विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा के लिए लागू किए गए नियमों का विरोध करने वाले अब वे नारे लगा रहे हैं, जिनको लेकर उन्हें सख़्त ऐतराज़ हुआ करता था। सख़्त ऐतराज़ ही नहीं वे उन्हें देशद्रोही करार देकर जेल भेज देना चाहते थे, उन्हें देश से बाहर चले जाने को कह रहे थे।
जी हां, संदर्भ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में इसी महीने की उस घटना का है जिसमें कुछ छात्रों ने मोदी तेरी कब्र खुदेगी...के नारे लगाए थे। इस पर भारी बवाल हुआ। छात्रों के ख़िलाफ़ एफआईआर हुई और विश्वविद्यालय ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की बात भी कही।
अब जबकि ठीक यही नारा यूजीसी एक्ट के विरोधी लगा रहे हैं तो उनके बारे में क्या कहा जाए क्या उन्हें भी देशद्रोही कहा जाएगा, उनके ख़िलाफ़ भी एफआईआर की जाएगी नहीं, कोई कार्रवाई नहीं होगी उन्हें अनदेखा, अनसुना कर दिया जाएगा क्योंकि वे सरकार अपने समर्थकों को नाराज़ नहीं कर सकती। यही लोग सत्तारूढ़ दल की रीढ़ हैं, उसके प्रचारक हैं, उसे सत्ता तक पहुँचाने वाले रहे हैं।
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लेकिन ये प्रश्न तो उठेगा ही न कि मोदी के कट्टर समर्थक ही उनकी कब्र खोदने की बात क्यों कर रहे हैं, उनके मुर्दाबाद के नारे क्यों लगा रहे हैं। क्या ये हैरत में डालने वाली चीज़ है नहीं बिल्कुल नहीं है। ये तो होना ही था क्योंकि मोदी और उनकी सरकार ने काम ही ऐसा किया है। उन्होंने इन लोगों के साथ विश्वासघात किया है।
ये लोग यानी ये जातियाँ ये मानकर चल रही थीं कि मोदी जी भले ही पिछड़ी जाति के हों मगर वे अन्य पिछड़ों और दलितों की तरह उन्हें अपने से श्रेष्ठ मानते हैं, उनके लिए ही काम कर रहे हैं। मोदी ने इस विश्वास को कायम करने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी खफ़ा दी थी। वे आरएसएस के प्रचारक थे जो कि घनघोर ब्राम्हणवादी संगठन है। बीजेपी से वे उस समय से जुड़े हुए हैं जो कि ब्राह्मण-बनियों की पार्टी मानी जाती थी। तो उनकी वफ़ादारी पर उन्हें पूरा भरोसा था।
मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इस भरोसे को और मज़बूत किया। उन्होंने राम मंदिर बनवाकर ब्राम्हणवाद को बढ़ावा दिया। काशी हो या सोमनाथ वे लगातार ऐसे प्रयास करते रहे जिससे सवर्णों का तुष्टिकरण होता रहे। वे जब-तब हिंदू धर्म को महिमामंडित करने के काम भी करते रहे। इससे हिंदू समाज में ब्राम्हणों का महत्व बढ़ा, दलित-मुस्लिम विरोधी साधु-संतों का मान बढ़ा।
अब वही मोदी अगर उनके वर्चस्व पर कुठाराघात करेंगे तो गुस्सा तो आएगा। गुस्सा तो उन्हें तब भी आया था जब दलितों के दबाव में एससी-एसटी एक्ट पर सरकार पीछे हटी थी, उस समय भी उनकी भृकुटियाँ तन गई थीं जब उन्होंने जातिवार जनगणना करवाने की घोषणा कर दी थी। उन्हें लग रहा था कि अगर ये गणना हुई तो संख्या के आधार पर संसाधनों का बँटवारा शुरू हो जाएगा और उनके हाथ से नौकरियाँ भी निकलेंगी और दूसरे अवसर भी।
लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि मोदी जी ज़रूर कोई खेल करेंगे। अव्वल तो वे इस बात से खुश हुए कि मोदी जी ने विपक्ष के संविधान बचाओ-आरक्षण बचाओ आंदोलन की हवा निकाल दी। दूसरे, उन्हें मोदी पर भरोसा था कि वे कोई तिकड़म करके जातिवार जनगणना नहीं कराएंगे और कराएंगे भी तो उससे कुछ निकलने नहीं देंगे।

तो यहां तक वे धैर्यपूर्वक चलते रहे। फिर मोदी जी ने उन्हें दूसरे कामों में भी लगा रखा था। इनमे सबसे बड़ा काम मुसलमानों के ख़िलाफ़ निरंतर ज़हर उगलने और हिंसा भड़काने का था। इस काम को वे पूरी निष्ठा से कर रहे थे, क्योंकि उन्हें इसमें मज़ा आ रहा था। निरपराध, निहत्थे विधर्मियों को मारने-पीटने का सुख उन्हें पिछली सरकारों में नहीं मिल पा रहा था। वे इसके लिए मोदी जी के आभारी थे।

लेकिन यूजीसी एक्ट ने उनके इस आनंद में विघ्न डाल दिया। विघ्न भी छोटा-मोटा नहीं, इतना बड़ा कि उन्हें अपना वजूद ही ख़तरे में दिखने लगा। उन्हें लगा कि यूजीसी एक्ट उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहा है, उन पर निगरानी का इंतज़ाम कर रहा है। वे इस खयाल से ही उग्र हो उठे कि पिछड़ों-दलितों को गरियाने और उनका उत्पीड़न की जो आज़ादी उन्हें सदियों से मिली हुई थी, वह छिन जाएगी। न केवल आज़ादी छिन जाएगी, बल्कि अगर पकड़े गए तो सज़ा भी होगी।
उन्हें इससे कोई मतलब नहीं था कि ये दलित-पिछड़े भी हिंदू समाज के हिस्सा हैं और उन्हें भी सुरक्षा और सम्मान से जीने का हक़ है। वे तो यही नहीं चाहते कि वे पढ़े-लिखें और उनकी बराबरी में बैठें। उनके इसी रवैये से हर साल उच्च शिक्षण संस्थानों में सैकड़ों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं। वे और किस तरह की अमानवीय यातनाएं झेलते हैं इसका तो कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिलता।  
बहरहाल, मोदी जी पर उनका गुस्सा जायज़ है। मोदी जी ने उनके साथ धोखा किया है और इसके लिए वे अगर उनकी कब्र खोदना चाहते हैं तो इस पर बीजेपी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए, न ही इसे ग़लत बताना चाहिए। वह बता भी नहीं रही है। बहुत सारे बीजेपी के नेता, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता खुलकर एक्ट का विरोध कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे भी इस मुहिम का हिस्सा हैं।
दरअसल, उन्हें मोदी जी की मजबूरी नहीं समझ में आ रही है। मोदी जी को सत्ता में बने रहना है और इसके लिए चुनाव जीतना है। इस मजबूरी के चलते उन्हें पिछड़ों-दलितों को रिझाने के लिए भी कुछ न कुछ करते रहना पड़ता है। वे अंगर अंबेडकर का नाम लेते हैं, भगत सिंह का नाम लेते हैं तो इसलिए नहीं कि वे उनका सम्मान करते हैं, उनके विचारों को मानते हैं। वह चुनावी मजबूरी है, इसलिए ये तरह का ढोंग उन्हें करना पड़ता है।
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यूजीसी एक्ट भी दलितों-पिछड़ों को भ्रमित करके विपक्ष से अलग करना है। कई राज्यों में चुनाव हैं और ये जो अस्सी फ़ीसदी वोट बैंक है, उसे खुला नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए वे उनकी नाराज़गी मोल लेकर भी ये कर रहे हैं। और यक़ीन मानिए वे आपके विरोध और नारों से खुश हो रहे होंगे। आप मोदी की कब्र खोदने के जितने नारे लगाएंगे, जितना उनकी जाति को लेकर संबोधित करेंगे, उतना ही पिछड़े-दलितों की हमदर्दी उनको मिलेगी। और यही तो वे चाहते हैं।
यानी चित भी मोदी जी की है और पट भी मोदी की। उन्हें ये भी पता है कि सवर्ण चाहे जितनी गाली दे दें लेकिन वोट तो बीजेपी को ही देंगे। सपा-राजद के पास तो जाएंगे नहीं। कांग्रेस के पास भी जाएंगे तो बहुत थोड़े लोग, क्योंकि वह भी तो दलित-पिछड़ों का एजेंडा लेकर चल रही है।