शुभेंदु अधिकारी, अखिलेश यादव
ख़बर है कि बंगाल सरकार समाज-विरोधी गतिविधियों को रोकने के नाम पर एक नया कानून ला रही है। इस कानून के तहत किसी को भी एक साल तक बिना ज़मानत दिए जेल में रखा जा सकेगा। इस दौरान उसकी संपत्ति नीलाम कर किसी आंदोलन के दौरान हुई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जाएगी। ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के एक से तीन वर्तमान या पूर्व न्यायाधीशों की सलाहकार समिति ही कर सकेगी।
ऐसे ही जनविरोधी कानून पहले से उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में मौजूद हैं। किसी अपराधी को उसके अपराध की सज़ा मिले, इससे किसी को असहमति नहीं हो सकती। लेकिन सरकार अपने किसी संविधान-विरोधी, अलोकतांत्रिक और जनविरोधी फ़ैसले का विरोध करने पर लोगों को एक साल के लिए बिना ज़मानत जेल में डाल दे, इसे कानून का राज कैसे माना जा सकता है?
हालाँकि केंद्र सरकार के यूएपीए कानून में भी पहले से ऐसे ही कठोर प्रावधान हैं, जिनमें आरोपी को जेल में रहकर स्वयं को निर्दोष साबित करना होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में भी संविधान की मूल भावना के विरुद्ध ऐसे प्रिवेंटिव प्रावधान अपनाए जाते रहे हैं, जिनकी नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों ने लगातार आलोचना की है।
बंगाल सरकार ने स्कूलों के मिड-डे मील में अंडे परोसना भी बंद कर दिया है। इसके साथ ही पिछड़ों का सरकारी सेवाओं और शिक्षा में आरक्षण 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले ईद-उल-अज़हा (बकरीद) पर गाय काटने पर रोक लगाकर उन हिंदू पशुपालकों का भी भारी नुकसान किया गया था, जो साल भर इस त्योहार की प्रतीक्षा कुछ कमाई की उम्मीद में करते हैं।
टेलीग्राफ जैसे बड़े अख़बार के संपादक रहे राजगोपाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार का नाम भी एसआईआर से गायब हो गया है। अब उनका पासपोर्ट भी नवीनीकृत नहीं हुआ, जिससे वे अपनी बेटी की शादी में विदेश नहीं जा सके। इसका कारण टेलीग्राफ में मोदी और बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना को भी माना जा रहा है। अगर इतने बड़े पत्रकार के साथ यह बदले की भावना काम कर सकती है, तो सोचिए आम आदमी का क्या होगा, जो सरकार के गलत कामों का विरोध करता होगा। हालांकि पूरे देश में इस मुद्दे की गूंज होने के बाद उनका पासपोर्ट रिन्यू कर दिया गया। लेकिन अगर यह पासपोर्ट किसी आम आदमी का होता तो क्या ऐसा हो पाता।
बीजेपी सरकारों ने धर्म परिवर्तन, अंतरधार्मिक प्रेम विवाह और लिव-इन रिलेशन के लिए पंजीकरण को कानूनन अनिवार्य करके अप्रत्यक्ष रूप से उन पर असंवैधानिक रोक लगा दी है। कारण यह है कि अनुमति मांगने पर अनुमति देने के बजाय ये सरकारें ऐसे लोगों का उत्पीड़न शुरू कर देती हैं।
कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में रहते जब आतंकवाद-विरोधी टाडा और पोटा जैसे विवादित कानून बनाए गए थे, तब सुप्रीम कोर्ट उनकी समीक्षा करता था और वे कई बार निरस्त भी किए गए। लेकिन बीजेपी के शासन में विपक्षी सरकारों के जनहित के कानूनों को तो राज्यपाल और यहाँ तक कि राष्ट्रपति भी वर्षों तक रोककर बैठे रहते हैं, जबकि बीजेपी की राज्य सरकारों के किसी भी विवादित कानून को वे कभी नहीं रोकते। गोदी मीडिया भी ऐसे जनविरोधी कानूनों की आलोचना करने के बजाय उनके पक्ष में सुनियोजित अभियान चलाता हुआ नज़र आता है।
सबसे दुख और चिंता की बात यह है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट तैयार ही नहीं होता और अक्सर याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की सलाह देकर पल्ला झाड़ लेता है। जब कोर्ट ऐसे मामलों की सुनवाई करता भी है, तो वर्षों तक उन्हें टालता रहता है। इसके बाद बेंच के किसी न्यायाधीश का तबादला या सेवानिवृत्ति होने पर नई बेंच गठित कर दी जाती है। फिर लंबे समय तक वह बेंच पूरे मामले की दोबारा सुनवाई करती है। इसके बाद भी अक्सर फैसला सुरक्षित रख लिया जाता है। परिणामस्वरूप, कई बार जब निर्णय आता भी है, तब तक मूल मुद्दा ही समाप्त हो चुका होता है। ऐसा महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में सरकारों, सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों में देखने को मिला है।
वैसे तो अधिकांश मामलों में सरकार और अदालत एक ही पृष्ठ पर नज़र आते हैं। हमारे मुख्य न्यायाधीश कुछ भी दावा करें, लेकिन उनके कई फैसले चीख-चीखकर बताते हैं कि वे जनता की अपेक्षा सत्ता के पक्ष में अधिक झुके हुए दिखाई देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
एसआईआर से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग ने पिछले कई वर्षों में विपक्ष ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष लोगों को भी बुरी तरह निराश किया है। उमर खालिद और उनके साथ कई वर्षों से जेल में बंद लोगों का मामला तो और भी गंभीर है। आज तक उन्हें दोषी सिद्ध नहीं किया गया है, लेकिन "बेल नियम है, जेल अपवाद" कहने वाला न्यायालय उन्हें फिर भी ज़मानत नहीं देता। उन्होंने सीएए जैसे विवादित कानून के खिलाफ़ शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। उसी दौरान सुनियोजित दंगा हुआ और उन्हें तथा उनके साथियों को दंगे के आरोप में गंभीर धाराएँ लगाकर आज तक जेल में बंद रखा गया है।
महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा चलाने वाले लाखों चालकों के लिए मराठी जानना अनिवार्य कर दिया गया है, अन्यथा उनके ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। उत्तर प्रदेश में लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटर और तथाकथित "हाफ एनकाउंटर" हो रहे हैं। किसी भी अपराध का आरोप लगाकर किसी को भी पकड़ लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद आरोपियों के घरों पर तत्काल नियमों के विरुद्ध बुलडोज़र चला दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में न तो विपक्ष बोलता है और न ही अपने ही आदेशों की धज्जियाँ उड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सख्त कार्रवाई करता है।
देश के इसी सबसे बड़े राज्य में किसी को भी किसी तरह के मांस के साथ पकड़कर उसे गौमांस बता दिया जाता है, पीटा जाता है, यहाँ तक कि मॉब लिंचिंग कर दी जाती है। बाद में जाँच में आरोप झूठे निकलते हैं। कई अल्पसंख्यकों के स्लॉटर हाउस ऐसे ही आरोप लगते ही सील कर दिए गए हैं। उन पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उनके घर, दुकान और दूसरी संपत्तियाँ भी ध्वस्त कर दी जाती हैं।
नागरिकता साबित करने के लिए एसआईआर में जिन प्रमाणपत्रों को मान्यता दी गई थी, अब उन्हें भी मानने से इनकार किया जा रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट को मात्र यात्रा दस्तावेज़ बताते हुए नागरिकता सिद्ध करने वाला दस्तावेज़ मानने से इनकार कर दिया। उधर गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक बुजुर्ग द्वारा 15 दस्तावेज़ प्रस्तुत किए जाने के बावजूद उन्हें भारतीय नागरिक मानने से इनकार कर दिया, जबकि उन दस्तावेज़ों में 1951 की वह एनआरसी भी थी, जिसमें उनके दादा-दादी का नाम दर्ज था।
अब इस अभागे असमी मुसलमान के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प बचा है। लेकिन वहाँ महँगा वकील करना अव्वल तो सबके बस की बात नहीं है, दूसरे सर्वोच्च न्यायालय भी ऐसे मामलों में लोगों को अक्सर निराश ही कर रहा है। इसलिए किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद कम ही दिखाई देती है।
कभी-कभी कुछ हाईकोर्ट अपवादस्वरूप ऐसे फैसले और टिप्पणियाँ कर देते हैं, जिनसे उम्मीद की हल्की-सी किरण दिखाई देती है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट की एक बेंच ने कहा कि सरकार लोगों को गुलाम बनाना चाहती है, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ आंदोलन या विरोध करते ही लोगों पर कई मुकदमे दर्ज हो जाते हैं।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक बड़े छात्र नेता का कहना है कि सरकार के विरोध में आंदोलन करने के आरोप में उन पर अब तक 39 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। उधर नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि सरकार धरना-प्रदर्शन तो दूर, किसी की हत्या होने पर उसके परिवार से भी मिलने नहीं देती। ऐसा लगता है मानो राज्य में आपातकाल लगा हुआ हो।
बंगाल और बिहार में एसआईआर से छूट गए लोगों को वहाँ की सरकारों ने राज्य की समाज कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित करने का ऐलान पहले ही कर दिया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट 27 लाख लोगों को अगली बार वोट देने की बात कहकर उनके नागरिक अधिकारों का मज़ाक भी उड़ा चुका है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनावों की निष्पक्षता पहले ही संदेह के घेरे में हो, अदालतें असंवैधानिक सरकारी फैसलों को रोकने के लिए तैयार न हों और सरकार के जनविरोधी फ़ैसलों का किसी भी स्तर पर विरोध भी न करने दिया जा रहा हो, तो जनता के पास आखिर क्या विकल्प बचता है?