बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं पर दि हिंदू अख़बार में एक विस्तृत रिपोर्ट छपी है। रपट बताती है कि ऐसे हादसों के कितने कारण हो सकते हैं। कोरोना से जितने लोग मरे उससे कहीं अधिक हर साल रोड एक्सीडेंट में मर जाते हैं। इसका कारण हमेशा लापरवाही से वाहन चलाना नहीं होता। रिपोर्ट स्टडी करने पर पता चलता है कि जब खराब सड़कें और खराब फैसले आपस में मिलते हैं तो डिजास्टर सा जन्म लेता है। तेलंगाना में एनएच 163 का एक भाग डेथ काॅरिडोर कहा जाने लगा है। यह रिपोर्ट विस्तार से दुर्घटनाओं की स्टडी करके बताती है कि डिज़ाइन की भयंकर कमियां रखरखाव का घोर अभाव हादसों का गंभीर समीकरण पैदा करता है। रोड की उपेक्षा से बड़े भयंकर गड्ढे, मिट्टी मिला हुआ बालू, गायब चेतावनी बोर्ड अधिकांश हादसों की वजह बन रहे हैं। एक डीसीपी (ट्रैफिक) का कहना था कि ड्राइवर का व्यवहार ही नहीं, बल्कि उसका नशा करना सड़कों पर तीखे मोड़, तीव्र ढाल और संरचनात्मक कमियां दुर्घटनाओं की बड़ी वजह बनती हैं।

सड़क निर्माण करने वाले एक जाने माने ठेकेदार का दावा है कि गुणवत्ता का सवाल इसलिये नहीं उठाया जा सकता कि उनको टेंडर हासिल करने से लेकर कदम कदम पर जो दलाली देनी पड़ती है उसका प्रतिशत अब बढ़कर 55 तक जा पहुंचा है। इस बारे में कर्नाटक की सड़क निर्माण कंपनियों के एक संगठन ने केंद्र सरकार से काफी पहले शिकायत भी की थी लेकिन उस मामले में कोई जांच नहीं हुई।
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2025 में 1.83 लाख मौतें

सड़क दुर्घटनाओं के अधिकृत सरकारी आँकड़े उपलब्ध कराने वाले एम ओ आर टी एच के अनुसार 2015 में जहां कुल 5,06,000 एक्सीडेंट हुए जिनमें 1,46,000 लोग मारे गए वहीं 2025 में दुर्घटनाओं का बढ़कर यह आँकड़ा 5,14,000 और मरने वाले 1,83,000 से अधिक हो गये। यानी प्रतिदिन 500 से अधिक लोगों ने रोड एक्सीडेंट में अपनी जान गंवा दी। 2026 में जुलाई तक 2,96,000 सड़क हादसे हो चुके हैं जिनमें मरने वालों की तादाद एक लाख से अधिक है, साल के आखिर तक यह आंकड़ा दो लाख तक पहुंचने की आशंका है, जिससे मरने वालों की तादाद पिछले साल से भी अधिक हो सकती है जो अब तक की सर्वाधिक होगी। 

विडंबना यह भी है कि कुल एक्सीडेंट घटने के बावजूद मरने वाले लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। प्रति 100 दुर्घटना में पहले मरने वाले 22 से बढ़कर अब 36 हो चुके हैं। हालाँकि रोड एक्सीडेंट का सबसे बड़ा कारण 90 प्रतिशत मानवीय भूल यानी ड्राइवर को माना जाता है जिसमें 70 प्रतिशत तक वजह वाहन की ओवर स्पीड होती है। नशा, लापरवाही, गलत साइड, ओवरटेक, गलत लेन, मोबाइल पर बात करना, बिना सीट बेल्ट या हेलमेट नहीं लगाना, रोड की खराब डिज़ाइन, पॉट होल, ब्लैक स्पॉट, टायर फटना, ब्रेक फेल होना, ओवरलोड और ट्रैफिक नियमों की जानकारी नहीं होना या होने पर भी उनको नहीं मानना जिम्मेदार हैं।

सवाल यह है कि क्या हमारा समाज, हमारा परिवार और हम खुद निष्ठुर अमानवीय संवेदनहीन आत्मकेंद्रित और स्वार्थी होते जा रहे हैं?

जो लोग अपने धर्म, जाति और क्षेत्र का एक व्यक्ति मारे जाने पर आसमान सर पर उठा लेते हैं, जो समाज अपने वर्ग का कुख्यात अपराधी तक मारे जाने पर गम और गुस्से में डूब जाते हैं, जो समूह अपने पालतू श्रद्धेय और आस्था के प्रतीक जानवर तक मारे जाने या पकड़कर निर्जन इलाकों में दूर छोड़े जाने पर भी सड़कों पर उतर आता है उसी समाज के लोग एक्सीडेंट में मारे जाने वाले दर्जनों लोगों पर चुप्पी साधे रहते है? क्यों? इससे उनको कोई दुख, क्रोध और आक्रोश नहीं होता? इससे उनका मज़हब संस्कृति और सभ्यता ज़रा भी ख़तरे में नहीं पड़ती? यहां तक कि कितना ही बड़ा आदमी दुर्घटना में मारा जाये सब शांत रहते हैं।
 
"ट्रक और बस की भयंकर आमने सामने की भिड़ंत में दो दर्जन मरे, एक दर्जन से अधिक घायल।" आपने ख़बर पढ़ी, सुनी और देखी। लेकिन आप ज़रा भी विचलित दुखी या सदमे में नहीं आये। यहां तक कि अगर इस तरह के रोड एक्सीडेंट में आपका कोई करीबी भी मारा जाये तो आप दुखी तो अवश्य होते हैं लेकिन खास गुस्सा, आक्रोश या विशेष नाराज़गी आपको नहीं होती। आप भगवान खुदा और वाहे गुरु का लिखा मानकर अपने काम धंधे में पहले की तरह सहज होकर फिर से लग जाते हैं। लेकिन अगर आपके अपने परिवार के सदस्य ही नहीं धर्म के अनुयायी, जाति के भाई और क्षेत्र के निवासी की हत्या हो जाये तो आप बुरी तरह उबल पड़ते हैं। आपका खून खौलने लगता है। आप कानून की बजाये खुद अपराधी या आरोपी को सज़ा देने पर उतर आते हैं। यहां तक कि कई बार लोग ऐसे संदिग्ध आरोपियों की बिना सबूत, गवाह और ठोस तथ्यों के मॉब लिंचिंग यानी हत्या तक कर देते हैं। दुख और चिंता की बात यह है कि हमारे देश में ऐसी हत्यायें आम होती जा रही हैं लेकिन सरकार, पुलिस या अदालतों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। 
अब अपने मूल विषय पर आते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में जो लोग मारे जाते हैं। उनकी ख़बरों में किसी को विशेष रूचि नहीं है। पुलिस मौक़ा मुआयना कर अज्ञात या अमुक के खिलाफ रपट दर्ज कर घायलों को चिकित्सालय और मृतकों को पोस्टमार्टम हाउस या पंचनामे के बाद उनके परिवारजनों को सौंप देती है। सरकार मरने वालों और घायलों को कुछ लाख या कुछ हज़ार मुआवज़ा घोषित कर देती है। जो कई बार मिलता ही नहीं। आप ऐसी ख़बरों पर एक सरसरी निगाह डालते हुए अपनी रूचि की चुनाव, राजनीति, सांप्रदायिक, धार्मिक, बलात्कार, हत्या, गबन, ऑनलाइन ठगी और अपहरण की ख़बरों पर नज़र गड़ाकर रूचि से पढ़ते हैं, यह जानते हुए भी ऐसे हादसों का अगला शिकार आप खुद भी हो सकते हैं, तब आपकी भी ख़बर पढ़ने या उस पर अफसोस जताने में कोई दिलचस्पी नहीं लेगा।

सड़कों की हालत ख़राब

कथित एक्सप्रेस वे हों, नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे से लेकर गांवों कस्बों और जनपद मुख्यालयों की स्थानीय निकायों द्वारा बनाई गई सड़कों को देख लीजिए। सब की हालत लगभग खस्ता है, एनएचएआई कर्ज में डूबा है और उसके लिये ही जगह जगह टोल वसूली जारी है। रोड ही नहीं, रेलवे से लेकर एयरवेज़ तक सब जगह सुरक्षा और यात्री सुविधओं का अभाव है। हालांकि राजनेता, मंत्री और अफसर सड़कों व ट्रेनों का उद्घाटन करते हुए उनके वर्ल्ड क्लास होने और उनकी स्पीड बुलेट जैसी होने का दावा करते हैं लेकिन वे सुरक्षा को लेकर चुप्पी साधे रहते हैं क्योंकि उनको भी पता है कि उनकी प्राथमिकता में सुरक्षा का कोई खास स्थान होता ही नहीं। 
विश्लेषण से और
अगर हम अब भी अतीत के गौरव की आत्मश्लाघा, सभ्यता और संस्कृति के नाम पर आपस में बाँटो और राज करो की राजनीतिक दलों की चाल को नहीं समझेंगे तो हमें भारी भरकम टैक्स वसूली के बाद भी जिस तरह से खराब सड़कों पर हादसों का आये दिन शिकार होने को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है, उसका अगला शिकार कोई भी हो सकता है और देश समाज ऐसे ही चलता रहेगा जैसे चल रहा है। इसलिये ज़रूरी है कि रोड एक्सीडेंट को नागरिक सुरक्षा का मुख्य मुद्दा बनाया जाये और चुनाव आने पर सवाल उठाये जायें, बाकी आपकी मर्जी अगर आपको इस तरह के हादसों से कोई परेशानी नहीं है और आपके एजेंडे में धर्म जाति और अतीत के गौरव के दूसरे भावनात्मक मुद्दे सबसे ऊपर हैं।