दुनिया की राजनीति में सिद्धांत अक्सर पीछे छूट जाते हैं। ताक़त बहुत कुछ ढक लेती है और बहुत कुछ माफ़ भी कर देती है।
अमेरिका अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय से बाहर है। चीन उइगरों को कैद शिविरों में रखकर भी सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बना रहता है। फ्रांस यमन की तबाही के बीच सऊदी अरब को हथियार बेचता है। ब्राज़ील बुचा की भयावहता के बाद भी पुतिन का स्वागत करता है। इन सबके बावजूद इन देशों की वैश्विक हैसियत कम नहीं होती।
भारत का मामला अलग है। भारत ने सिर्फ़ शक्ति का नहीं, नैतिक नेतृत्व का दावा किया है। दावा ऊँचा हो तो कसौटी भी ऊँची होती है। भारत खुद को विश्वगुरु कहता है- एक ऐसी आवाज़ जो दुनिया को रास्ता दिखा सके। विश्वबंधु- सबका मित्र, किसी का मोहरा नहीं। इन शब्दों में सिर्फ़ रणनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिज्ञा छिपी है। भारत सिर्फ़ मेज़ पर जगह नहीं चाहता; वह मेज़ की बनावट बदलना चाहता है। यही दावा आज सवालों में है।
अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने जब इसराइल के प्रधानमंत्री पर युद्ध अपराधों के वारंट जारी किए, दुनिया का ध्यान ग़ज़ा की ओर था- भूख, तबाही, और न्याय की पुकार के बीच। इन्हीं दिनों भारत के प्रधानमंत्री तेल अवीव पहुँचे और इसराइली संसद में भाषण दिया। भारत पर कानूनी बाध्यता नहीं थी- यह बात सही है। पर नैतिक प्रश्न कानून से बड़ा होता है।

जो देश खुद को दुनिया की नैतिक आवाज़ बताता है, वह जब खुले मंच पर ऐसे नेता को गले लगाता है जिस पर नागरिकों को भूखा रखने जैसे आरोप हों, तो यह सिर्फ़ कूटनीति नहीं रह जाती। यह एक संदेश बन जाता है कि न्याय साझेदारियों के आगे झुक सकता है, और सिद्धांत पहचान देखकर बदल सकते।
भारत की सुरक्षा ज़रूरतें वास्तविक हैं। इसराइल से मिलने वाली तकनीक और खुफ़िया सहयोग महत्त्वपूर्ण हैं। कोई गंभीर रणनीतिकार इन रिश्तों को तोड़ने की बात नहीं करता। लेकिन सुरक्षा सहयोग के लिए सार्वजनिक उत्सव ज़रूरी नहीं होता। दुनिया के कई देश चुपचाप रिश्ते निभाते हैं और साथ ही न्यायिक प्रक्रियाओं का सम्मान भी करते हैं।
भारत भी ऐसा कर सकता था। उसने एक अधिक नाटकीय रास्ता चुना—और राजनीति में दृश्य अक्सर शब्दों से ज़्यादा बोलते हैं आई।
कश्मीर में आतंकी हमले के बाद भारत ने सीमापार कार्रवाई की। आत्मरक्षा का दावा असंगत नहीं था। पर नागरिकों की मौत की रिपोर्टें सामने आईं—जुमे की नमाज़ के दौरान मस्जिद परिसर तक निशाना बना।
कानूनी जाँच अपनी जगह है। पर नैतिक प्रश्न सरल है: जिस तर्क को भारत ग़ज़ा में गलत कहता है, वही तर्क अपने लिए कैसे स्वीकार्य हो जाता है?
कश्मीर में हिरासत, यातना और ग़ायब कर दिए जाने की शिकायतें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दर्ज हैं। भारत इन्हें आंतरिक मामला कहकर टाल देता है। पर जिन संधियों पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं, वे हर उस क्षेत्र पर लागू होती हैं जहाँ राज्य का प्रभावी नियंत्रण हो। कश्मीर को इस दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
भारत जलवायु वार्ताओं, वैक्सीन न्याय और दक्षिण-दक्षिण सहयोग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। G20 और BRICS में उसकी सक्रियता वास्तविक है। फिर भी एक पैटर्न उभरता है— कानून प्रतिद्वंद्वियों के लिए कठोर, साझेदारों के लिए नरम, और अपने लिए ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के नाम पर ढीला। यह स्वायत्तता नहीं, वही पुरानी शक्ति-राजनीति है।
भारत की नैतिक आकांक्षा कोई नया नारा नहीं है। विवेकानंद ने भारत को आध्यात्मिक मार्गदर्शक कहा। गांधी ने साधन और लक्ष्य की एकता को राजनीति की आत्मा बताया। नेहरू ने नैतिक उदाहरण को भारत की वैश्विक भूमिका का आधार माना।
इन सिद्धांतों ने भारत को उसकी असली पूँजी दी- विश्वसनीयता। विश्वसनीयता घोषणा से नहीं, व्यवहार से बनती है।और व्यवहार की कीमत चुकानी पड़ती। भारत दो रास्तों में से एक चुन सकता है: 1. पारंपरिक शक्ति-राजनीति—गठबंधन, ख़तरे, राष्ट्रीय हित और 2. या वह भूमिका जिसका दावा वह करता है—वैश्विक दक्षिण की भरोसेमंद आवाज़ और नियम-आधारित बहुध्रुवीय व्यवस्था का निर्माता।

दोनों रास्ते वैध हैं। पर दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

जो देश नैतिक नेतृत्व चाहता है, वह सिद्धांत को सुविधा के अनुसार नहीं बदल सकता। जैसे ही सिद्धांत सुविधा बनते हैं, विश्वसनीयता टूट जाती है। भारत के पास असाधारण पूँजी है—लोकतंत्र, सभ्यतागत गहराई, जनसंख्या का पैमाना और उपनिवेशवाद की स्मृति। यह संयोजन किसी और उभरती शक्ति में नहीं मिलता।
पर नैतिक नेतृत्व की एक ही शर्त है—क़ीमत चुकाने की तैयारी। कभी मित्र को कहना पड़ता है कि दोस्ती कानून से ऊपर नहीं। कभी मंच ठुकराना पड़ता है। कभी सिद्धांत को अपने ऊपर भी लागू करना पड़ता है। महाशक्तियाँ अक्सर इस कसौटी पर नहीं टिकतीं। इसीलिए नैतिक नेतृत्व दुर्लभ है।
भारत इसे पा सकता है। सवाल सिर्फ़ इतना है—क्या वह इसे अर्जित करने को तैयार है?