दे, हर वह नियुक्ति जो पुरानी योग्यता-छननी को लाँघ जाए, हर वह जाँच जो राजनीतिक उपयोगिता के हिसाब से सुस्त या तेज़ पड़ जाए — ये पुराने अर्थ के घोटाले नहीं हैं। ये तो चालू तंत्र हैं, प्रणाली का ढंग हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति-परिवार से जुड़े क्रिप्टो उद्यमों की ओर वह झुकाव, और उसके साथ वे नीति-बदलाव जो शुरुआती निवेशकों को इनाम देते जान पड़े — इन्होंने सर्वोच्च ओहदे को एक नई सरहद की जायदाद बना दिया। भारत ने वही तर्क क़ानून में गूँथ दिया और उसे सुधार कहा। चुनावी बॉन्ड, जो 2017 में लाया गया, कंपनियों को बेहिसाब और गुमनाम रक़में पार्टियों को देने की छूट देता था; कॉरपोरेट चंदे की सीमा हटा दी गई, उसे ज़ाहिर करने की शर्त मिटा दी गई, और घाटे में चलती काग़ज़ी कंपनी को भी चुपचाप देने की इजाज़त मिल गई। जनता नहीं जान सकती थी कि किसने किसे कितना दिया — पर उस दिन की सरकार, उस सरकारी बैंक के ज़रिए जो ये बॉण्ड जारी करता था, हमेशा जान सकती थी।
जब 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने आख़िरकार इस योजना को रद्द किया, तो जो बहियाँ सामने आईं उन्होंने बता दिया कि यह ढाँचा किसलिए बना था : सबसे बड़ा हिस्सा सत्ताधारी दल की ओर बहा था, और एक से ज़्यादा दानदाताओं ने उस मौसम में अपने सालाना मुनाफ़े से कई गुना दिया था जब उनके नियामक नरम पड़ चले थे। इसी बीच जाँच एजेंसियाँ विपक्ष पर इतनी सटीक घड़ी देखकर छोड़ी गईं कि उसे इत्तिफ़ाक़ कहना मुश्किल है, और मीडिया-मालिकों ने रसाई के बदले कवरेज का सौदा किया। अमेरिका की सरहदी जायदाद और भारत का बॉन्ड— एक ही औज़ार हैं, बस लिबास अलग-अलग : वह तंत्र जिससे नज़दीकी नीति में और नीति वापस नज़दीकी में ढल जाती है। पैमाना अलग है; तर्क हूबहू एक।
लोकतंत्र के सामने चुनौतियाँ
इस बंदोबस्त को टिकाए क्या रखता है — सिर्फ़ डर या ज़ोर नहीं। बल्कि वह जनता, जो स्व-शासन की माँगों से थक चुकी है। दोनों देशों में बड़ी संख्या में नागरिक इस नतीजे पर पहुँच गए हैं कि पुराने नियम — प्रक्रियागत निष्पक्षता, संस्थागत संयम, समझौते का धीमा श्रम — या तो पाखंड थे या फिर बहुत महँगे। उन्हें दिखती हुई ताक़त चाहिए, फटाफट फ़ैसले चाहिए, 'ख़ास लोगों' को उनकी जगह दिखा देने का संतोष चाहिए। वह नेता जो शोर और तमाशा परोसता है, जो हर नाकामी को छिपे दुश्मनों की करतूत बताता है, जो वादा करता है कि देश को एक निर्णायक घर की तरह चलाया जा सकता है — वह एक सच्ची भूख से जा मिलता है। त्रासदी यह है कि यह भूख उसी क्षरण से सिंचती है जो आख़िरकार घर को ही रहने लायक़ नहीं छोड़ेगा। किसी राष्ट्र के लिए कोई 'अगला सौदा' नहीं होता, जब उसकी विरासती पूँजी — क़ानूनी पूर्वानुमेयता, प्रशासनिक कौशल, यह बची-खुची आस्था कि सत्ता अमानत में रखी गई है — भुना दी जाए।
आदमी दूर से देखता है — भूगोल और मिज़ाज, दोनों की दूरी से — दो बड़े लोकतंत्रों को समांतर पटरियों पर सरकते हुए। एक में ज़ुबान देश को फिर से महान बनाने की है; दूसरे में सभ्यता का आत्मविश्वास लौटाने की। दोनों ज़ुबानों में सच के अंश हैं। दोनों का इस्तेमाल सत्ता के संकेंद्रण और प्रतितोलक संस्थाओं को कमज़ोर करने को जायज़ ठहराने में हुआ है। अगर यहाँ अमेरिका पर नज़र ज़्यादा देर ठहरती है, तो इसलिए नहीं कि उसका परिसमापक बाक़ियों से ज़्यादा लालची है, बल्कि इसलिए कि उसकी विरासत को गिरवी न रखे जाने लायक़ माना जाता था — वह इकलौता घर, जिसका ढाँचा ढाई सदियों में ठीक इसी तरह गढ़ा गया था कि कोई अकेला बाशिंदा उसे उठाकर न ले जा सके। चौंकाने वाली बात यह नहीं कि बाज़ार का शिकारी आ गया, बल्कि यह कि दुनिया की सबसे मज़बूत तिजोरी उसी चाबी से खुल गई जिससे सबसे कमज़ोर खुलती है। भारत का मामला ज़्यादा जाना-पहचाना है, क्योंकि वह उस ढर्रे को दोहराता है जो उपनिवेश-मुक्त दुनिया के बड़े हिस्से में दिखता है : वह नेता जो जन-इच्छा के अवतार के रूप में शुरू होता है और एक निजी बना दिए गए राज्य के मालिक के रूप में ख़त्म। कि अब दोनों एक तुक में बँध गए हैं — यही पूरा तर्क है। नाज़ुक गणराज्य और मज़बूत गणराज्य के बीच की दूरी, पता चलता है, मंज़िल की दूरी नहीं है, बस लगने वाले समय की दूरी है।नायपॉल ने, दशकों पहले ऐसी ही आकृतियों को देखते हुए, इसे नक़ल कहा था — सम्प्रभुता का उधार लिया हुआ लिबास, उस देह के बग़ैर पहना गया जो उसमें भर कर बड़ी हुई हो; ताक़त के रूप अपना लिए गए, पर उस भीतरी अनुशासन के बिना जो उन रूपों को टिकाऊ बनाता है। मगर नक़ल हाशिये की बेचैनी थी — नया राष्ट्र पुराने को ताकता और बदहवासी में उसकी नक़ल उतारता। अब जो सामने है, उसने ताकने की दिशा ही उलट दी है। अब महानगर हाशिये की नक़ल करने लगा है — वाशिंगटन उपनिवेश-उपरांत के बलशाली नेता का शिकायती व्याकरण उधार लेता, वह गढ़ा हुआ दुश्मन और वह सजावटी दरबार। शिष्य ही आदर्श बन बैठा है। आज का परिसमापक नायपॉल के शिकारी से ज़्यादा सुघड़ है, क्योंकि उसके हाथ में महानगर के औज़ार हैं — निगरानी, कथा-नियंत्रण, वित्तीय अभियांत्रिकी — और वे हाशिये की सबसे पुरानी वृत्ति की सेवा में लगे हैं, जो राज्य को अपनी जागीर समझ बैठने की वृत्ति है। उसे संविधान मिटाने की ज़रूरत नहीं; इतना बहुत है कि उसे सजावटी बना दिया जाए, जबकि असली फ़ैसले वफ़ादारी के छोटे-छोटे घेरों में सरक जाएँ। नक़ल ने अपना घेरा पूरा कर लिया है और घर लौट आई है।
चुनाव बचेंगे, लेकिन क्या लोकतंत्र बचेगा?
क़ीमत फ़ौरन तबाही नहीं लाती। गणराज्य हमेशा धमाके के साथ नहीं गिरते। वे चुनाव कराते रह सकते हैं, आँकड़े छापते, बाहर ताक़त का प्रदर्शन करते — जबकि भीतर स्व-शासन का व्याकरण घुलता जाता है। अदालतें अब भी बैठती हैं; नौकरशाही अब भी आदेश जारी करती है; मीडिया अब भी बहस करता है। पर यह आस्था कि ये महज़ पोशाकें नहीं हैं — कि ये एक जीवित क़रार का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसके मुताबिक़ सत्ता को, चाहे वह कितनी ही लोकप्रिय क्यों न हो, सीमित और जवाबदेह होना चाहिए — यह आस्था फीकी पड़ जाती है। जो बचता है, वह एक ऐसा समाज है जिसमें अकेली भरोसेमंद पनाह मालिक की नज़दीकी है। यह किसी गंभीर अर्थ में गणराज्य नहीं। यह बेहतर ब्रांडिंग वाली एक जागीर है।
विरासत कभी किसी एक आदमी की मिल्कियत नहीं थी। वह पीढ़ियों में, अधूरे ढंग से, ठीक इसी लालच के ख़िलाफ़ बाड़ की तरह खड़ी की गई थी — राज्य को अपनी निजी इच्छा का विस्तार मान बैठने के लालच के ख़िलाफ़। जब उस बाड़ को कुशलता या राष्ट्रीय पुनरुत्थान के नाम पर ढहा दिया जाता है, तो समाज ज़्यादा मज़बूत नहीं होता। वह छोटा हो जाता है। नेता आख़िरकार चला जाता है, अपने संतोष और अपनी शिकायतें साथ लेकर। राष्ट्र रह जाता है — व्यक्तित्व के लगातार दख़ल के बिना अपने को शासित कर पाने की क्षमता में घटा हुआ। यही वह सौदा है जिसकी पूरी क़ीमत अब भी जोड़ी जा रही है — और ढाई सौवीं सालगिरह पर, उस आसमान के नीचे जिसे आतिशबाज़ी कीर्तिमानी बनाना चाहती थी, वह क़ीमत वाशिंगटन और नई दिल्ली, दोनों जगह एक साथ जोड़ी जा रही थी।