भारत-अमेरिका बढ़ती नजदीकियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत अपने पारंपरिक और भरोसेमंद सहयोगी रूस को दूर कर रहा है? जानिए रणनीतिक संतुलन और संभावित जोखिमों की पड़ताल।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने व्यापार प्रतिबंधों की धमकी देकर युद्ध रुकवाया, लेकिन भारत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि युद्धविराम दोनों देशों के बीच सीधे समझौते का परिणाम था। इस टकराव में भारत को इसराइल और अफगानिस्तान (तालिबान) को छोड़कर किसी का खुला समर्थन नहीं मिला। सबसे हैरान करने वाली थी रूस की चुप्पी। वह रूस, जो अतीत में हर संकट में भारत के साथ खड़ा रहा, इस बार तटस्थ रहा। रूस ने पहलगाम हमले की निंदा तो की, लेकिन दोनों पक्षों से कूटनीति और संयम की सलाह दी।
ऑपरेशन सिंदूर में भले ही रूस ने खुलकर समर्थन नहीं किया, उसकी रक्षा तकनीक भारत की ताकत बनी रही। लेकिन रूस की चुप्पी का कारण क्या था? इसका जवाब हमें रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की बदलती विदेश नीति में मिलता है।
लेनिन दिवस के अवसर पर हम उन सभी को हार्दिक अभिनंदन भेजते हैं जो महान लेनिन के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी कर रहे हैं। हम रूस द्वारा किए जा रहे महान प्रयोग की सफलता की कामना करते हैं। सर्वहारा विजयी होगा। पूँजीवाद पराजित होगा। साम्राज्यवाद की मौत हो।
अमेरिका को भारत के रूस से तेल आयात पर भी आपत्ति है। एक प्रस्तावित अमेरिकी बिल रूस से व्यापार करने वालों पर 500% टैक्स की बात करता है, जिसे ट्रम्प का समर्थन प्राप्त है।