हम भारतीय उसे ग़ुलाम कश्मीर कहते हैं। पाकिस्तान उसे आजाद कश्मीर कहता है। लेकिन तकनीकी तौर पर वो पीओके यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर है। जब हम भारत में आजादी का अस्सीवाँ जयंती मना रहे हैं तब ग़ुलाम कश्मीर के लोग सड़क पर उतर कर आजादी के नारे लगा रहे हैं। श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार राशिद राहिल बताते हैं कि गुलाम कश्मीर की राजधानी मुज्जफराबाद, प्रमुख शहर रावला कोट, मीरपुर जैसे बड़े शहरों में लोग जून से ही सड़कों पर हैं। पाकिस्तान की सेना कई बार गोलियाँ चला चुकी है। ग़ैर सरकारी सूत्र 90 से 300 तक आंदोलनकारियों के मारे जाने की ख़बर दे रहे हैं। उसके बाद भी आम लोगों का हुजूम सड़कों से जाने के लिए तैयार नहीं दिखाई दे रहा है।

विरोध-प्रदर्शन भड़कने की वजह

राशिद राहिल का दावा है कि ग़ुलाम कश्मीर के लोग अब पाकिस्तान से आजादी और भारत में शामिल जम्मू कश्मीर से मिलना चाहते हैं। राशिद के मुताबिक यह आंदोलन 2023 में ही शुरू हो गया था। लेकिन जून 26 के बाद तेजी पकड़ने लगा। 2023 में लोग बिजली की कीमत बढ़ाये जाने के ख़िलाफ़ खड़े हुए थे। उसके साथ आटे की क़ीमत और महंगाई भी जुड़ गयी। 2023 तक कई स्थानीय संगठनों ने मिलकर अवामी एक्शन कमेटी का गठन किया और उसके बाद आंदोलन तेज होता गया। अवामी एक्शन कमेटी के नेता शौकत नवाज मीर और कई अन्य नेताओं को जून में ही गिरफ्तार कर लिया गया। इसके साथ साथ पाकिस्तानी सेना का अत्याचार भी बढ़ता गया।
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गुलाम कश्मीर पर नियंत्रण करने वाली पाकिस्तान सरकार ने असेंबली के चुनाव की घोषणा कर दी तब एक और बड़ी मांग जुड़ गयी। आंदोलनकारियों ने पीओके असेंबली के उन 12 सीटों को ख़त्म करने की मांग की जो पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरियों के लिए आरक्षित हैं।

आरक्षण के बहाने पाक नियंत्रण

पीओके या गुलाम कश्मीर असेंबली में कुल 53 सीटें हैं। इनमें से 6 जम्मू (भारत) से और 6 कश्मीर घाटी ( भारत) से पाकिस्तान जाकर बसने वाले कश्मीरियों के लिए आरक्षित हैं। सारा विवाद इन्हीं सीटों को लेकर है। पीओके चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक ग़ुलाम कश्मीर में रहने वाले कुल मतदाताओं की संख्या करीब 34 लाख है। कश्मीर घाटी से जाकर पाकिस्तान में बसने वाले मतदाताओं की संख्या सिर्फ़ 30 हजार और जम्मू से जाने वाले मतदाताओं की संख्या करीब 4 लाख बतायी गयी है।

अवामी एक्शन कमेटी का आरोप है कि पाकिस्तान इन सीटों के चुनाव में धांधली कराता है। ग़ुलाम कश्मीर के भीतर पाकिस्तान में बसे मतदाताओं का अनुपात सही नहीं हैं।

पीओके में सीटों की स्थिति

कश्मीर घाटी से पाकिस्तान जाने वाले मात्र 30 हजार शरणार्थी 6 सांसद और जम्मू से विस्थापित 4 लाख शरणार्थी भी 6 सांसद चुनते हैं। दूसरी तरफ़ पीओके में रहने वाले क़रीब 34 लाख मतदाता सिर्फ़ 33 सीटों पर सीधे चुनाव करते हैं। उनका आरोप है कि 12 सीटों पर धांधली कर के पाकिस्तान अपने पिट्ठुओं को जिता लेता है और अपनी मर्जी का प्रधानमंत्री पीओके पर थोप देता है। इसका एक और कारण है। असेंबली की आठ सीटें नामांकन से भरी जाती हैं। इनमें 5 महिला, एक उलेमा, एक टेक्नोक्रेट और एक प्रवासी कश्मीरी के लिए आरक्षित है। नामांकन भी पाकिस्तान की मर्जी से होता है। इस तरह 53 में से 20 सीटों पर सीधे पाकिस्तान का नियंत्रण है। अवामी एक्शन कमेटी पीओके से बाहर (पाकिस्तान) से चुने जाने वाले 12 सीटों को ख़त्म करने की मांग कर रही है। उनकी मांग को नजरअंदाज करके हाल में असेंबली का चुनाव करा लिया गया।

पाकिस्तान विरोधी नारे

“हम क्या चाहते? आजादी। हम ले के रहेंगे आजादी” “पाकिस्तानी फोर्सेज आउट आउट” “क्विट पाकिस्तान” (पाकिस्तान, कश्मीर छोड़ो) “कश्मीर हमारा वतन है”। ये कुछ नारे हैं जो इन दिनों ग़ुलाम कश्मीर के प्रदर्शनकारियों के वायरल वीडियो में गूँज रहे हैं। पाकिस्तान सरकार ने पीओके में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर पाबंदी लगा रखी है। उसके बावजूद प्रदर्शनों के वीडियो लगातार बाहर आ रहे हैं। तो क्या पीओके अब पाकिस्तान से अलग होने के रास्ते पा बढ़ रहा है?

श्रीनगर के पत्रकार राशिद राहिल कहते हैं कि गुलाम कश्मीर में हालात विस्फोटक हैं और वहां के लोग अब दमन बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन इस्लामाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक इम्तियाज गुल कहते हैं कि सिर्फ कुछ हज़ार लोगों के सड़क पर आंदोलन का मतलब ये नहीं है कि पूरा कश्मीर (पीओके) अब पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हो गया है। उनके कुछ मसले हैं। उन पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। सिर्फ़ रावलकोट में थोड़े से लोग सड़कों पर हैं। कश्मीर (पाकिस्तानी) के बाहर से चुने जाने वाली 12 सीटों के सवाल को भी देखा जाना चाहिए। कश्मीर के लोग पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नहीं हैं। जैसे बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनवाँ में कुछ हज़ार लोग विरोध कर रहे हैं वैसे ही कश्मीर में है। उनके मसलों पर बात करने की ज़रूरत है। 
विश्लेषण से और
पाकिस्तान के एक अन्य पत्रकार हामिद मीर एक वीडियो प्रोग्राम में कहते हैं- पाकिस्तान ने दो ग़ैर जरूरी फ़्रंट खोले हैं, अपनी नहिली की वजह से। एक गिलगित बाल्टिस्तान में और दूसरा आजाद (ग़ुलाम) कश्मीर में।

पाकिस्तान इस समय कई मोर्चों पर जूझ रहा है। बलूचिस्तान में विद्रोही हथियारों से लैस हैं। खैबर पख़्तूनवाँ में भी पाकिस्तानी सेना और पुलिस का विरोध हो रहा है। गिलगित बाल्टिस्तान जिसे भारत ग़ुलाम कश्मीर का हिस्सा मानता है वो भी उबल रहा है। ग़ुलाम कश्मीर के हालत दिन ब दिन बदतर होते जा रहे हैं।