प्रधानमंत्री मोदी को देर से जन्म दिन की ढेरों शुभकामनाएँ। लंबी उम्र हो। वैसे मैं जन्म दिन मनाने के पक्ष में नहीं रहता लेकिन परिवार और दोस्तों के दबाव में जन्म दिन मन जाता है। दोस्त आते हैं और लोगों का मिलना हो जाता है । ऐसे मौकों पर दोस्त टाँग खिंचाई ज्यादा करते हैं । तारीफ तो शायद ही कोई करे। जो मुझे जानते हैं या जिन लोगों ने मेरे साथ काम किया है वो इस बात की तस्दीक करेंगे कि चमचागीरी पसंद नहीं है और जो चमचागीरी करते हैं, मेरी नज़र में ऐसे लोग बेहद लिजलिजे क़िस्म के होते हैं, और ख़तरनाक भी।
बड़े बड़े नेताओं का प्रधानमंत्री के लिये हवन करना, आरती उतारना और दीये जलाना दुखद था। ये सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये ही ऐसा कर रहे थे। ये जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी बीजेपी के इतिहास में सबसे कामयाब नेता हैं । वो पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं। तीन बार के मुख्यमंत्री और तीन बार के प्रधानमंत्री। उनकी नज़र टेढ़ी हो जाये तो राजनीतिक कैरियर ख़त्म। नज़र में दया भाव आ जाये तो बल्ले बल्ले। क्या कुछ नहीं वो कर सकते या कुछ नहीं बना सकते।
दोस्त मेरे घर आते हैं मेरा जन्मदिन मनाने, तो मेरी टाँग भी खींचते हैं और तंज भी कसते हैं। जो वाकई में दोस्त हैं वो अच्छी सलाहें भी देते हैं। मेरी ग़लतियों पर कभी कभी सुना भी देते हैं या यू कहें कि सही रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं। लेकिन राजनीति का मेरा अनुभव कहता है कि वहां दोस्ती नहीं है। वहां प्रतिस्पर्धा है। गला काट प्रतिस्पर्धा। एक दूसरे को गिराने का खेल चलता रहता है। राजनीति व्यक्ति की सबसे ख़राब और घृणित प्रवृत्ति को उभारती है, मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देती है । बिरले ही होते हैं जो अच्छे इंसान बने रहते हैं और ऐसे लोग राजनीति में ज्यादा सफल नहीं होते।
मोदी जी को क्या ऐसे लोग पसंद हैं जो उनकी तुलना भगवान से करते हैं ? या उनको विष्णु का अवतार बताते हैं ? मैं ये दावे से कह सकता हूँ कि ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। लेकिन ये उनकी राजनीति का सफल फ़ार्मूला है । चमचागीरी करने वाले हमेशा उनके तेज और खौफ में दबे रहें ये ज़रूरी है ताकि ये लोग उनके ख़िलाफ़ बगावत न कर सकें। उनके विरुद्ध विरोध का झंडा न बुलंद कर सकें। और इस टेक्निक का इस्तेमाल हर सफल राजनेता करता है। और शायद ये उनकी कामयाबी का एक बेहतर नुस्ख़ा भी है। और यहीं से निकलता है व्यक्ति पूजा का रास्ता।
परिपक्व लोकतन्त्र में व्यक्ति पूजा के लिये कोई जगह नहीं होती। भारतीय लोकतंत्र में “प्रधानमंत्री समान लोगों में प्रथम है”। उनका दर्जा भी कैबिनेट मिनिस्टर का ही होता है । भारतीय लोकतंत्र के निर्माताओं ने ये व्यवस्था की थी कि प्रधानमंत्री किसी पार्टी का नेता नहीं होगा और न ही चुनाव पार्टी आधारित होंगे। भारतीय संविधान में पार्टी शब्द तक नहीं है । पहली बार पार्टी शब्द का ज़िक्र तब आया जब ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति को रोकने के लिये दल बदल विरोधी कानून आया। अन्यथा संविधान साफ़ तौर पर कहता है कि चुनाव के बाद लोकसभा सदन का नेता चुनेगी और जो नेता चुना जायेगा वो प्रधानमंत्री होगा। और फिर वो अपनी कैबिनेट का चयन करेगा।
संविधान निर्माताओं ने तब नहीं सोचा था कि एक दिन भारतीय लोकतंत्र पार्टी या पार्टियों का पर्याय हो जायेगा। नेहरू के जमाने से पार्टी का ऐसा प्रभुत्व जमा कि बिना पार्टी के भारतीय लोकतंत्र की कल्पना करना भी असंभव हो गया। नेहरू लोकतांत्रिक थे इसलिये उनकी पार्टी में विचार भिन्नता के लिये जगह थी और पार्टी के अंदर विचारों में संघर्ष होता था। खुद नेहरू कभी कभी इससे परेशान होकर इस्तीफ़े की पेशकश कर देते थे । लेकिन इंदिरा गांधी के समय पूरी पार्टी ‘सम्राट तंत्र’ में बदल गई। पार्टी में इंदिरा ही थी, ऊपर से नीचे तक।
देबकांत बरुआ ने तो कह दिया था - ‘इंदिरा ही भारत हैं और भारत ही इंदिरा’। चमचों की इस जमात ने कांग्रेस की इमारत को कमजोर किया। और दरबारी नेताओं को लगने लगा था कि चमचागीरी कर के ही बड़े बड़े पद पाये जा सकते हैं । ये प्रवृत्ति इंदिरा के लिये तो सुखद थी लेकिन पार्टी के लिये ज़हर। संजय गांधी की चप्पल जब कैबिनेट मंत्री ढोने लगे तो कांग्रेस का पतन निश्चित हो गया। कांग्रेस आज जहां पहुँची है उसके लिये इंदिरा गाँधी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं। दरबारियों ने ऐसे हालात बना दिये कि पार्टी के मज़बूत और जनाधार वाले नेताओं को कांग्रेस छोड़नी पड़ी । ममता बनर्जी इसकी सबसे बड़ी उदाहरण हैं । आज वही लक्षण बीजेपी में भी मुझे दिखाई पड़ रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियाँ तारीफ के काबिल हैं । पार्टी नेताओं को उनकी तारीफ करनी चाहिये लेकिन तारीफ करने और चमचागीरी करने में फर्क है । बीजेपी में आज की तारीख में इंदिराकालीन कांग्रेस की तरह ऐसे तमाम नेताओं को, जिनका मज़बूत जनाधार था या है, उनको किनारे लगा दिया गया है या लगाया जा रहा है । अटल आडवाणी के समय में दूसरी पंक्ति के नेताओं की एक शानदार जमात थी । केंद्र में भी और राज्य में भी।
आज योगी आदित्यनाथ जैसे एक दो नेताओं को छोड़ दें तो बाकी अपना चुनाव नहीं जीत सकते। एक एक कर हर बड़े नेता को निपटा दिया गया है जैसे इंदिरा गांधी ने किया था। बीजेपी के शीर्ष पर वो नेता हैं जो दस साल या अधिक से उनकी कृपा से मंत्री बने हैं या पार्टी में ऊँचे ताकतवर पदों पर बने हुये हैं। सिवाय प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश को आंख मूंदकर मानने के उनकी कोई उपलब्धि या प्रतिभा नहीं है। ये बड़े बड़े बंगलों में रहते हैं। लेकिन ये सिर्फ दीवार पर टंगी तस्वीरें हैं जिनमें जीवन नहीं है। इनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, यही इनकी सफलता का राज है।
बीजेपी में आज की तारीख में बड़ी संख्या में वो लोग ऊँचे पदों पर है, कैबिनेट मंत्री या मुख्यमंत्री बने हुये हैं जो बाहर से आये हैं । इनकी कोई विचारधारा नहीं है। ये विशुद्ध तौर पर दरबारी हैं। पदलोलुप। अवसरवादी। बीजेपी कमजोर होगी तो फिर पाला बदल लेंगे। बीजेपी में ऐसे लोगों को जगह मिली ये हैरानी की बात है क्योंकि बीजेपी कैडर बेस्ट पार्टी है, उसकी एक सुविचारित विचारधारा है। वो सामूहिक नेतृत्व पर चलती रही है। लेकिन मोदी के बाद बीजेपी में सामूहिक नेतृत्व खत्म हो गया। पार्टी पूरी तरह से मोदी में समाहित हो गई जैसे इंदिरा के समय हुआ था।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता जो पहले तेजस्वी होने का दंभ पालते थे अचानक अपने मूल स्वरूप में आ गये । मोदी की जय जयकार करने लगे और उनकी तुलना भगवान से करने लगे। ये सफलता का सबसे नायाब नुस्ख़ा है । जो रोग कांग्रेस को लगा था वो बीजेपी को लग गया है । ये वो रोग है जो पार्टी को घुन की तरह खाता रहता है और जब तक वो नेता शीर्ष पर रहता है तब तक सब कुछ सही लगता है और जैसे ही वो नेता हटता है, इमारत जर्जर हो जाती है और फिर उसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाती है । मोदी की चमचागीरी में होने वाला कृत्य मोदी की ताकत की निशानी है लेकिन ये अपने साथ बीजेपी के पतन की कहानी भी लिख रहा है।