लोकतंत्र, संविधान और न्यायपालिका के सामने खड़ा एक असहज प्रश्न है- “क्या सभी नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? अगर लोग विरोध करेंगे तो उन पर मुकदमे कर दिए जाएंगे? नागरिक ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ या ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे भी नहीं लगा सकते?” बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति माधव जमदार की यह टिप्पणी सामान्य न्यायिक टिप्पणी नहीं थी। यह उस बेचैनी की अभिव्यक्ति थी जिसे पिछले कुछ वर्षों से देश के अनेक नागरिक, पत्रकार, छात्र, किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और संवैधानिक विशेषज्ञ अलग-अलग शब्दों में व्यक्त करते रहे हैं।

जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी आई, उसमें एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ सरकार विरोधी प्रदर्शन और नारेबाज़ी के आधार पर निष्कासन (Externment) की कार्रवाई की गई थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूछा कि यदि कोई नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से सरकार के खिलाफ नारे लगाता है तो क्या यह इतना बड़ा अपराध है कि उसे अपने ही क्षेत्र से बाहर कर दिया जाए? यह प्रश्न केवल उस एक मामले तक सीमित नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप पर एक व्यापक बहस का द्वार खोलता है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी

भारत का संविधान केवल सरकार बनाने का दस्तावेज़ नहीं है। यह नागरिकों की स्वतंत्रता का भी घोषणापत्र है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होकर विरोध करने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर कुछ “युक्तिसंगत प्रतिबंध” लगाए जा सकते हैं, लेकिन संविधान की मूल भावना यही है कि सत्ता की आलोचना लोकतंत्र का अभिन्न अंग है। इसीलिए लोकतंत्र और अधिनायकवाद के बीच सबसे बड़ा अंतर चुनावों से नहीं, बल्कि असहमति के प्रति सत्ता के व्यवहार से तय होता है।
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यदि नागरिक सरकार की आलोचना कर सकता है, यदि वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री या किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध नारे लगा सकता है, यदि वह धरना दे सकता है, ज्ञापन दे सकता है और सरकार से जवाब मांग सकता है, तो लोकतंत्र जीवित है। लेकिन यदि यही कार्य धीरे-धीरे मुकदमों, गिरफ़्तारियों, प्रशासनिक प्रतिबंधों और भय का कारण बनने लगें तो लोकतंत्र का ढांचा भले बना रहे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। पिछले एक दशक में भारत में अनेक ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्होंने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया है।

CAA का विरोध करने पर मुक़दमे

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में हुए आंदोलनों के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए। कुछ मामलों में कठोर आतंकवाद-रोधी कानूनों का भी उपयोग किया गया। सरकार का कहना था कि कार्रवाई केवल विरोध के कारण नहीं, बल्कि हिंसा और षड्यंत्र के आरोपों के आधार पर की गई। दूसरी ओर अभियुक्तों, उनके वकीलों और अनेक नागरिक अधिकार संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक असहमति पर कठोर कार्रवाई बताया। इन मामलों का अंतिम निर्णय न्यायालयों को करना है, लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि कई अभियुक्त वर्षों तक विचाराधीन कैद में रहे या अब भी हैं। इसी प्रकार किसान आंदोलन के दौरान भी हजारों किसानों पर विभिन्न राज्यों में मुकदमे दर्ज हुए। अनेक पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज हुईं। कुछ मामलों में बाद में न्यायालयों ने राहत दी, कुछ में जांच जारी है। पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी के समय दिल्ली की एक अदालत ने कहा था कि लोकतंत्र में नागरिकों को केवल इसलिए जेल नहीं भेजा जा सकता है क्योंकि वे सरकार की नीतियों से असहमत हैं। यह टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना की याद दिलाती है। यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल वर्तमान समय में ही ऐसा हुआ है।

भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि सत्ता में आने के बाद लगभग हर दल आलोचना के प्रति पहले की तुलना में कम सहिष्णु हो जाता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होता है कि क्या सत्ता आलोचना को स्थान देती है या उसे ख़तरे के रूप में देखने लगती है।

स्वतंत्रता आंदोलन और असहमति

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं असहमति का सबसे बड़ा आंदोलन था। अंग्रेज़ी सरकार भी महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह को कानून तोड़ने वाला बताती थी। लेकिन इतिहास ने सिद्ध किया कि अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रतिरोध लोकतंत्र और स्वतंत्रता दोनों की नींव बन सकता है। 1975 का आपातकाल इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। उस समय प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया और नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित कर दिया गया। उस दौर का सबसे बड़ा सबक यही था कि लोकतंत्र केवल चुनावों से सुरक्षित नहीं रहता; उसे स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और निर्भीक नागरिक समाज की भी आवश्यकता होती है। इसी कारण आपातकाल के बाद भारतीय लोकतंत्र ने यह स्वीकार किया कि नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा किसी भी सरकार से अधिक महत्वपूर्ण है। आज प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सी पार्टी सत्ता में है।

“सरकार मुर्दाबाद” कहने के मायने

प्रश्न यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रहा है जहाँ सरकार की आलोचना और राष्ट्र-विरोध के बीच की रेखा जानबूझकर धुंधली की जा रही है? क्या सरकार और राष्ट्र को एक ही मान लेने का आग्रह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ है? यदि कोई नागरिक “सरकार मुर्दाबाद” कहता है, तो क्या वह “भारत मुर्दाबाद” कह रहा है? संविधान का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। सरकारें अस्थायी हैं, राष्ट्र और संविधान स्थायी हैं। यहीं पर न्यायमूर्ति माधव जमदार की टिप्पणी एक बड़े संवैधानिक प्रश्न में बदल जाती है। यदि शांतिपूर्ण राजनीतिक नारे भी प्रशासनिक कार्रवाई का आधार बनने लगें, तो क्या नागरिकों का लोकतांत्रिक आत्मविश्वास प्रभावित नहीं होगा? क्या भय और लोकतंत्र साथ-साथ चल सकते हैं? 

इन प्रश्नों का उत्तर केवल किसी एक मुकदमे में नहीं मिलेगा। इसका उत्तर भारतीय संविधान, न्यायपालिका और हमारे लोकतांत्रिक व्यवहार में छिपा है। भारतीय न्यायपालिका ने भी समय-समय पर लोकतंत्र की इसी मूल भावना को दोहराया है। 1962 में केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि सरकार की कठोर आलोचना या उसके विरुद्ध तीखी भाषा का प्रयोग अपने-आप में राजद्रोह नहीं है। केवल वही अभिव्यक्ति दंडनीय हो सकती है जो हिंसा के लिए प्रत्यक्ष उकसावे या सार्वजनिक व्यवस्था को वास्तविक खतरे में बदल जाए। इस फैसले ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि लोकतंत्र में सरकार और राष्ट्र एक ही चीज़ नहीं हैं। सरकार की आलोचना राष्ट्र-विरोध नहीं हो सकती। 2015 में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को निरस्त करते हुए कहा कि किसी विचार से असहमति, अपमान या असुविधा पैदा होना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का पर्याप्त आधार नहीं है। 

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में विचारों की विविधता और असहमति ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

2018 में मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। राज्य का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं है, बल्कि नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने का अवसर उपलब्ध कराना भी है। यही संवैधानिक संतुलन है। इसी प्रकार अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनेट को अभिव्यक्ति और व्यापार के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में स्वीकार करते हुए कहा कि अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट बंद करना संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता। यह फैसला केवल इंटरनेट का नहीं था; यह नागरिक स्वतंत्रता की बदलती प्रकृति को समझने का प्रयास भी था।

‘असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व है’

और शायद सबसे अधिक उद्धृत होने वाली टिप्पणी न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की उस पीठ से आई जिसमें उन्होंने कहा था—“असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व है। यदि उसे बंद कर दिया जाए तो लोकतंत्र का प्रेशर कुकर फट सकता है।” यह केवल एक साहित्यिक वाक्य नहीं था। यह भारतीय संविधान के दर्शन का सार था। यही कारण है कि न्यायमूर्ति माधव जमदार की हालिया टिप्पणी को केवल एक अदालत की टिप्पणी मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कोई नया सिद्धांत नहीं दिया। उन्होंने केवल संविधान की उसी मूल भावना की याद दिलाई जिसे सर्वोच्च न्यायालय कई दशकों से दोहराता रहा है।
लेकिन प्रश्न केवल अदालतों का नहीं है। प्रश्न हमारे लोकतांत्रिक व्यवहार का भी है। आज सार्वजनिक जीवन में एक नया चलन दिखाई देता है। सरकार की आलोचना करने वाला व्यक्ति तुरंत किसी राजनीतिक खांचे में डाल दिया जाता है। उसे “देश-विरोधी”, “अर्बन नक्सल”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “विदेशी एजेंट” या किसी अन्य विशेषण से संबोधित कर देना सामान्य राजनीतिक भाषा का हिस्सा बन चुका है। इससे सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक संवाद को होता है। क्योंकि जब किसी व्यक्ति के तर्क का उत्तर तर्क से नहीं बल्कि उसके चरित्र पर आक्रमण करके दिया जाता है, तब लोकतंत्र बहस से प्रचार की ओर बढ़ने लगता है। इतिहास बताता है कि यह प्रवृत्ति किसी एक देश तक सीमित नहीं रही। दुनिया के लगभग हर लोकतंत्र में ऐसे दौर आए जब सत्ताधारी दल ने स्वयं को राष्ट्र का पर्याय मानना शुरू कर दिया। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि अंततः वही लोकतंत्र मजबूत बने जिनकी संस्थाओं ने सत्ता और राष्ट्र के बीच की रेखा को स्पष्ट बनाए रखा।

महात्मा गांधी का आंदोलन

भारत में भी यह रेखा हमेशा स्पष्ट रही है। जब महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ी सरकार के विरुद्ध “भारत छोड़ो” आंदोलन चलाया था तब उन्होंने भारत के विरुद्ध नहीं, सरकार के विरुद्ध संघर्ष किया था। जब जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल का विरोध किया था तब उन्होंने संविधान बचाने की लड़ाई लड़ी थी, राष्ट्र को कमजोर करने की नहीं। जब अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष में रहते हुए सरकार की आलोचना करते थे तब भी वह लोकतंत्र का ही हिस्सा था। लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि आज जो विपक्ष में है वह कल सत्ता में हो सकता है और आज जो सत्ता में है वह कल विपक्ष में बैठ सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक अधिकार किसी सरकार की कृपा नहीं होते; वे नागरिक की स्थायी संपत्ति होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न आंदोलनों—चाहे वे नागरिकता संशोधन कानून के विरोध से जुड़े हों, किसानों के आंदोलन से, विश्वविद्यालयों के आंदोलनों से या अन्य सार्वजनिक विरोधों से—अनेक लोगों के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए। सरकार का कहना है कि ये मामले केवल विरोध के नहीं बल्कि हिंसा, षड्यंत्र या अन्य दंडनीय अपराधों से जुड़े हैं। 

नागरिक स्वतंत्रता

दूसरी ओर अनेक मानवाधिकार संगठन, पूर्व न्यायाधीश और विधि विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि कई मामलों में विचाराधीन कैद की अवधि इतनी लंबी हो जाती है कि वह स्वयं दंड जैसी प्रतीत होती है। यही वह क्षेत्र है जहाँ न्यायपालिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है—क्योंकि अदालतें ही यह सुनिश्चित करती हैं कि कानून व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता नागरिक स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से कुचलने का साधन न बन जाए। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में अधिकार केवल लोकप्रिय लोगों के लिए नहीं होते। संविधान उस व्यक्ति की भी रक्षा करता है जिससे हम सहमत नहीं हैं। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल उन लोगों तक सीमित हो जाए जो सरकार की प्रशंसा करते हैं, तो वह स्वतंत्रता नहीं बल्कि विशेषाधिकार बन जाती है। लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब सत्ता अपने सबसे कठोर आलोचक के अधिकार की भी रक्षा करे। दुनिया के विकसित लोकतंत्र इसी सिद्धांत पर टिके हैं। सरकारें आती हैं, जाती हैं, लेकिन नागरिक स्वतंत्रताएँ बनी रहती हैं। भारत का संविधान भी इसी आदर्श पर निर्मित हुआ था। 

इसलिए न्यायमूर्ति माधव जमदार का प्रश्न केवल महाराष्ट्र सरकार से नहीं है। यह हर उस सरकार से है जो आज सत्ता में है या कल सत्ता में आएगी। क्योंकि सत्ता का स्वभाव बदल सकता है, लेकिन संविधान का चरित्र नहीं बदलना चाहिए।

विश्लेषण से और

भारत का कैसा लोकतंत्र?

आज भारत के सामने सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न यही है कि क्या हम केवल चुनाव कराने वाला लोकतंत्र बनकर रह जाएंगे, या उस गणराज्य की मूल भावना को भी बचाए रखेंगे जिसकी कल्पना संविधान सभा ने की थी। चुनाव लोकतंत्र की शुरुआत है, उसका अंत नहीं। लोकतंत्र का वास्तविक जीवन संसद से बाहर, अदालतों में, विश्वविद्यालयों में, अख़बारों में, सोशल मीडिया पर और सड़कों पर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने वाले नागरिकों के बीच दिखाई देता है। यदि नागरिक यह सोचने लगे कि सरकार के विरुद्ध बोलने से पहले उसे मुकदमे, गिरफ़्तारी, प्रशासनिक कार्रवाई या वर्षों तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है, तो धीरे-धीरे लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व—निर्भीक नागरिक—कमज़ोर होने लगता है। 

संविधान की सबसे बड़ी शक्ति नागरिक का निर्भय होना है। और नागरिक तभी निर्भय रहेगा जब उसे यह विश्वास होगा कि उसकी स्वतंत्रता सरकार की इच्छा पर नहीं, संविधान की गारंटी पर आधारित है। इसलिए न्यायमूर्ति माधव जमदार की टिप्पणी को केवल एक न्यायिक टिप्पणी की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक संवैधानिक स्मरण-पत्र की तरह पढ़ा जाना चाहिए। यह हमें याद दिलाती है कि सरकारें जनता की मालिक नहीं होतीं। वे जनता की सेवक होती हैं। लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने में होती है। जिस दिन यह क्षमता समाप्त होने लगती है, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा घायल होने लगती है। और लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा किसी एक दल, एक नेता या एक विचारधारा की नहीं, पूरे भारतीय गणराज्य की सामूहिक जिम्मेदारी है।