पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की भारी पराजय के बाद पार्टी के विधायक और सांसद जिस तरह अभिषेक बनर्जी की काली करतूतों का बहाना बनाकर ममता बनर्जी से अपना नाता तोड़ रहे हैं, उसने कई लोगों को चौंका दिया है। परंतु ममता बनर्जी पिछले 28-29 सालोंसे जिस तरह की सिद्धांतविहीन और पलटीमार राजनीति कर रही हैं, उसपर नज़र डालें तो इन जन प्रतिनिधियों का बर्ताव कोई अनोखा नहीं है। वे तो वही कर रहे हैं जो ममता दीदी ने उन्हें सिखाया है। 
अच्छा शिष्य वही होता है जो अपने गुरु के पदचिह्नों पर चले। ये सांसद-विधायक भी वही कर रहे हैं जो ममता पिछले तीस सालों से करती आई हैं। सिद्धांतविहीन-आदर्शविहीन राजनीति करना, किसी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना और काम बनने के बाद उसे छोड़ देना, बार-बार पलटी मारना और विपक्षी जनप्रतिनिधियों को तोड़ना। 
आइए, आगे बढ़ने से पहले ज़रा ममता बनर्जी के राजनीतिक इतिहास के पन्ने पलटते हैं और बाग़ी सांसदों-विधायकों की आज की करतूतों से उनके व्यवहार की तुलना करते हैं।
ताज़ा ख़बरें
बाग़ी विधायकों-सांसदों पर मुख्य आरोप यह है कि वे तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतने के बाद आज विपक्षी बीजेपी से हाथ मिला रहे हैं। वही बीजेपी जिसको सांप्रदायिक पार्टी बताकर वे जनता के बीच गए थे और चुनाव में जीते थे। 
लेकिन ममता ने भी 1998 में यही किया था। जब 1 जनवरी 1998 को उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी तो क्या वह वही काम नहीं कर रही थीं जो आज तृणमूल के बाग़ी सांसद और विधायक कर रहे हैं?
तब ममता की कांग्रेस से क्या शिकायत थी? यही कि कांग्रेस वाम मोर्चे को हराने के लिए राज्य में बीजेपी से हाथ क्यों नहीं मिला रही? तब ममता बीजेपी को सांप्रदायिक नहीं मानती थी  - उनकाख़ुद का तब का बयान है कि बीजेपी सांप्रदायिक पार्टी नहीं है। ऐसे में आज अगर ये सांसद या विधायक कह रहे हैं कि बीजेपी सांप्रदायिक पार्टी नहीं है तो वे क्या ग़लत कर रहे हैं - वे तो अपनी प्रिय नेत्री की राह पर ही चल रहे हैं।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पलटूराम कहा जाता है क्योंकि वे चार बार (2013, 2017, 2022 और 2024 में) पलटी मार चुके हैं। लेकिन ममता तो उनसे भी एक क़दम आगे है। वे अब तक पाँच बार पलटी मार चुकी हैं। इस लिहाज़ से उनको भी पलटू दीदी या पलटू रानी कहा जा सकता है।
आइए, उनके पलटीमार अतीत पर एक नज़र डालते हैं।

पलटी 1 : 1998 में बीजेपी का साथ दिया आपको याद होगा कि नवंबर 1997 में संयुक्त मोर्चा सरकार गिर गई थी और 1998 में नए लोकसभा चुनाव हुए थे। तब तक ममता कांग्रेस को छोड़कर नई पार्टी बना चुकी थीं। उन चुनावों में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी के साथ सीटों का तालमेल किया और 7 सीटें जीतीं। लेकिन सरकार में शामिल नहीं हुईं क्योंकि उनको अपना सारा ध्यान राज्य में नवगठित पार्टी को मज़बूत करने में लगाना था।

वह सरकार 13 महीनों के बाद गिर गई। 1999 के चुनावों के बाद नई सरकार बनी, उसमें ममता रेल मंत्री बनकर शामिल हुईं।

पलटी 2 : 2001 में कांग्रेस का हाथ थामा 

2001में जब बंगाल विधानसभा के चुनाव होने वाले थे तो ममता को लगा कि राज्य में कांग्रेस से तालमेल करना अधिक लाभदायक होगा। इसलिए मार्च 2001 में रक्षा भ्रष्टाचार कांड (तहलका स्टिंग ऑपरेशन) के बहाने केंद्र सरकार से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस से गठजोड़ कर लिया। लेकिन इसके बाद भी वह बंगाल में वाम मोर्चे को नहीं हरा पाईं। वाम मोर्चे को 199 सीटें मिलीं और तृणमल कांग्रेस 31% वोट के साथ केवल 60 सीटों पर जीत हासिल कर पाई।

पलटी 3 : 2003 में बीजेपी की गोद में 

अब राज्य में अगला चुनाव पाँच साल बाद था और केंद्र में बीजेपी की सरकार थी। सो 2003 में ममता बनर्जी फिर से वाजपेयी सरकार में शामिल हो गईं। 
ध्यान दीजिए, वाजपेयी सरकार में वह सितंबर 2003 में मंत्री बनीं जबकि डेढ़ साल पहले यानी फ़रवरी 2002 में गुजरात दंगे हो चुके थे। नोट करने की बात है कि दंगों के लिए हालाँकि उन्होंने मोदी सरकार का इस्तीफ़ा माँगा था लेकिन जब इन दंगों के ख़िलाफ़ अप्रैल 2002 में लोकसभा में वाजपेयी सरकार के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव लाया गया तो ममता की पार्टी ने वाजपेयी का साथ दिया। इस समर्थन के बदले उनको कुछ ही महीनों बाद फिर से मंत्री बना दिया गया।
ममता ने 2004 के लोकसभा चुनाव और 2006 के विधानसभा चुनाव भी बीजेपी के साथ मिलकर लड़े। लेकिन इन दोनों ही चुनावों में जब उनकी पार्टी को बुरी तरह हार मिली - 2004 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल को केवल एक सीट मिली और 2006 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के वोट ही नहीं घटे (26%) बल्कि सीटें पहले से आधी रह गईं - तब ममता को लगा कि बीजेपी के साथ रहने में कोई लाभ नहीं है।

पलटी 4 : 2007 में कांग्रेस को गले लगाया

2007 में ममता फिर से कांग्रेस की शरण में गईं क्योंकि बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई थी और कांग्रेस सरकार में आ गई थी। 2009 का लोकसभा चुनाव भी दोनों ने मिलकर लड़ा। इसका उन्हें लाभ भी मिला और तृणमूल कांग्रेस ने 19 सीटें जीतीं। इस जीत से उत्साहित होकर 2011 का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई।

पलटी 5 : 2012 में कांग्रेस को लतियाया

बंगाल में अपनी सरकार बनाने के एक साल बाद ही ममता ने कांग्रेस से संबंध तोड़ लिया क्योंकि अब उनको कांग्रेसी सीढ़ी की ज़रूरत नहीं थी। परंतु वह यहीं तक नहीं रुकीं। उन्होंने ठान लिया कि इस सीढ़ी को अब आग लगा देनी है। इसलिए एक-एक करके विपक्ष के विधायकों को तोड़ना शुरू किया और अगले पाँच सालों में कांग्रेस के 42 में से 12 विधायक तोड़े। वाम मोर्चे के भी 4 विधायकों को पार्टी में शामिल कर लिया हालाँकि उनको इसकी ज़रूरत नहीं थी। इन विधायकों के बिना भी 184 विधायकों के साथ पार्टी को अच्छा-ख़ासा बहुमत था।

2016-2026 : विपक्षके 29 विधायक तोड़े- ममता ने विपक्षी विधायकों को तोड़ने का सिलसिला 2016 के चुनाव के बाद भी जारी रखा हालाँकि तृणमूल ने पहली बार केवल अपने दम पर चुनाव लड़ा था और 211 सीटें जीती थीं। उसे विपक्षी विधायकों को तोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी। फिर भी अगले पाँच सालों में कांग्रेस के 18 और वाम मोर्चे के 4 विधायकों को तृणमूल में शामिल किया। यह सिलसिला 2021 के चुनावों के बाद भी चला जब बीजेपी के टिकट पर चुने गए 7 विधायक तृणमूल कांग्रेस में गए।  

आप पता करेंगे तो मालूम होगा इनमें से तीन या चार विधायकों ने ही अपनी सीट से इस्तीफ़ा दिया और तृणमूल के टिकट पर उपचुनाव लड़ा। बाक़ी सब बिना अपनी सीट छोड़े तृणमूल कांग्रेस का साथ देते रहे। स्पीकर उनकी अयोग्यता की अर्जी पर बैठे रहे और वे अपनी विधायकी पूरी करते रहे। कुछ मंत्री भी बने, बाक़ी सत्ता का लाभ लेते रहे।
तो जो काम उस दौर में विपक्ष के दलबदलू विधायकों ने मंत्रिपद, पैसे और सत्ता के लिए किया और ममता बनर्जी को उसमें कुछ भी अनैतिक नहीं लगा, वही काम आज उनके ‘अपने’ तृणमूलविधायक और सांसद कर रहे हैं तो ममता को शिकायत क्यों होनी चाहिए?
इनमें से अधिकतर विधायक बिना अपनी सीट से इस्तीफ़ा दिए तृणमूल के साथ जुड़े रहे और अपनी विधायकी पूरी की। आज बाग़ी तृणमूल विधायक और सांसद भी बिना इस्तीफ़ा दिए बीजेपी के साथ जु़ड़कर अपनी विधायकी और सांसदी पूरी करने का उद्यम कर रहे हैं।
ऐसा करके वे ममता दी के दिखाए हुए पथ पर ही चल रहे हैं, उन्हीं के सिखाए इन तीन गुरुमंत्रों का जाप कर रहे हैं - 
  1. सिद्धांत-विद्धांत बकवास है
  2. अपना हित ही ख़ास है
  3. हम सत्ता के दास हैं।