असम और पश्चिम बंगाल में जिस तरह से मुसलमानों ने मतदान किया है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। ये भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव है, एक बड़ा मोड़ है। इससे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राजनीति को बड़ी ऊर्जा मिलेगी।
ये कितनी महत्वपूर्ण घटना है इसे समझने के लिए हमें सांप्रदायिक राजनीति के दो ध्रुवों की प्रतिक्रियाओं को देखना होगा। असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे आने के बाद से बीजेपी और उसके समर्थक कांग्रेस को मुस्लिमपरस्त पार्टी बताने का अभियान चला रहे हैं। वे साबित करने पर आमादा हैं कि कांग्रेस अब केवल मुसलमानों की पार्टी रह गई है। गोदी मीडिया भी ज़ाहिर है कि इस नरैटिव को आगे बढ़ाने में जुट गया है।
लेकिन बीजेपी को तो ये करना ही था। वह ये नहीं करेगी तो और क्या करेगी। कांग्रेस को मुस्लिमपरस्त दिखाना हमेशा से उसके प्रोपेगंडा का अहम हिस्सा रहा है। उसके पुरखे तो आज़ादी के आंदोलन के दौरान भी यही कर रहे थे। वे तो महात्मा गाँधी पर भी मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाकर हिंदू तुष्टिकरण में लगे थे।
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लेकिन सबसे मज़ेदार ये है कि असदुद्दीन ओवैसी और बदरूद्दीन अजमल जैसे नेता भी कांग्रेस से परेशान हैं। वे भी कांग्रेस पर हमले कर रहे हैं और मुसलमानों से कह रहे हैं वे उनकी छतरी तले आ जाएं, कांग्रेस पर भरोसा न करें।
यानी सांप्रदायिक राजनीति के दोनों ध्रुव कांग्रेस पर निशाना साध रहे हैं। एक उसे मुस्लिमपरस्त पार्टी घोषित कर रहा है तो दूसरा मुसलमानों को कांग्रेस से डरा रहा है। और इसकी वज़ह ये है कि कांग्रेस ने असम और बंगाल में जो 21 सीटें जीतीं हैं उनमें से 19 पर मुस्लिम उम्मीदवार विजयी हुए।
इस आँकड़े को देखने के बाद पहली नज़र में किसी को भी लग सकता है कि क्या कांग्रेस सचमुच में मुसलमानों की पार्टी बनकर रह गई है। अगर बीजेपी का उस पर मुस्लिम लीग 2.0 होने का आरोप लगा रही है तो क्या वह सही नहीं है? लेकिन अगर आप इन आँकड़ों के पीछे झाँकेंगे तो एक दूसरी ही सचाई नज़र आएगी।
अव्वल तो आँकड़ों को समग्रता में देखना चाहिए। कांग्रेस ने इन दोनों राज्यों में कुल 390 सीटों पर चुनाव लड़ा और मात्र 21 सीटें जीतीं, जिनमें से 19 असम की हैं और दो बंगाल की।
अब राज्यवार आँकड़े देखते हैं। बंगाल में उसने 292 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे जिसमें से मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या 63 थी यानी 229 उम्मीदवार गैर मुसलमान थे। राज्य में 27-30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और उसके मद्देनज़र ये पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं थी। इसके बावजूद दो मुसलमान जीत गए जबकि एक भी हिंदू उम्मीदवार नहीं जीता।
ऐसा इसलिए हुआ कि राज्य में दो तरह का ध्रुवीकरण हुआ। एक तो बीजेपी और टीएमसी के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण और दूसरा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण। ऐसी सूरत में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार मुस्लिम बहुल इलाक़ों से ही जीत पाए।
ठीक ऐसा ही असम में हुआ। असम में कांग्रेस ने 99 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से केवल 20 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे यानी 79 उम्मीदवार ग़ैर मुस्लिम थे। असम में मुसलमानों की आबादी 34 फ़ीसदी के आसपास है यानी उन्हें उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम सीटें दी गईँ। फिर भी 20 में से 18 उम्मीदवार जीत गए।

बंगाल की तरह ही असम में भी कांग्रेस की सभी 19 सीटें ऐसे ही इलाक़ों से आई हैं। उसका एकमात्र हिंदू उम्मीदवार जयप्रकाश दास भी ऐसी सीट से विजयी हुआ है जहाँ मुसलमानों की आबादी अच्छी-खासी है।

ये ध्यान रखने की बात है कि चुनाव आयोग ने परिसीमन के ज़रिए मुस्लिम बहुल सीटों पर बड़ा खेल कर दिया था। असम में पहले मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 थी जिस घटाकर 22 कर दिया गया। यानी बीजेपी ने 13 सीटें धोखाधड़ी से जीतीं। अगर पहले वाली स्थिति होती तो बीजेपी को इतनी सीटें न मिल पातीं।
बंगाल में कांग्रेस को दोनों सीटें मुर्शिदाबाद से मिली हैं। ये जगज़ाहिर तथ्य है कि मुर्शिदाबाद मुस्लिम बहुल इलाक़ा है।
ये आँकड़े साफ़ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमानों ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF जैसी पहचान-आधारित पार्टियों को नकारते हुए कांग्रेस जैसे सेकुलर और समावेशी मंच की ओर रुख किया है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए स्वस्थ और आशाजनक घटना है।
कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची से साफ़ है कि उसने केवल मुस्लिमों पर दांव नहीं खेला। उसने बहुसंख्यक हिंदू और अन्य समुदायों के उम्मीदवार भी उतारे, लेकिन ध्रुवीकरण के माहौल में हिंदू वोट बीजेपी की ओर मजबूती से शिफ्ट हो गए, जबकि मुस्लिम वोट कांग्रेस के पास केंद्रित हुए।
बदरुद्दीन अजमल ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने AIUDF को खत्म करने की कोशिश में “कुआं खोदा और खुद गिर गई”, लेकिन असल में यह मुस्लिम वोटरों का रणनीतिक फैसला था। उन्होंने अपनी क्षेत्रीय, पहचान-केंद्रित पार्टी को ठुकराकर एक राष्ट्रीय, समावेशी विकल्प चुना।
बीजेपी समर्थक मीडिया केरल का उदाहरण भी दे रहा है। वह कह रहा है कि यूडीएफ गठबंधन की घटक भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के 22 मुस्लिम उम्मीदवार जीते हैं। ये सही है, लेकिन मुस्लिम लीग़ की तो पहचान ही मुस्लिम पार्टी की है।
ग़ौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस के अपने 63 विधायकों में केवल 8 मुस्लिम हैं; बाकी हिंदू और ईसाई हैं। कुल मिलाकर मुस्लिम वोटरों ने IUML के साथ मिलकर कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन यह गठबंधन की मजबूरी थी, न कि कांग्रेस का मुस्लिमीकरण।
अब आइए ज़रा देखा जाए कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की स्थिति क्या है। पिछले लोकसभा चुनाव में उसके 99 सांसदों में सिर्फ 9 मुस्लिम हैं यानी करीब 10 प्रतिशत, जबकि मुसलमानों की आबादी 14.5 फ़ीसदी है। यानी आबादी से भी कम प्रतिनिधित्व।
फिर ज़रा विधायकों का जायज़ा भी ले लिया जाए। देश भर में कांग्रेस के कुल 664 विधायक हैं। इनमें से में लगभग 78 प्रतिशत हिंदू हैं। बाक़ी के 22 फ़ीसदी में ग़ैर हिंदू यानी जैन, सिख, ईसाई और मुसलमान हैं। कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस के नब्बे फ़ीसदी विधायक हिंदू हैं। यह साबित करता है कि कांग्रेस अभी भी “सभी की पार्टी” है, न कि किसी एक समुदाय की।
मुस्लिम समुदाय का यह शिफ्ट कई कारणों से महत्वपूर्ण है। पिछले दो दशकों में ओवैसी और अजमल की पार्टियां मुस्लिमों को सुरक्षा देने का दावा करती रहीं। उन्होंने पहचान की राजनीति पर जोर दिया- कभी ट्रिपल तलाक, कभी CAA-NRC, कभी स्थानीय मुद्दों को मुस्लिम को आकर्षित करने से उठाया।
हालाँकि ये कहना जल्दबाज़ी होगी कि मुस्लिम मतदाता अब संकीर्ण कम्युनल प्लेटफॉर्म से आगे निकल चुके हैं और वे विकास, रोजगार, शिक्षा और समावेशी शासन चाहते हैं, जो कांग्रेस जैसे बड़े सेकुलर दलों से बेहतर जुड़ता है। लेकिन उनकी यह “स्ट्रेटेजिक वोटिंग” उदाहरण है कि बीजेपी के हिंदू कंसोलिडेशन के खिलाफ मुस्लिम वोटर अब एक बड़े सेकुलर छत्र के नीचे आ रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र के लिए यह बेहद अच्छी खबर है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब वोटर पहचान से ऊपर उठकर मुद्दों पर फैसला करें। अगर मुस्लिम समुदाय ओवैसी-जैसे नेताओं को ठुकराकर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को अपना समर्थन दे रहा है, तो यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को कम करने की दिशा में कदम है।
इस शिफ्ट का एक और सकारात्मक पहलू ये भी है कि मुस्लिम युवा वोटरों का सोच बदल रहा है। आज का मुस्लिम युवा सोशल मीडिया, शिक्षा और आर्थिक आकांक्षाओं से प्रभावित है। वह जानता है कि AIMIM या AIUDF जैसी छोटी पार्टियां संसद या विधानसभाओं में मुट्ठी भर सीटें जीत सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय नीति-निर्माण में असर नहीं डाल सकतीं। कांग्रेस जैसे दल के साथ जुड़कर वे बड़े मुद्दों—आरक्षण, रोजगार, किसान कल्याण—पर अपनी आवाज मजबूत कर सकते हैं।
यह कोई “मुस्लिमीकरण” नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता है। जब कोई समुदाय संकीर्ण पहचान-आधारित पार्टियों से दूर हटकर बड़े समावेशी मंच की ओर जाता है, तो समाज का समग्र स्वास्थ्य सुधरता है।