प्रो. मुकेश कुमार ने हाल के छात्र आंदोलन, जंतर-मंतर के प्रदर्शनों और उस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उसके नेताओं की प्रतिक्रियाओं के संदर्भ में शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. अपूर्वानंद से बातचीत की। बातचीत में प्रो. अपूर्वानंद ने आंदोलन, युवाओं की भाषा, संघ की सांस्कृतिक परियोजना और समकालीन राजनीति पर विस्तार से अपनी राय रखी। पेश है इस बातचीत का संपादित रूप।

प्रश्न: जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन के बाद संघ परिवार के नेताओं की जो प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उन्हें आप कैसे देखते हैं? यह आंदोलन उनके लिए इतना बड़ा संकट क्यों बन गया?

अपूर्वानंद: मुझे लगता है कि इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें पिछले एक दशक से अधिक के सार्वजनिक माहौल को देखना होगा। सोशल मीडिया पर यदि कोई व्यक्ति नरेंद्र मोदी, बीजेपी या संघ की आलोचना करता है तो उसके खिलाफ जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल होता है, वह किसी से छिपी नहीं है। गालियाँ, धमकियाँ और अपमानजनक टिप्पणियाँ आज सामान्य बात हो गई हैं। ऐसे में यदि संघ यह दावा करता है कि वह समाज का चरित्र निर्माण कर रहा है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि यह भाषा किस चरित्र का परिणाम है।

संघ और हिंदुत्व की राजनीति से जुड़े अनेक लोग वर्षों से अपने विरोधियों के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। महिलाओं को बलात्कार की धमकियाँ दी जाती हैं, मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाई जाती है, राजनीतिक विरोधियों का मज़ाक उड़ाया जाता है। तब किसी को संस्कृति और संस्कार की चिंता नहीं होती। इसलिए आज यदि वही भाषा किसी दूसरे रूप में सामने आई है तो उसके स्रोतों पर भी विचार होना चाहिए।
ताज़ा ख़बरें
प्रश्न: लेकिन संघ का कहना है कि नई पीढ़ी संस्कारहीन होती जा रही है और अभिभावक अपने बच्चों को सही मूल्य नहीं दे पा रहे हैं।

अपूर्वानंद: यह तर्क मुझे विचित्र लगता है। जिन युवाओं पर आज आरोप लगाए जा रहे हैं, उनका पूरा बचपन और युवावस्था इसी राजनीतिक-सांस्कृतिक वातावरण में बीता है। उन्होंने वही भाषा सुनी जो सार्वजनिक जीवन में प्रचलित रही। उन्होंने देखा कि सत्ता के निकट खड़े लोग आलोचकों से किस तरह बात करते हैं। यदि आज युवा उसी भाषा में प्रतिक्रिया कर रहे हैं तो शिकायत दूसरों से करने के बजाय आत्ममंथन की ज़रूरत है।
मैं स्वयं गाली-गलौज का समर्थक नहीं हूँ। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि गाली कई बार भाषा की असफलता का संकेत होती है। जब लोगों को लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, संवाद के रास्ते बंद हो गए हैं और संस्थाएँ जवाब नहीं दे रही हैं, तब आक्रोश भाषा की सीमाएँ तोड़ देता है।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि इस पूरे मामले में लड़कियों की भूमिका ने संघ परिवार को विशेष रूप से विचलित किया है?

अपूर्वानंद: इसमें कोई संदेह नहीं कि पितृसत्तात्मक मानसिकता की भूमिका है। हमारे समाज में पुरुषों की आक्रामकता को अक्सर सहन कर लिया जाता है, लेकिन जब लड़कियाँ सार्वजनिक रूप से असहमति व्यक्त करती हैं तो उसे चुनौती के रूप में देखा जाता है। यहाँ केवल भाषा का प्रश्न नहीं है। असली झटका इस बात का है कि वे लड़कियाँ भी उस वैचारिक नियंत्रण के भीतर नहीं हैं, जिसके बारे में लंबे समय से दावा किया जाता रहा है।
दरअसल, यह दृश्य उन लोगों के लिए असहज करने वाला था जो मानते थे कि नई पीढ़ी पूरी तरह उनके प्रभाव में आ चुकी है। उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि युवा समाज में एक स्वतंत्र चेतना भी मौजूद है।
अपूर्वानंद
प्रश्न: क्या यह कहा जा सकता है कि जंतर-मंतर ने संघ के ‘चरित्र निर्माण’ वाले दावे को चुनौती दी है?

अपूर्वानंद: मैं तो हमेशा पूछता हूँ कि आखिर किस चरित्र की बात की जा रही है? यदि हम पिछले कई दशकों के राजनीतिक व्यवहार को देखें तो झूठ, घृणा, ध्रुवीकरण और हिंसक भाषा सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बने हैं। ऐसे में चरित्र निर्माण का दावा अपने आप में प्रश्नों के घेरे में आ जाता है।

मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूँ जो संघ से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों में पढ़े, बाद में व्यापक दुनिया से परिचित हुए और फिर उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे लंबे समय तक एक वैचारिक घेरे में बंद रहे। इसलिए यह मान लेना कि एक ही विचारधारा पूरे समाज को संस्कारित कर रही है, वास्तविकता से मेल नहीं खाता।

प्रश्न: क्या संघ की बेचैनी का एक कारण यह भी है कि उसे लग रहा है कि युवा पीढ़ी उसके हाथ से निकल रही है?

अपूर्वानंद: हाँ, मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण कारण है। पिछले वर्षों में यह धारणा बनाई गई कि समाज का बड़ा हिस्सा एक ही राजनीतिक-सांस्कृतिक नैरेटिव को स्वीकार कर चुका है। लेकिन जंतर-मंतर ने दिखाया कि एक वैकल्पिक चेतना भी मौजूद है।

हम अक्सर युवाओं को केवल भीड़ के रूप में देखते हैं, लेकिन उनके भीतर कल्पनाशीलता, सवाल करने की क्षमता और असहमति का साहस भी होता है। आंदोलन में बड़ी संख्या उन युवाओं की थी जो आर्थिक और सामाजिक रूप से साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। उनके पास अब अभिव्यक्ति के साधन हैं, मोबाइल फोन हैं, सोशल मीडिया है, और वे अपनी बात स्वयं कह सकते हैं।

इसलिए यह केवल एक प्रदर्शन नहीं था; यह उस दावे को चुनौती थी कि समाज की पूरी युवा पीढ़ी एक ही दिशा में सोच रही है।

प्रश्न: आपने ‘नैरेटिव’ की बात की। क्या आपको लगता है कि इस आंदोलन ने सत्ता के बनाए हुए नैरेटिव को नुकसान पहुँचाया?

अपूर्वानंद: बिल्कुल। पिछले वर्षों में ‘नैरेटिव’ शब्द बहुत लोकप्रिय हुआ है। लेकिन मेरा मानना है कि किसी नैरेटिव का जवाब दूसरा नैरेटिव नहीं, बल्कि सच होता है। जंतर-मंतर पर आए युवाओं ने अपने अनुभवों और अपने गुस्से के माध्यम से उस आधिकारिक नैरेटिव को चुनौती दी। यही कारण है कि उनकी प्रतिक्रिया ने लोगों का ध्यान खींचा।

प्रश्न: कुछ लोग इसे एक तरह की ‘अवज्ञा’ मान रहे हैं। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

अपूर्वानंद: हाँ। भारतीय समाज में सत्ता और प्रतिष्ठा के प्रति आज्ञाकारिता की एक लंबी परंपरा रही है। जब युवा किसी ऐसे व्यक्ति या संस्था को चुनौती देते हैं जिसे लंबे समय से सम्मान और अधिकार का प्रतीक माना गया हो, तो वह बहुतों को असहज करता है। यहाँ केवल राजनीतिक असहमति नहीं थी, बल्कि एक प्रतीकात्मक अवज्ञा भी थी।
प्रश्न: आगे संघ और सत्ता प्रतिष्ठान की प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है?

अपूर्वानंद: शुरुआती प्रतिक्रियाएँ तो काफी कठोर रही हैं। कई लोगों ने दमन, कार्रवाई और सख्ती की भाषा का इस्तेमाल किया। लेकिन मुझे लगता है कि अब स्थिति बदल रही है। भय का जो वातावरण लंबे समय से बना हुआ था, उसमें दरारें दिखाई देने लगी हैं।

यदि समाज के भीतर असहमति बढ़ती है तो उसका उत्तर लोकतांत्रिक संवाद होना चाहिए, न कि दमन। संस्थाओं, राजनीतिक दलों और वैचारिक संगठनों को यह समझना होगा कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। युवाओं की बेचैनी को केवल अनुशासनहीनता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

प्रश्न: अंत में, आप इस पूरे घटनाक्रम को किस रूप में देखते हैं?

अपूर्वानंद: मेरे लिए यह केवल एक आंदोलन नहीं है। यह संकेत है कि समाज के भीतर अभी भी प्रश्न पूछने की क्षमता बची हुई है। युवाओं ने दिखाया है कि वे केवल दर्शक नहीं हैं। वे राजनीति, शिक्षा, रोजगार और लोकतंत्र के सवालों पर अपनी राय रखते हैं। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है। सत्ता और समाज दोनों के लिए ज़रूरी है कि इस आवाज़ को सुना जाए, न कि उससे डरकर प्रतिक्रिया दी जाए।