पहली संभावना का दोषी एकमात्र कारण यही बन सकता है कि कांग्रेस ने कई सीटों पर कमज़ोर उम्मीदवार खड़े कर दिये। ऐसा या तो भारी बहुमत से जीत के अंधे मुग़ालते के आधार पर कर दिया गया या फिर कोई ‘अज्ञात’ कारण रहा हो ! कमज़ोर उम्मीदवारों में शिवराज के ख़िलाफ़ खड़े किए गए उम्मीदवार को भी गिनाया जा सकता है। टिकट-वितरण से मचे घमासान के बाद कुछ सीटों पर किया गया फेर- बदल तो व्यापक असंतोष की सिर्फ़ बानगी है। यही कारण है कि भाजपा के अलावा अपनी ही पार्टी के बाग़ियों से भी अब कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों को मुक़ाबला करना है। विपक्षी गठबंधन INDIA के सहयोगी दलों (सपा, आप और जेडी-यू ) के भी लगभग सौ उम्मीदवार मैदान में हैं। ये सब कांग्रेस के ही क़िले में सैंध लगाएँगे। भाजपा की मदद के लिए बसपा ने भी कई उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं।
इस बात की जानकारी सार्वजनिक है कि पिछली बार (2018 में ) चुनाव नतीजे प्राप्त होने के तत्काल बाद से भाजपा के कई नेता दिल्ली में सिंधिया के संपर्क में थे। कमलनाथ सरकार के ख़िलाफ़ चला ‘ऑपरेशन लोटस’ केवल एक रात में संपन्न नहीं हो गया था। एमपी में कांग्रेस की जीत अगर हिमाचल और कर्नाटक की तरह नहीं हुई और सीटों का अंतर 2018 की तरह (पाँच सीटों ) ही रहा तो सरकार फिर से भाजपा की बन जाएगी। मानकर चला जा सकता है कि भाजपा ने दूसरी संभावना पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की घोषणा के पहले से काम शुरू कर दिया होगा। उसके लिए यह पता करना मुश्किल नहीं रहा होगा कि इस बार किसके लिये सिंधिया की मदद ली जा सकती है !