13 नवंबर 1958 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मंगालदास पकवासा ने राजस्थान के नाथद्वारा स्थित 18वीं सदी के श्रीनाथजी मंदिर से सोना, चांदी और भारी मात्रा में नकदी उसके संरक्षक महाराज द्वारा गुप्त रूप से ले जाए जाने की गंभीर सूचना दी। इस पर नेहरू ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस कृत्य को सीधा-सीधा "लूट" बताया और राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया तथा केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत को पत्र लिखकर इस मामले में सख्त कदम उठाने को कहा।

अपने पत्र में नेहरू ने कहा कि महाराज द्वारा मंदिर की संपत्ति को चुपचाप ले जाना सार्वजनिक धन का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि यह गबन इसलिए संभव हो सका क्योंकि मामले को संभालने में ढिलाई बरती गई। उन्होंने खेद जताया कि राजस्थान सरकार द्वारा गठित जाँच समिति (जिसके अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश वांचू थे) महाराज की आपत्तियों के कारण कभी काम ही नहीं कर सकी।

नेहरू ने लिखा, “इस तरह की घटनाओं को होने देना हमारी सरकारों के लिए किसी सम्मान की बात नहीं है।” उन्होंने नाथद्वारा मंदिर के प्रबंधन को पूरी तरह दोषपूर्ण बताया और आश्चर्य व्यक्त किया कि “कोई धार्मिक व्यक्ति ऐसी व्यवस्था को कैसे सहन कर सकता है?” आगे उन्होंने कहा, “ ऐसा प्रतीत होता है कि महंत हो या महाराज, धर्म, अध्यात्म और ईमानदार जीवन-व्यवहार से जितनी दूर हो सकते हैं, उतनी दूर है।” उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा, “व्यक्तियों के लालच और लोभ के लिए जन भावनाओं का शोषण करना अनुचित है।”
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नेहरू ने प्रश्न उठाया, “नाथद्वारा मंदिर की आय का उपयोग आखिर किस अच्छे उद्देश्य के लिए हो रहा है?” और स्वयं उत्तर दिया, “मेरे अनुमान से मुख्यतः राजनीतिक उद्देश्यों के लिए। इसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता और आपको तत्काल कदम उठाने चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “इसके अलावा यह प्रश्न भी उठता है कि जिस व्यक्ति पर लूट और धन के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे हों, उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए? और उसे उस पद पर बने रहने की अनुमति क्यों दी जाए जहाँ वह और अधिक धन का दुरुपयोग कर सकता है? मेरा मानना है कि तत्काल कार्रवाई आवश्यक है। राजस्थान सरकार का इस मामले में नरम रुख अपनाना उचित नहीं है।”

राम मंदिर में कथित डकैती पर मोदी की चुप्पी

1958 में नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर से आभूषणों और कीमती वस्तुओं की चोरी पर नेहरू की यह तीखी प्रतिक्रिया अयोध्या के राम मंदिर से भक्तों द्वारा चढ़ाए गए नकद धन, सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं की कथित चोरी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गहरी चुप्पी क्या कहती है?

फरवरी 2024 में मोदी ने स्वयं राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की थी। उस अवसर पर उन्होंने भारतीय राज्य की संवैधानिक धार्मिक तटस्थता की भावना के विपरीत यह कहा था कि “राम राष्ट्र हैं और देव देश हैं।” यदि उनके इसी तर्क को मान लिया जाए तो राम मंदिर में भक्तों की आस्था से चढ़ाए गए धन और बहुमूल्य वस्तुओं की चोरी भारतीय राज्य और देश दोनों के विरुद्ध एक गंभीर अपराध है।

नकदी, सोने और चांदी की कथित चोरी के अलावा यह आरोप भी लगाए गए हैं कि मंदिर निर्माण के लिए भूमि खरीदने की प्रक्रिया में कुछ ट्रस्टियों ने करोड़ों रुपये कमाए और निर्माण कार्यों के ठेके दिलाने में कथित तौर पर 40 प्रतिशत तक कमीशन लिया।

प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व प्रधान सचिव और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टी रहे नृपेंद्र मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अयोध्या राम मंदिर में जो हुआ वह केवल चोरी नहीं बल्कि डकैती है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने इस मामले पर न तो कोई सार्वजनिक नाराज़गी व्यक्त की और न ही इस कथित लूट के समाधान के लिए कोई पहल दिखाई।

धार्मिक उद्देश्य या राजनीतिक इस्तेमाल?

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, नेहरू ने नाथद्वारा मंदिर की आय के राजनीतिक इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया था और कहा था कि उसका उपयोग धार्मिक या आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा था।

जिस स्थान पर कभी बाबरी मस्जिद थी, वहाँ राम मंदिर का निर्माण भारतीय जनता पार्टी की एक राजनीतिक परियोजना रही है। इसके माध्यम से लोगों को संगठित किया गया और चुनावों में समर्थन प्राप्त किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को “कानून के शासन का घोर उल्लंघन” बताया था। उसके मुताबिक यह घटना राम मंदिर के मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक लामबंदी के कारण संभव हुई।

इस संदर्भ में अयोध्या राम मंदिर से जुड़ी कथित अभूतपूर्व वित्तीय अनियमितताएँ और भ्रष्टाचार फिर से कानून, न्याय, नैतिकता और सार्वजनिक आचरण के गंभीर उल्लंघन की ओर संकेत करते हैं, जिनका उद्देश्य मुख्यतः राजनीतिक लाभ प्राप्त करना और नेहरू के शब्दों में “व्यक्तियों के लालच और लोभ की पूर्ति करना” प्रतीत होता है।

राम के नाम पर लालच और लोभ

वास्तव में, लेखक के अनुसार, अयोध्या मंदिर में भगवान राम के नाम पर लालच और लोभ को प्रतिष्ठित कर दिया गया है। इसका प्रमाण यह बताया जाता है कि केवल दो ट्रस्टियों—चंपत राय और अनिल मिश्रा—के इस्तीफे हुए, जबकि उनके या अन्य ट्रस्टियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी ओर, केवल कुछ छोटे स्तर के लोगों को गिरफ्तार किया गया।

अयोध्या राम मंदिर का प्रबंधन न तो उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत संचालित होता है और न ही संसद द्वारा पारित किसी कानून के तहत। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं एक ट्रस्ट की घोषणा की, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोग शामिल हैं। यह ट्रस्ट सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे से भी बाहर है। देशव्यापी आक्रोश और कथित गबन तथा भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद, जिन्हें कुछ लोगों ने डकैती तक कहा है, प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा।

नाथद्वारा मंदिर अधिनियम, 1959

इसके विपरीत, जब नेहरू ने सुखाड़िया को नाथद्वारा मंदिर में भक्तों द्वारा चढ़ाई गई संपत्ति की लूट के मामले में सख्ती से कार्रवाई करने को कहा, तो राजस्थान सरकार ने 1959 में नाथद्वारा मंदिर अधिनियम बनाया। इस कानून का उद्देश्य अन्य बातों के साथ-साथ भक्तों द्वारा दिए गए दान का विनियमन भी था।
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महाराज ने इस कानून को अदालत में चुनौती दी और दावा किया कि मंदिर उनकी निजी संपत्ति है तथा धर्म पालन के उनके मौलिक अधिकार का हिस्सा है इसलिए भक्तों द्वारा दिया गया दान धार्मिक प्रकृति का है और राज्य उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

लेकिन राजस्थान उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने इस कानून को वैध ठहराया। 21 जनवरी 1963 को तिलकायत श्री गोविंदलालजी महाराज बनाम राजस्थान राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मंदिर की संपत्तियों का प्रबंधन एक विशुद्ध रूप से लौकिक (सेक्युलर) विषय है और इसे धार्मिक आचरण नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि मंदिर में पूजा-अर्चना से जुड़े लोग अत्यंत मूल्यवान आभूषणों और अलंकारों को प्रतिदिन मूर्ति पर चढ़ाते और उतारते हैं, और उनकी सुरक्षा एक लौकिक विषय है जो प्रबंधन बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आता है।

यदि 1963 के इस निर्णय के सिद्धांत को अयोध्या राम मंदिर के कथित चोरी के मामले पर लागू किया जाए, तो यह कहा जा सकता है कि बहुमूल्य आभूषणों और संपत्ति की सुरक्षा, जो प्रबंधन बोर्ड की जिम्मेदारी थी, उसमें गंभीर चूक हुई है।

इसलिए, लेखक के अनुसार, अयोध्या राम मंदिर में दान देने वाले असंख्य श्रद्धालुओं के विश्वास को जो आघात पहुँचा है, उस पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी स्वयं कई सवाल खड़े करती है।

(एस. एन. साहू भारत के राष्ट्रपति रहे के. आर. नारायणन के विशेष कार्याधिकारी (Officer on Special Duty) रह चुके हैं।)
-द वायर से साभार