क्या अब ISI की स्वायत्तता निशाने पर है? नया इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट बिल 2026 ISI को सरकार द्वारा नियुक्त 'बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स' के अधीन लाने और एकेडमिक काउंसिल की भूमिका को काफी कम करने की वकालत करता है। पढ़िए फैकल्टी सदस्यों की क्या हैं चिंताएं और सरकार का पक्ष।
आईआईटी और आईआईएम के बाद अब देश के सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्थानों में से एक भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्वायत्तता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। संसद में पेश किए गए इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट बिल 2026 में कुछ ऐसे बदलाव किए गए हैं कि संस्थान के कई फैकल्टी सदस्यों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि नया क़ानून संस्थान के प्रशासन और प्रमुख नियुक्तियों में केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ा देगा। इससे आईएसआई की स्वतंत्र कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। ऐसे बदलावों को लेकर ही सवाल उठ रहे हैं कि क्या आईएसआई की स्वायत्तता को ख़तरा नहीं है और क्या ऐसे बदलाओं के बाद सरकार की मनमर्जी के अनुसार आँकड़े तैयार कराने का ख़तरा नहीं बना रहेगा?
ऐसे ही उठते गंभीर सवालों के बीच केंद्र सरकार का कहना है कि बदलते समय में संस्थान को अधिक जवाबदेह, आधुनिक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और एडवांस एनालिटिक्स जैसी भविष्य की तकनीकों के अनुरूप बनाने के लिए ये बदलाव जरूरी हैं।
95 साल पुराने संस्थान में सबसे बड़ा बदलाव
भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना वर्ष 1931 में प्रसिद्ध सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने की थी। कोलकाता स्थित इस संस्थान ने भारत की पंचवर्षीय योजनाओं, नेशनल सैंपल सर्वे यानी एनएसएस और सांख्यिकी, गणित, अर्थशास्त्र तथा कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में अहम योगदान दिया है। देश के इतने अहम और बेहद ज़रूरी काम को देखते हुए ही संस्थान को पूरी तरह से सरकारों से मुक्त रखा गया और किसी भी दौर में सरकारी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं रही।
ISI अब तक कैसे काम कर रहा है?
ISI की शुरुआत प्रेसिडेंसी कॉलेज में एक सांख्यिकी प्रयोगशाला के तौर पर हुई थी और इसे पहले 'सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860' और बाद में 'वेस्ट बंगाल सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1961' के तहत एक सोसाइटी के तौर पर रजिस्टर किया गया था। 1959 में संसद के एक एक्ट के ज़रिए इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया, जिससे इसे डिग्री देने का अधिकार मिला और यह केंद्र से मिलने वाली ग्रांट और ऑडिट के लिए योग्य हो गया। हालाँकि, यह एक सोसाइटी के तौर पर ही काम करता रहा। इसका सबसे बड़ा फ़ैसला लेने वाला निकाय 33 सदस्यों वाली काउंसिल है। इसमें एक चुने हुए चेयरमैन, केंद्र के छह प्रतिनिधि और ऐसे वैज्ञानिक शामिल होते हैं जो संस्थान में काम नहीं करते हैं। केंद्र के प्रतिनिधियों में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। संस्थान के डायरेक्टर की नियुक्ति काउंसिल करती है।लेकिन अब प्रस्तावित ISI बिल 2026 इस संस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था में पिछले लगभग 95 वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव लाने की तैयारी माना जा रहा है।
नए बिल में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
प्रस्तावित कानून के अनुसार ISI की मौजूदा प्रशासनिक संरचना में कई अहम बदलाव किए जाएंगे-
- संस्थान का संचालन सरकार द्वारा नियुक्त बोर्ड ऑफ गवर्नर्स करेगा।
- भारत के राष्ट्रपति को संस्थान का विजिटर बनाया जाएगा।
- राष्ट्रपति को संस्थान की समीक्षा कराने और जांच के आदेश देने का अधिकार होगा।
- ISI के निदेशक की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा गठित सर्च-कम-सेलेक्शन कमेटी की सिफारिशों के आधार पर होगी।
- संस्थान की वर्तमान सोसायटी का कानूनी ढांचा ख़त्म कर इसे संसद के कानून के तहत एक वैधानिक निकाय बनाया जाएगा।
फैकल्टी सदस्यों को क्यों है चिंता?
ISI के कई शिक्षकों का मानना है कि प्रस्तावित बिल से संस्थान की स्वायत्तता कमजोर हो सकती है। बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में सरकार की भूमिका बढ़ेगी फैकल्टी का कहना है कि वर्तमान परिषद में संस्थान के भीतर से चुने गए प्रतिनिधियों की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन नए बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में सरकार के प्रतिनिधित्व को अधिक महत्व मिलेगा और वही सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था होगी। उनका मानना है कि इससे संस्थान के आंतरिक निर्णयों पर बाहरी प्रभाव बढ़ सकता है।
निदेशक की नियुक्ति का तरीका बदलेगा
अभी तक ISI के निदेशक की नियुक्ति संस्थान की मौजूदा परिषद करती है, जिसमें आंतरिक और बाहरी दोनों तरह के विशेषज्ञ शामिल होते हैं। लेकिन नए बिल के तहत निदेशक की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा गठित चयन समिति की सिफारिश पर होगी। शिक्षकों का कहना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में निदेशक की नियुक्ति उसकी शोध की प्रक्रिया व दिशा , शिक्षकों की भर्ती और अकादमिक प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है। इसलिए इस प्रक्रिया में सरकार की बढ़ती भूमिका चिंता का विषय है।
एकेडमिक काउंसिल की भूमिका घटने का डर
हालांकि प्रस्तावित कानून में एकेडमिक काउंसिल को संस्थान की प्रमुख अकादमिक संस्था बनाए रखा गया है, लेकिन फैकल्टी का कहना है कि उसके फैसले भी अंततः बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की मंजूरी पर निर्भर होंगे। इससे अकादमिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता कम हो सकती है।
1931 से ISI एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में काम करता रहा है। नए कानून के बाद यह व्यवस्था समाप्त होकर संस्थान सीधे संसद के कानून के तहत संचालित होगा। फैकल्टी का कहना है कि यह केवल कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि संस्थान की दशकों पुरानी कार्यसंस्कृति में भी बड़ा बदलाव होगा।
सरकार का क्या कहना है?
केंद्र सरकार का कहना है कि भारतीय सांख्यिकी संस्थान अधिनियम 1959 आज के समय की जरूरतों के अनुरूप नहीं रह गया है। सरकार के अनुसार नया कानून प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाएगा, जवाबदेही बढ़ाएगा, आधुनिक शोध को प्रोत्साहित करेगा, डेटा साइंस और AI जैसे क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ तैयार करने में मदद करेगा, वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाएगा।
सरकार का यह भी कहना है कि यह विधेयक पूर्व सीएसआईआर महानिदेशक डॉ. आर. ए. माशेलकर की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर आधारित है। हालाँकि ISI के कुछ शिक्षकों का दावा है कि माशेलकर समिति ने सुधारों की सिफारिश तो की थी, लेकिन 1959 के कानून को पूरी तरह ख़त्म करने या सोसायटी मॉडल खत्म करने की सिफारिश नहीं की थी।
ISI दूसरे संस्थानों से अलग क्यों है?
ISI की स्थापना संसद के कानून से नहीं हुई थी। यह पहले एक स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थान के रूप में विकसित हुआ और बाद में 1959 में इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। संस्थान की प्रमुख उपलब्धियाँ-
- भारत के नेशनल सैंपल सर्वे की सांख्यिकीय नींव तैयार करना।
- पंचवर्षीय योजनाओं के लिए आर्थिक विश्लेषण उपलब्ध कराना।
- 1956 में भारत का पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर स्थापित करना।
- गणित, सांख्यिकी, अर्थशास्त्र, मशीन लर्निंग और कंप्यूटर विज्ञान में विश्वस्तरीय शोध।
इसी कारण इसकी प्रशासनिक संरचना में बदलाव पर बड़ी बहस हो रही है। ISI बिल तब आया है जब पिछले कुछ वर्षों में देश के कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव किए गए हैं।
IIM में भी हुए थे बदलाव
आईआईएम संशोधन अधिनियम 2023 के ज़रिए केंद्र सरकार ने विजिटर की शक्तियां बढ़ाईं और निदेशकों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव किए। सरकार ने इसे जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बताया था, जबकि कई पूर्व निदेशकों और शिक्षाविदों ने इसे संस्थानों की स्वायत्तता में कमी बताया।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी में काफ़ी पहले से ही यह प्रावधान है जिसमें राष्ट्रपति विजिटर होते हैं और बोर्ड आधारित प्रशासनिक व्यवस्था लागू है। आईएसआई का नया मॉडल भी काफी हद तक इसी ढांचे के करीब माना जा रहा है।
नई शिक्षा नीति का भी असर?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और यूजीसी के विभिन्न मसौदा नियमों में भी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रशासन, नियुक्तियों और संचालन में समान व्यवस्था लागू करने पर जोर दिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। वहीं आलोचकों का मानना है कि इससे केंद्र सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है और विश्वविद्यालयों की पारंपरिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
बहरहाल, आईएसआई बिल 2026 केवल एक संस्थान का मामला नहीं माना जा रहा है। यह इस बड़ी बहस का हिस्सा बन गया है कि देश के प्रमुख शैक्षणिक और शोध संस्थानों में जवाबदेही और स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सरकार इसे आधुनिक प्रशासनिक सुधार बता रही है, जबकि कई फैकल्टी सदस्य इसे संस्थान की स्वतंत्र पहचान और अकादमिक स्वायत्तता के लिए चुनौती मान रहे हैं।