हिंदुओं और मनुस्मृति पर आरएसएस का रवैया
आरएसएस पर आरोप लगता रहा है कि भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान के बजाय शूद्रों और हिंदू महिलाओं के खिलाफ़ शर्मनाक आदेश देने वाले धर्मग्रंथ 'मनुस्मृति' पर जोर देता रहा है। आरएसएस पर मुसलमान और ईसाई विरोधी होने का आरोप भी लगता रहा है। दरअसल, ऐसे आरोप लगाने वाले लोग सच्चाई का आधा हिस्सा ही जानते हैं। हिंदू राष्ट्र बनाने के उसके ‘प्रोजेक्ट’ में कथित तौर पर शूद्रों (दलितों) और हिंदू महिलाओं के लिए इंसानों से बदतर ज़िंदगी बिताने के हुक्म दिए गए हैं। असल में, आरएसएस चाहता था कि इस संविधान की जगह 'मनुस्मृति' (मनु के कानून) को लाया जाए, जो शूद्रों, अछूतों और महिलाओं के बारे में अपमानजनक और अमानवीय बातों के लिए बदनाम है। जब भारत की संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान अंतिम रूप से तैयार किया, तो आरएसएस खुश नहीं था। उसके मुखपत्र 'ऑर्गनाइज़र' ने 30 नवंबर 1949 के एक संपादकीय में शिकायत की थी:
“लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अनोखे संवैधानिक विकास का कोई ज़िक्र नहीं है। मनु के कानून स्पार्टा के लाइकरगस या फारस के सोलन से बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनुस्मृति में बताए गए उनके कानून दुनिया भर में प्रशंसा पाते हैं और लोग खुद-ब-खुद उनका पालन करते हैं। लेकिन हमारे संविधान के जानकारों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है।”
आज़ाद भारत में 'मनु कोड' लागू करने की मांग करके आरएसएस असल में अपने गुरु, विचारक और मार्गदर्शक सावरकर का ही अनुसरण कर रहा था, जिन्होंने कहा था:
“मनुस्मृति वह धर्मग्रंथ है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सबसे अधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति-रीति-रिवाजों, विचारों और आचरण का आधार रहा है। इस ग्रंथ ने सदियों से हमारे राष्ट्र की आध्यात्मिक और दैवीय यात्रा को व्यवस्थित रूप दिया है। आज भी करोड़ों हिंदू अपने जीवन और आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर ही आधारित हैं। आज मनुस्मृति ही हिंदू कानून है।”
[Savarkar, V.D., ‘Women in Manusmriti’ in Savarkar Samagar (collection of Savarkar’s writings in Hindi) volume IV, Prabhat, Delhi, 2000, p. 416.]
आरएसएस के लिए जातिवाद और हिंदू राष्ट्र एक ही बात है
आरएसएस के बड़े नेताओं का मनुस्मृति में भरोसा है, इसलिए स्वाभाविक रूप से वे जातिवाद में भी यकीन रखते हैं, जिससे छुआछूत जैसी बुरी प्रथा पैदा हुई। आरएसएस के लिए जातिवाद ही हिंदू राष्ट्रवाद का मूल है। गोलवलकर ने साफ-साफ कहा था कि जातिवाद और हिंदू राष्ट्र एक ही हैं। उनके अनुसार,
“हिंदू लोग कोई और नहीं बल्कि 'विराट पुरुष' हैं, यानी सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही रूप हैं। भले ही उन्होंने 'हिंदू' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन ऋग्वेद के 10वें मंडल में 'पुरुष-सूक्त' में ईश्वर का जो वर्णन है, उससे यह बात साफ हो जाती है। उसमें कहा गया है कि सूर्य और चंद्रमा उनकी आंखें हैं, तारे और आकाश उनकी नाभि से बने हैं, और ब्राह्मण उनका सिर, क्षत्रिय हाथ, वैश्य जांघें और शूद्र पैर हैं। इसका मतलब है कि जिन लोगों में यह चार-स्तरीय व्यवस्था है, यानी हिंदू लोग, वही हमारे ईश्वर हैं। ईश्वर का यह सर्वोच्च स्वरूप ही हमारी 'राष्ट्र' की अवधारणा का मूल है और इसने हमारी सोच को प्रभावित किया है तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत की कई अनूठी अवधारणाओं को जन्म दिया है।"
[Golwalkar, M. S., Bunch of Thoughts, p.36-37.]
आरएसएस और हिंदुत्व खेमा मनु के कानूनों को लागू करके किस तरह की हिंदुत्व सभ्यता बनाना चाहता है, इसे मनु द्वारा हिन्दू निचली जातियों, अछूतों और महिलाओं के लिए बनाए गए क़ानूनों को देखकर समझा जा सकता है। यहाँ बताए गए कुछ अमानवीय और पतनशील कानून खुद ही अपनी कहानी ब्यान करते हैं।
दलितों, अछूतों के संबंध में मनु के क़ानून
- अनादि ब्रह्म ने लोक कल्याण एवं समृद्धि के लिए अपने मुख, बांह, जांघ तथा चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों को उत्पन्न किया। (1/31)
- भगवान ने शूद्र वर्ण के लोगों के लिए एक ही कर्तव्य-कर्म निर्धारित किया है-तीनों अन्य वर्णों की निर्विकार भाव से सेवा करना। (1/91)
- शूद्र यदि द्विजातियों-ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को गाली देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए क्योंकि नीच जाति का होने से वह इसी सज़ा का अधिकारी है। (8/270)
- शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों के नाम एवं जाति उच्चारण करने पर उसके मुंह में दस उंगली लोहे की जलती कील ठोक देनी चाहिए। (8/271)
- शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुंह एवं कान में गरम तेल डाल देना चाहिए। (8/272)
- यदि वह द्विजाति के किसी व्यक्ति पर जिस अंग से प्रहार करता है, उसका वह अंग काट डाला जाना चाहिए, यही मनु की शिक्षा है। (8/278)
- यदि लाठी उठाकर आक्रमण करता है तो उसका हाथ काट डालना चाहिए और यदि वह क्रुद्ध होकर पैर से प्रहार करता है तो उसका पैर काट डालना चाहिए। (8/279)
- उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले शूद्र की कमर को दाग़ करके उसे वहां से निकाल भगाना चाहिए अथवा उसके नितम्ब को इस तरह से कटवा देना चााहिए जिससे वह न मरे और न जिये। (8/280)
- अहंकारवश नीच व्यक्ति द्वारा उच्चजाति पर थूकने पर राजा को उसके होंठ, पेशाब करने पर लिंग एवं हवा छोड़ने पर गुदा कटवा देना चाहिए। (8/281)
महिलाओं के संबंध में मनु के क़ानून
- पुरुषों को अपनी स्त्रियों को सदैव रात-दिन अपने वश में रखना चाहिए। (9/2)
- स्त्री की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए; एक स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। (9/3)
- बिगड़ने के छोटे से अवसर से भी स्त्रियों को प्रयत्नपूर्वक और कठोरता से बचाना चाहिए, क्योंकि न बचाने से बिगड़ी स्त्रियां दोनों (पिता और पति के) कुलों को कलंकित करती हैं। (9/5)
- सभी जातियों के लोगों के लिए स्त्री पर नियंत्रण रखना उत्तम धर्म के रूप में जरूरी है। यह देखकर दुर्बल पतियों को भी अपनी स्त्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए। (9/16)
- ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप का और न ही उसकी आयु का विचार करती हैं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से प्रयोजन है। यही कारण है कि पुरुष को पाते ही ये उससे भोग के लिए प्रस्तुत हो जाती है चाहे वे कुरूप हों या सुंदर। (9/14)
- स्वभाव से ही परपुरुषों पर रीझने वाली चंचल चित्त वाली और स्नेह रहित होने से स्त्रियां यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी पतियों को धोखा दे सकती हैं। (9/15)
- मनु के अनुसार ब्रह्माजी ने निम्नलिखित प्रवृत्तियां सहज स्वभाव के रूप में स्त्रियों में पाई हैं-उत्तम शैय्या और अलंकारों के उपभोग का मोह, काम-क्रोध, टेढ़ापन, ईर्ष्या द्रोह और घूमना-फिरना तथा सज-धजकर दूसरों को दिखाना। (9/17)
- स्त्रियों के जातकर्म एवं नामकर्म आदि संस्कारों में वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। यही शास्त्र की मर्यादा है क्योंकि स्त्रियों में ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोग की क्षमता का अभाव (अर्थात् सही न देखने, सुनने, बोलने वाली) है। (9/18)
[मनु के नियमों का उपरोक्त चयन एफ. मैक्स मुलर की पुस्तक 'लॉज़ ऑफ़ मनु', एल.पी.पी. पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 1996 से लिया गया है; जो पहली बार 1886 में प्रकाशित हुई थी। प्रत्येक नियम के बाद कोष्ठक में उपरोक्त संस्करण के अनुसार अध्याय संख्या/नियम संख्या दी गई है।]
यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि 25 दिसंबर, 1927 को ऐतिहासिक महाड आंदोलन के दौरान डॉ. बी.आर. आंबेडकर की मौजूदगी में विरोध स्वरूप मनुस्मृति की एक प्रति जलाई गई थी। डॉ. आंबेडकर ने दलितों से आह्वान किया कि वे भविष्य में 25 दिसंबर को 'मनुस्मृति दहन दिवस' के रूप में मनाएँ।
केरल के हिंदुओं की नस्ल सुधारने पर गोलवलकर
आरएसएस , जो खुद को हिंदुओं का हितैषी दुनिया का सबसे बड़ा संगठन बताता है, असल में दक्षिण भारत के हिंदू समाज पर उत्तर भारतीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दबदबा कायम करने के लिए ज़ोर-शोर से काम कर रहा है। आरएसएस का ब्राह्मणवाद दक्षिण भारतीय हिंदुओं को नस्लीय रूप से कमतर मानता है। उसकी सोच में, बाकी लोगों की तुलना में उत्तर भारतीय ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं।
और आरएसएस यह काम बेझिझक करता है। 17 दिसंबर 1960 को गोलवलकर को गुजरात यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ सोशल साइंस के छात्रों को संबोधित करने के लिए बुलाया गया था। इस संबोधन में, 'नस्ल सिद्धांत' (Race Theory) में अपने पक्के विश्वास को ज़ाहिर करते हुए, उन्होंने इतिहास में भारतीय समाज में इंसानों के बीच 'क्रॉस-ब्रीडिंग' (मिश्रित नस्ल पैदा करने) के मुद्दे पर बात की। उन्होंने कहा:
“क्रॉस-ब्रीडिंग के ज़रिए इंसानी नस्ल को बेहतर बनाने की कोशिश में उत्तर के नंबूदरी ब्राह्मणों को केरल में बसाया गया था और एक नियम बनाया गया था कि नंबूदरी परिवार का सबसे बड़ा बेटा केरल के वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र समुदायों की बेटी से ही शादी कर सकता है। एक और भी साहसी नियम यह था कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली संतान का पिता एक नंबूदरी ब्राह्मण होना चाहिए और उसके बाद वह अपने पति से बच्चे पैदा कर सकती थी। आज इस प्रयोग को व्यभिचार कहा जाएगा, लेकिन उस समय ऐसा नहीं था, क्योंकि यह सिर्फ़ पहले बच्चे तक ही सीमित था।”
[M. S. Golwalkar cited in Organiser, January 2, 1961.]
आरएसएस के अंदर: पुरुष 'स्वयंसेवक' हैं और महिलाएं 'सेविकाएं'
1925 में बना आरएसएस एक ऐसी संस्था था जिसमें सिर्फ़ पुरुष सदस्य थे, जिन्हें 'स्वयंसेवक' कहा जाता था। जब आरएसएस ने 1936 में महिलाओं के लिए 'राष्ट्र सेविका समिति' नाम से एक विंग शुरू करने का फ़ैसला किया, तो संगठन के बड़े नेताओं ने साफ़ कर दिया कि वे महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानते हैं। नाम से ही साफ़ था कि महिला सदस्यों को 'स्वयंसेवक' नहीं, बल्कि 'राष्ट्र सेविका' (राष्ट्र की सेविकाएं या नौकरानियां) कहा जाता था। 'राष्ट्र सेविका समिति' में महिलाओं की यह 'सेविका' वाली पहचान सिर्फ़ एक तकनीकी बात नहीं थी, बल्कि हिंदू महिलाओं के प्रति आरएसएस के उस नज़रिए का ही नतीजा थी जो समाज में महिलाओं की ग़ुलाम भूमिका को बढ़ावा देता है। सिर्फ़ 'राष्ट्र सेविका समिति' की सदस्य ही (जिनकी संख्या संगठन की वेबसाइट के अनुसार लगभग तीन लाख है) 'वफ़ादारी/कौमार्य' बनाए रखने, 'संयमित' और 'दृढ़' रहने तथा 'अनैतिकता और बुरी आदतों' का शिकार न होने का संकल्प लेती हैं। आरएसएस के पुरुष स्वयंसेवक ऐसा कोई संकल्प नहीं लेते।
मोहन भागवत जो अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड में सारे विश्व में बराबरी पर प्रवचन देंगे, भारत में हिंदू महिलाओं की ग़ुलाम अधीन भूमिका पर ज़ोर देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इंदौर (जो आरएसएस का गढ़ है) में आरएसएस के प्रमुख कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू महिलाओं को 'सामाजिक अनुबंध' (social contract) के अनुसार खुद को घर के कामों तक ही सीमित रखना चाहिए। उनके अनुसार:
"सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत—पति और पत्नी एक अनुबंध से बंधे होते हैं, जिसमें कहा गया है कि 'तुम (महिला) घर के कामों को संभालो और मुझे संतुष्ट करो, मैं (पुरुष) तुम्हारी ज़रूरतों का ध्यान रखूंगा और तुम्हारी रक्षा करूंगा'; और जब तक वह बिना किसी चूक के अपने कर्तव्यों का पालन करती है, वह उसे अनुबंध के तहत बनाए रखता है, और यदि वह अनुबंध का सम्मान करने में विफल रहती है, तो वह उसे त्याग देता है..."।
(आख़िरी कड़ी में पढ़िए- लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को कैसे देखता है आरएसएस?)