24 सितंबर 2025 को लद्दाख में आंदोलन कर रहे लोगों पर गोलीबारी और हिंसा हुई, जिसके कारण 4 लोगों की तुरंत मौत हो गई और कुछ ही दिनों के बाद एक युवक ने इस घटना के कारण आत्महत्या कर ली। कई लोगों पर गंभीर आरोप लगाकर जेलों में डाल दिया गया और पूरे इलाके में दहशत का माहौल बना दिया गया। पर्यावरणविद सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के आरोप में 5 महीनों के लिए लेह से हज़ार किलोमीटर दूर जोधपुर की जेल में डाल दिया गया था।

इस घटना को एक साल हो गया। इस एक साल में लद्दाख ने कुछ पाया तो नहीं, लेकिन सरकार की तरफ से झूठे वादे और समय काटने के लिए दिल्ली में बैठके ही चल रही हैं जिसका कोई नतीजा नहीं निकल रहा है। एक वर्ष पूरे हो जाने के बावजूद आज तक सरकार यह नहीं बता पाई कि सीधे गोली मारने का आदेश किसने दिया था? पुलिस ने गोली क्यों चलाई? और गोली सीधे सीने और सर पर क्यों मारी गई? लद्दाख के सांसद मोहम्मद हनीफा जान ने बताया है कि पिछले साल करगिल युद्ध में घायल एक सैनिक की भी इस गोलीबारी में मौत हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि यह निशाना लगाकर की गई गोलीबारी थी, जिसमें गोलियां सीधे सिर और सीने पर मारी गईं, न कि चेतावनी के तौर पर या जमीन पर।

घटना के बाद लद्दाख के लोग प्रशासनिक जांच को खारिज करते हुए स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग पर अड़े रहे। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जाँच की घोषणा की, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी उस जाँच रिपोर्ट का कोई पता नहीं है। सोनम वांगचुक ने जेल से बयान में कहा था कि जब तक स्वतंत्र न्यायिक जाँच नहीं होती, वह जेल में रहने को तैयार हैं। उन्होंने राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने के लिए गांधीवादी अहिंसक तरीक़े से संघर्ष जारी रखने की अपील की। मार्च 2026 में सरकार ने उनका हिरासत आदेश रद्द कर दिया और उन्हें जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के इस्तेमाल के लिए दिशा-निर्देश तय करे।
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लद्दाख संघर्ष की वजहें क्या?

लद्दाख का संघर्ष केवल गोलीबारी और हिरासत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बेरोजगारी, पर्यावरण और जनसांख्यिकी की गहरी समस्याएँ हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में और विकराल होती गई हैं। लेह शहर में 2003 से 2017 के बीच 9400 नए भवन बने, जबकि इससे पहले 1969 से 2003 तक 34 वर्षों में लगभग इतने ही भवन बने थे। शहरी क्षेत्र 1969 में 36 हेक्टेयर से बढ़कर 2017 में 196 हेक्टेयर हो गया। कृषि भूमि का नुकसान 1969 में 1 प्रतिशत से बढ़कर 2017 में 8 प्रतिशत हो गया। इस तेज शहरीकरण का दबाव जल संसाधनों, पारिस्थितिकी और स्थानीय संस्कृति पर सीधा पड़ रहा है।

पर्यटन उद्योग के विस्तार ने आर्थिक अवसर तो बढ़ाए हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर सीमित हैं। बाहरी निवेश और बाहरी श्रमिकों की बढ़ती संख्या ने स्थानीय अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रभावित किया है। लद्दाख की संवेदनशील पारिस्थितिकी और सीमित संसाधनों के कारण बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों का बसना स्थानीय समुदायों के लिए चिंता का विषय बन गया है। छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा की मांग का सीधा संबंध भूमि, संस्कृति और जनसांख्यिकीय संतुलन की रक्षा से है, ताकि लद्दाख की विशिष्ट पहचान और पर्यावरण बने रहें।

पांच नए जिलों के गठन की घोषणा क्यों?

इसी बीच सरकार ने लोगों को लुभाने के लिए लद्दाख में पांच नए जिलों के गठन की घोषणा की। लद्दाख के लोगों का मानना है कि यह फैसला स्थानीय लोगों की सहमति के बिना लिया गया है। इससे आशंका जताई जा रही है कि नए जिलों के गठन से लद्दाख के लोगों में आपसी मतभेद और टकराव बढ़ेगा, जिससे समुदायों के भीतर एकता कमजोर होगी। स्थानीय संगठनों का कहना है कि इस तरह के फैसले लद्दाख के लोगों को आपस में लड़ाने और उनके संघर्ष को कमजोर करने की कोशिश है।

लद्दाख की जनसंख्या बहुत कम है और यहां सामाजिक ताना-बाना अत्यंत संवेदनशील है। ऐसे में प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन बिना व्यापक सहमति के करना खतरनाक साबित हो सकता है। इससे स्थानीय लोगों के बीच आपसी संदेह और मतभेद पैदा हो सकते हैं, जो लंबे समय तक लद्दाख की सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाएंगे।

जम्मू व कश्मीर से सम्बंधित अनुच्छेद 370 को हल्का करने से और उसे दो हिस्सों में विभाजित करने से जिसमें एक हिस्सा लद्दाख था, यहाँ की भूमि, संपत्ति और संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का नियंत्रण ख़त्म हो गया। वर्तमान व्यवस्था में बाहरी लोगों को भूमि खरीदने और संपत्ति हासिल करने में आसानी होती है, जिससे स्थानीय लोगों को नुक़सान उठाना पड़ता है। लद्दाख के लोग चाहते हैं कि भूमि हस्तांतरण पर सख्त नियंत्रण लगे और स्थानीय हितों की रक्षा हो। यह मांग छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की मांग से सीधे जुड़ी हुई है। लद्दाख के लोगों का कहना है कि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक बाहरी लोगों का बसना और भूमि अधिग्रहण रुकेगा नहीं, जिससे स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण और जनसांख्यिकीय संतुलन पर खतरा बना रहेगा। सरकार की ओर से इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे लद्दाख के लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।

सरकार लद्दाख को राज्य का दर्जा इसलिए नहीं दे रही है क्योंकि उसका कहना है कि लद्दाख अपने संचालन के लिए राजस्व खड़ा नहीं कर पाता है। सरकार का तर्क है कि लद्दाख की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वह राज्य के रूप में अपना खर्च खुद उठा सके। लेकिन इस तर्क पर सवाल उठते हैं। लद्दाख की भौगोलिक परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हैं। यह एक सीमावर्ती क्षेत्र है, जहां सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाना ही बड़ी चुनौती है। ऐसे में केवल राजस्व के आधार पर राज्य का दर्जा देने से इनकार करना लद्दाख के लोगों की जरूरतों और उनकी भौगोलिक विशिष्टताओं को नजरअंदाज करना है।
लद्दाख की जनसंख्या बहुत कम है और यहां उद्योग-धंधे सीमित हैं। पर्यटन ही आय का एक बड़ा साधन है, लेकिन पर्यटन सीमित महीनों तक ही चलता है। ऐसे में राज्य के रूप में अपना पूरा खर्च उठाना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह भी सच है कि कई छोटे राज्यों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर है और वे केंद्र से सहायता लेकर चल रहे हैं। राज्य का दर्जा मिलने का मतलब यह नहीं कि केंद्र की सहायता बंद हो जाएगी। राज्य को भी केंद्र से वित्तीय सहायता मिलती रहती है। इसलिए केवल राजस्व के आधार पर लद्दाख को राज्य का दर्जा देने से इनकार करना तर्कसंगत नहीं लगता। लद्दाख के लोगों का मानना है कि सरकार यह बहाना बनाकर उनकी मांग को टाल रही है, जबकि असली वजह सियासी और रणनीतिक हो सकती है।

लद्दाख को राज्य का दर्जा मिलने से प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार होगा। फिलहाल लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश है, जहां उपराज्यपाल का शासन है। लोगों का कहना है कि उनके पास अपने मुद्दों को उठाने के लिए कोई सशक्त मंच नहीं है। राज्य का दर्जा मिलने से एक निर्वाचित सरकार बनेगी, जो स्थानीय लोगों की ज़रूरतों और समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकेगी और उनका समाधान कर सकेगी। 

राज्य का दर्जा मिलने से लद्दाख की विधानसभा को अपने क्षेत्र के विकास के लिए अधिक अधिकार मिलेंगे। भूमि, संस्कृति, पर्यावरण और जनसांख्यिकी से जुड़े फ़ैसले स्थानीय स्तर पर लिए जा सकेंगे। इससे लद्दाख की विशिष्ट पहचान और संसाधनों की रक्षा हो सकेगी।

इस बार लेह और करगिल में पिछले साल की हिंसक घटना को लेकर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए। करगिल में 23 सितंबर को करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) की ओर से एक शांतिपूर्ण मार्च और जनसभा का आयोजन किया गया। यह मार्च करगिल बस स्टैंड से शुरू होकर हुसैनी पार्क में समाप्त हुआ, जहां कई वक्ताओं ने जनता को संबोधित किया जिसमें धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। लद्दाख के सांसद हनीफा जान, केडीए के सह-अध्यक्ष असगर करबलाई शामिल थे। संचालन केडीए के दूसरे सह-अध्यक्ष सज्जाद करगिली ने किया। इस जनसभा की मुख्य मांगों में प्रशासनिक, वित्तीय और विधायी शक्तियों वाली केंद्र शासित प्रदेश की विधायिका का गठन, संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत दिए गए आश्वासन को पूरा करना और जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक केंद्र सरकार या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन द्वारा कुछ भी ऐसा न करना जो अपरिवर्तनीय हो, शामिल हैं। सज्जाद करगिली ने बताया कि केंद्र सरकार के साथ बातचीत की प्रक्रिया चल रही है और अक्टूबर के पहले सप्ताह में करगिल में अगले दौर की वार्ता होनी है, इसलिए लंबी पदयात्रा की बजाय 23 सितंबर को जनसभा करने का फ़ैसला किया गया है।
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20 किलोमीटर की प्रतीकात्मक पदयात्रा

वहीं लेह में 23 सितंबर को पर्यावरणविद और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के नेता सोनम वांगचुक की ओर से 20 किलोमीटर की प्रतीकात्मक पदयात्रा का आयोजन किया गया। वांगचुक ने सोशल मीडिया पर बताया कि ठंडे मौसम और रात के कम तापमान के कारण 19 से 23 सितंबर तक प्रस्तावित लंबी पदयात्रा को घटाकर 23 सितंबर को 20 किलोमीटर की प्रतीकात्मक पदयात्रा कर दिया गया है। यह पदयात्रा उस स्तूप से शुरू हुई जिसे खरू गांव के लोग शहीदों की याद में बना रहे हैं। वांगचुक ने कहा कि यह पदयात्रा उन लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए है जो लद्दाख के पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा तथा लोकतंत्र की बहाली के लिए मारे गए, घायल हुए या जेल में डाले गए। उन्होंने सरकार से न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी दोहराई, ताकि पिछले साल की गोलीबारी के कारणों और जिम्मेदार लोगों का पता चल सके। लेह में 24 सितंबर को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया गया, जिसमें पिछले साल 24 सितंबर को लेह गोलीबारी में मारे गए नागरिकों को श्रद्धांजलि दी गयी। साथ ही मरने वालों के परिवारों के लिए सरकार द्वारा घोषित 15 लाख रूपए के मुआवजे को अपर्याप्त मानते हुए अस्वीकार किया गया और कम से कम 1 करोड़ रूपए प्रति मृतक परिवार के लिए मांग की गयी।

2025 में 24 सितंबर को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किये जाने की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलीबारी में 4 नागरिकों की मौत हुई थी और 44 लोग घायल हुए थे। गौरतलब है कि 24 सितंबर को एनडीएस स्टेडियम में हुई जनसभा में भाग लेने से रोकने के लिए छात्रों को कहा गया कि यदि उन्होंने इस कार्यक्रम में भाग लिया और उनकी तस्वीर कैमरे में आ गयी तो उन्हें कोई नौकरी नहीं मिलेगी। कार्यक्रम में भाग लेने से रोकने के लिए महाविद्यालयों के मुख्य दरवाज़े बाहर से बंद कर दिए गए थे।

ये कार्यक्रम लद्दाख के नेताओं की 9 सितंबर को नई दिल्ली में गृह मंत्रालय के अधिकारियों के साथ हुई बैठक के बाद हुए हैं। इस बैठक में संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख के लिए केंद्र शासित प्रदेश स्तरीय विधायिका बनाने पर चर्चा हुई थी। केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख को संवैधानिक संरक्षण देने पर सहमति जताई है और ‘अद्वितीय मॉडल’ के आधार पर विधायिका बनाने की बात कही है, जो भारत में पहला ऐसा प्रयोग होगा। 
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लद्दाख 2019 से केंद्र शासित प्रदेश बना हुआ है और तब से लेह एपेक्स बॉडी तथा करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किया जाने की मांग को लेकर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। एक साल बाद भी लद्दाख के लोगों के सवाल वही हैं- गोली किसने चलवाई, क्यों चलवाई, सीधे सिर पर क्यों मारी गई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, लद्दाख का दर्द कम नहीं होगा और न्याय की उम्मीद बरकरार रहेगी।

सोनम वांगचुक क्या बोले?

इस दिन सोनम वांगचुक ने अपने भाषण में सीधे सीधे 24 सितम्बर की गोलीबारी के लिए गृह मंत्री अमित शाह को मूल रूप से दोषी ठहराया क्योंकि उन्होंने बताया कि इन्हीं अमित शाह ने लद्दाख को पहले संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा किया था और फिर उस वादे से मुकर गए। सोनम वांगचुक ने यहाँ तक कहा कि अमित शाह ने चुनौती दी थी कि यदि प्रधानमंत्री भी लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने का निर्णय ले लें तो भी वे उसे नहीं होने देंगे। सोनम वांगचुक ने 24 सितम्बर की गोलीबारी की जिम्मेदारी तय करते हुए अमित शाह के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि जब जंतर मंतर पर छर्रे के बौछार वाली बन्दूक चलने के लिए राहुल गाँधी अमित शाह के इस्तीफे की मांग कर सकते हैं तो लद्दाख में तो सीधे सीने और सर पर गोली चली है। यहाँ तो अमित शाह के इस्तीफे की मांग जायज है।