नेशनल हेल्थ एकाउंट के अनुसार भारत में हर साल महंगे इलाज के कारण 3 से 6 करोड़ लोग मध्यम वर्ग से गरीबी की रेखा से नीचे या उसके करीब पहुंच जाते हैं। पहले यह आंकड़ा 5.5 से 10 करोड़ तक आंका जाता था लेकिन लोगों की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर होने, उनके जागरूक होने पर स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ने और सरकार द्वारा चलाई गयी आयुष्मान भारत योजना से बड़ी संख्या में लोगों को हाॅस्पिटलाइजे़शन खर्च में कुछ राहत मिली है। नीति आयोग का कहना है कि हर साल 2.5 से लेकर 2.7 करोड़ भारतीयों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला जा रहा है।
सरकार का कहना है कि आयुष्मान कार्ड धारकों की संख्या इस समय देश में 45 करोड़ से अधिक हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि 12.69 करोड़ लोग इस योजना के तहत हर साल पांच लाख रूपये तक का अब तक निशुल्क उपचार का लाभ ले चुके हैं। समस्या यह है कि सरकार की यह योजना गरीब वर्ग के लिये होने से मीडियम क्लास के लगभग 40 करोड़ लोगों को इससे कम ही लाभ मिला है। दरअसल, बीमारी किसी की आय नहीं देखती अगर किसी को अचानाक गंभीर बीमारी में अस्पताल में भर्ती होकर आईसीयू में जाना पड़े, हार्ट ऑपरेशन या कैंसर होने पर कीमियोथेरेपी करानी पडे़ तो उस परिवार पर इतना अधिक आर्थिक बोझ आ जाता है कि उसका मासिक बजट गड़बड़ा जाता है।
गंभीर बीमारियों पर इलाज खर्च
जहाँ विकसित देशों में नागरिक स्वास्थ्य खर्च का मात्र 20 प्रतिशत स्वयं वहन करते हैं वहीं हमारे देश में यह आंकड़ा 45 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। जबकि विकसित देशों में लोगों की आय का स्तर भी हमसे काफी अधिक ही है। गंभीर बीमार होने, हार्ट अटैक, ब्रेन हेम्रेज, लकवा, एक्सीडेंट या कोई और ज़रूरी ऑपरेशन कराने के लिये एक बार निजी अस्पताल में भर्ती होने पर कम से कम 50,000 खर्च आता है। चाइल्ड बर्थ में सीजे़रियन केस होने पर यह खर्च और अधिक हो जाता है। सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत सबको पता ही है वर्ना यहां यह खर्च 6500 तक ही होता है। सरकार जीडीपी का मात्र 1.5 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करती है। थ्री स्टार से फाइव स्टार तक अस्पताल में यही खर्च लाखों रूपये तक पहुंच जाता है। जिसके लिये लोगों को जेवर-ज़मीन-मकान बेचकर या महाजन से ब्याज पर पैसा उधार लेना होता है। इसके बाद ऐसे परिवार लंबे समय तक कर्ज़ के जाल में उलझकर बच्चों की पढ़ाई, मकान का निर्माण और शादी तक को टालने को मजबूर हो जाते हैं।
संसदीय समिति की सिफारिश
संसद की एक समिति ने पिछले दिनों महंगे इलाज की शिकायतों को बढ़ता देखकर सरकार से सिफारिश की है कि सभी उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों के लिये यह ज़रूरी किया जाये कि वे रोगी को भर्ती करते हुए लंबे इलाज का अनुमानित खर्च उसके परिवार को अनिवार्य रूप से स्पष्ट करें। समिति ने उपचार के मानक, नियम और तौर तरीकों, उपलब्ध सुविधाओं और सभी तरह के खर्च के बारे में भी पारदर्शिता लाने के नियम लागू करने का सुझाव दिया है। उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मामले में वी द पीपुल संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों से वसूली जा रही भारी फीस को मजबूरी का फायदा उठाते हुए एक तरह से लूटना बताया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में वर्तमान कानून को अपर्याप्त बताते हुए नये कानून की ज़रूरत और ऐसे निजी अस्पतालों को सरकार द्वारा सशर्त दी गयी निशुल्क ज़मीन लेने के बाद भी गरीब लोगों का सस्ता इलाज नहीं करने पर सख्त कानूनी कार्यवाही पर ज़ोर दिया। सरकार और कोर्ट के रूख से यह पता तो लगता ही है कि महंगा इलाज देश में लोगों के लिये बहुत बड़ी असहनीय समस्या बन चुका है।
एनएसएसओ के एक सर्वे के अनुसार देश में 45 साल से अधिक उम्र के अधिकांश लोग नियमित रूप से दवा खाने को विवश हैं। आंकड़ें बताते हैं कि कुल इलाज का 72 प्रतिशत खर्च केवल दवाओं को खरीदने में ही होता है। इससे देश में दवा उद्योग एक बड़ा कारोबार बन गया है। भारत में आज एक लाख करोड़ से अधिक का दवा व्यवसाय चल रहा है। जिसमें सरकारी दवा कंपनियों की हिस्सेदारी मात्र 400 करोड़ की है। सरकार की इस नाम मात्र की भागीदारी से निजी क्षेत्र की दवा कंपनियों की मोनोपोली स्थापित हो चुकी है।
जीवन रक्षक दवाओं की क्या स्थिति?
हालांकि सरकार ने जीवन रक्षक दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिये 348 दवाओं के दाम निर्धारित करने का दावा किया है लेकिन इसमें सरकारी अधिकारी और निजी कंपनी के अफसर मिलकर एक खेल यह करते हैं कि उन्होंने किसी भी दवा उत्पाद में एक प्रतिशत से अधिक का हिस्सा रखने वाली ब्रांडेड कंपनियों द्वारा ही निर्धारित किये गये अलग अलग मूल्यों का औसत निकालकर उस दवा का अधिकतक दाम तय कर दिया है। जबकि सबको पता है कि निजी दवा कंपनियां लागत पर 500 से 1000 प्रतिशत तक का मुनाफा वसूल रही हैं। जिससे गरीब लोगों को ज़रूरी दवायें सस्ते रेट पर प्राइवेट ब्रांडेड कंपनियों से ही उपलब्ध कराने की सरकार की कवायद एक औपचारिकता दिखावा और मृगमरीचिका बन कर रह गयी है।
इसके साथ ही दवा नियामक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग ऑथोरिटी का यह दावा आज भी दावा ही है कि वह दवाओं के दाम निर्धारित सीमित और आम आदमी की पहुँच में रखने के लिये निजी दवा कंपनियों को मुनाफाखोरी से रोकने के लिये बाज़ार के हवाले नहीं करेगी बल्कि लागत के हिसाब से दवाओं के रेट तय करने के लिये प्रयासरत है। सरकार दवा बाज़ार का यह सच जानती है कि पूंजीवादी सिस्टम में दवा कंपनियाँ भी अपना मुनाफा मरीजों की जान की परवाह नहीं करते हुए हर हाल में बढ़ाने की कोशिश में लगी होंगी फिर भी उनको बेकाबू छोड़ दिया गया है।
दवाएँ इतनी महंगी क्यों?
सरकार की यह अनदेखी या अपराधिक लापरवाही की यह हालत तब है जब कॉरपोरेट मंत्रालय की लागत लेखा शाखा ने अपनी एक स्टडी में यह पाया है कि देश की अधिकांश दवा कंपनियां दवाओं की लागत में 1100 प्रतिशत तक का लाभ जोड़कर दवाओं को बेच रही हैं। एनएफपीए के तमाम नियामकों, नियमों और शर्तों को धता बताते हुए दवा कंपनियाँ हाईकोर्ट के अनुसार लोगों की मजबूरी का नाजायज लाभ उठाकर उनको एक तरह से लूट रही हैं। साथ ही दवा कंपनियां सरकार के किसी भी नये कानून, नियमन और रेग्यूलेटर का भी खुला विरोध करती चली आ रही हैं। यही कारण है कि लोग दवा कंपनियों की मनमानी के खिलाफ कोर्ट जाने लगे हैं। मानकों से अधिक मूल्य वसूलने के लिये निजी दवा कंपनियों के खिलाफ कोर्ट में 900 से अधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से कुछ मुकदमों में अदालत ने इन दवा कंपनियों पर हज़ारों करोड़ का जुर्माना भी लगाया है लेकिन इन ब्रांडेड दवा कंपनियों के दुस्साहस की हालत यह है कि इन्होंने मात्र 250 करोड़ अर्थदंड ही अब तक जमा किया है।
इतना ही नहीं, ये कंपनियाँ नियम-कानून का मजाक उड़ाकर भी दवाओं का निर्माण भंडारण और बिक्री कर रही हैं। इसके साथ ही सरकार से नियामक को कंपनियों के हिसाब से चलने का निर्देश देने की मांग भी कर रही हैं। सरकार का रूख़ भी इस मामले में निजी दवा कंपनियों के बेकाबू दवा के दामों को लेकर कोई बहुत आशावादी या सकारात्मक नहीं लगता क्योंकि वह भी पूंजीवादी बाज़ारवादी और मुनाफाखोरी नीति आज के दौर में अपरिहार्य मानकर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को महंगे इलाज के लिये इनके ही रहम ओ करम पर छोड़ चुकी है। अब तो शिक्षा व्यवस्था को बदलने को संघर्ष कर रहे युवा वर्ग से ही जनता को कुछ आस जगी है। यह अलग बात है कि युवा वर्ग ही अपनी पढ़ाई नौकरी व पेपर लीक की समस्या के साथ चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों पर भी नज़र डाले तो कुछ सुधार हो सकता है क्योंकि बीमार और बुज़ुर्ग लोग न तो आंदोलन करने की स्थिति में हैं और न ही सरकार उनकी बात सुनेगी।