सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 28 सितंबर 2026 को हाई कोर्ट के तीन मुख्य न्यायाधीशों- जस्टिस सुनीता अग्रवाल, जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह- को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने की सिफारिश की। आधिकारिक वक्तव्य महज एक पन्ने का है। उसमें नाम और उनके हाई कोर्ट दर्ज हैं, पर यह नहीं बताया गया कि इन तीनों को चुनने का आधार क्या था। इसी बीच दावा सामने आया कि अखिल भारतीय वरिष्ठता में पहले तीन मुख्य न्यायाधीशों को छोड़कर चौथे, पाँचवें और छठे स्थान वालों के नाम भेजे गए। इस क्रम की स्वतंत्र पुष्टि आधिकारिक वक्तव्य से नहीं होती; उसमें वरिष्ठता सूची ही नहीं है। लेकिन इससे उठता प्रश्न वास्तविक है: जब निर्णय संवैधानिक अदालत की संरचना तय करता हो तो जनता को चयन का तर्क कैसे मालूम पड़े?
पहली सावधानी यह है कि सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीशों की कतार से क्रमवार टिकट बाँटना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की प्रकाशित प्रक्रिया के अनुसार वरिष्ठता के साथ योग्यता, सत्यनिष्ठा, फ़ैसलों की गुणवत्ता, कामकाज और अलग-अलग हाई कोर्टों का प्रतिनिधित्व देखा जाता है। इससे महिला, वंचित समुदाय या अल्पप्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों को स्थान देने का रास्ता भी खुलता है। मगर एक से अधिक कसौटियाँ होने से कारण बताने की ज़रूरत घटती नहीं, बढ़ती है। किसे किस कसौटी पर चुना गया, यह कहे बिना ‘योग्यता’ एक ऐसा शब्द बन जाता है जिसकी जाँच कोई नहीं कर सकता।
एनजेएसी पर संविधान पीठ ने क्या कहा?
यह सवाल आज अचानक पैदा नहीं हुआ। 2014 में संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग, यानी एनजेएसी का रास्ता चुना। 2015 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के आधार पर उसे असंवैधानिक ठहराया। जस्टिस जे. चेलमेश्वर ने संविधान पीठ में असहमति जताई। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कॉलेजियम को बनाए रखने वाले न्यायाधीशों ने भी उसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और वस्तुनिष्ठता की कमी स्वीकारी। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने अपने फ़ैसले में योग्य लोगों के उपेक्षित होने, नियुक्तियों में अनुचित देरी और सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी जैसे आरोपों को आत्ममंथन का कारण बताया। दिसंबर 2015 में अदालत ने चयन मानदंड, निर्णय की प्रक्रिया दर्ज करने, एक सचिवालय और शिकायतों से निपटने की व्यवस्था पर काम करने को कहा था।
एनजेएसी रद्द होने का मतलब
एनजेएसी रद्द होने का अर्थ कॉलेजियम को सुधार से छूट मिलना नहीं था। 2016 में कॉलेजियम के सदस्य जस्टिस चेलमेश्वर ने बैठकों की प्रक्रिया पर सार्वजनिक आपत्ति जताई। उनका आग्रह था कि विचार और असहमति रिकॉर्ड पर आएँ। फिर 3 अक्टूबर 2017 को कॉलेजियम ने स्वयं प्रस्ताव पारित किया कि नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले की सिफारिशें कारणों सहित सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डाली जाएँगी। यह न्यायपालिका का अपना वादा था। आज केवल नाम बताने वाले वक्तव्य को देखते समय उस वादे को याद करना ज़रूरी है। गोपनीय निजी जानकारी को सुरक्षित रखना संभव है; चयन के सार्वजनिक मानदंड बताना अलग बात है।
12 जनवरी 2018 को इस बहस ने अभूतपूर्व रूप लिया। सुप्रीम कोर्ट के चार सेवारत वरिष्ठ न्यायाधीश- जस्टिस चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ- प्रेस के सामने आए। उन्होंने तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखा अपना पत्र सार्वजनिक किया। सबसे गंभीर आरोप यह था कि देश और संस्था के लिए दूरगामी महत्व वाले मामले तर्कसंगत आधार के बिना पसंद की पीठों को सौंपे जा रहे थे।
जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि यदि संस्था को सुरक्षित न रखा गया तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। यह चेतावनी सीधे 2026 के तीन उम्मीदवारों के बारे में नहीं थी; इसे वैसा बताना इतिहास से अन्याय होगा। लेकिन चारों के पत्र में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर का विवाद भी था।
अदालत के भीतर शक्ति का इस्तेमाल
उनका कहना था कि कॉलेजियम मार्च 2017 में मसौदा सरकार को भेज चुका था और इतने गंभीर विषय पर पूरे न्यायालय तथा कॉलेजियम में उचित चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया पर पुनर्विचार और न्यायाधीशों के आचरण से निपटने की प्रभावी व्यवस्था की जरूरत भी याद दिलाई। मूल चिंता यह थी कि अदालत के भीतर शक्ति का प्रयोग तय प्रक्रिया और सामूहिक जवाबदेही से बँधा रहे। उसी जनवरी 2018 में कॉलेजियम ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. एम. जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट भेजने की सिफारिश की। प्रस्ताव में उनकी अखिल भारतीय वरिष्ठता 45वीं लिखी थी; कॉलेजियम ने उन्हें अधिक योग्य बताया। केंद्र ने उनका नाम वापस किया, जबकि साथ अनुशंसित इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति आगे बढ़ी।
पूर्व प्रधान न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा ने सिफारिशों को इस प्रकार अलग करने को न्यायिक स्वतंत्रता पर चोट माना। उन्होंने 2014 के गोपाल सुब्रमण्यम प्रकरण की याद दिलाई, जब पद पर रहते हुए उन्होंने सरकार द्वारा भेजे गए चार नामों में से एक को एकतरफा अलग करने पर आपत्ति की थी। इसलिए वरिष्ठता पर सिद्धांत की बहस और सरकार द्वारा चुनिंदा मंजूरी का प्रश्न साथ-साथ देखना होगा। जनवरी 2019 ने दूसरी ओर की समस्या उजागर की। नए कॉलेजियम ने जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और संजीव खन्ना की सिफारिश की। प्रकाशित प्रस्ताव ने उनकी अखिल भारतीय वरिष्ठता क्रमशः 21वीं और 33वीं दर्ज की, मगर पहले विचार किए गए जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और राजेंद्र मेनन के नाम आगे नहीं बढ़े।
जस्टिस लोकुर का सवाल
हाल में सेवानिवृत्त हुए पूर्व कॉलेजियम सदस्य जस्टिस लोकुर ने पूछा कि दिसंबर 2018 का निर्णय सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ। उन्होंने साफ कहा कि नए कॉलेजियम के सामने आया कथित अतिरिक्त रिकॉर्ड उन्हें मालूम नहीं था; इसलिए उसकी सामग्री पर उन्होंने निष्कर्ष नहीं दिया। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश कैलाश गंभीर ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अनेक वरिष्ठ न्यायाधीशों को पीछे छोड़ने पर आपत्ति जताई। पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए. पी. शाह ने कॉलेजियम की जवाबदेही को कठघरे में रखा। मतभेद उम्मीदवारों की निजी योग्यता पर अंतिम फैसला नहीं थे। सवाल था कि पिछला निर्णय बदला कैसे और चयन की कसौटी लोगों के सामने कितनी स्पष्ट हुई।
जस्टिस ए. पी. शाह ने अक्टूबर 2017 में ही कहा था कि केवल अंतिम प्रस्ताव प्रकाशित करने से पर्याप्त पारदर्शिता नहीं आएगी। चयन और अस्वीकृति की कसौटियाँ पहले तय हों तथा नामों पर उपयोगी प्रतिक्रिया लेने का रास्ता हो। 2023 की एक सार्वजनिक चर्चा में उन्होंने बैठकों का औपचारिक रिकॉर्ड, स्वतंत्र सचिवालय और उम्मीदवारों के पिछले काम की गंभीर पड़ताल माँगी। उन्होंने भाई-भतीजावाद तथा एक ही सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों को बार-बार चुनने की आशंका भी व्यक्त की। ये पूरे संस्थान की कार्यप्रणाली पर उनके आरोप हैं; हर नियुक्त व्यक्ति के खिलाफ प्रमाण नहीं। इसी चर्चा में पूर्व न्यायाधीश दीपक गुप्ता ने छोटे हाई कोर्टों को कम अवसर मिलने और फाइलों में देरी से उम्मीदवारों की वरिष्ठता बदलने का प्रश्न उठाया। उन्होंने उम्मीदवार के कार्यक्षेत्र को जानने वाले न्यायाधीश की भागीदारी उपयोगी बताई।
जस्टिस कुरियन जोसेफ की राय
पूर्व न्यायाधीशों में ही एक राय नहीं है। जस्टिस कुरियन जोसेफ कॉलेजियम को न्यायिक स्वतंत्रता का जरूरी कवच मानते रहे, यद्यपि उन्होंने सुधार अधूरा माना। जस्टिस लोकुर ने भी गोपनीय निजी सामग्री हर मामले में पूरी सार्वजनिक करने से सावधान किया, पर सरकार द्वारा फाइलें रोकने और सिफारिशें अलग करने पर कठोर आपत्ति उठाई। 2023 में उन्होंने पुरानी नियुक्ति फाइलें खोलने और केंद्र को विलंब के लिए जवाबदेह बनाने को कहा। दिसंबर 2023 में सेवानिवृत्त जस्टिस संजय किशन कौल ने मौजूदा कॉलेजियम को सर्वोत्तम व्यवस्था नहीं बताया और न्यायपालिका तथा सरकार के बीच स्पष्ट, पारदर्शी संवाद का आग्रह किया। इन आवाजों का साझा बिंदु इतना है कि बंद दरवाजे और अनिश्चित समयसीमा भरोसा नहीं बना सकते। समाधान को लेकर उनके विचार अलग हैं। इस बहस का सामाजिक पक्ष भी है। 2023 के कॉलेजियम प्रस्ताव ने वरिष्ठता और योग्यता के साथ हाशिये के समुदायों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और कम प्रतिनिधित्व वाले हाई कोर्टों का स्पष्ट उल्लेख किया था। विविधता को वरिष्ठता का विरोधी बनाना गलत होगा।संवैधानिक अदालत में अनुभव के साथ समाज की विविध पृष्ठभूमियों का होना न्याय की विश्वसनीयता बढ़ाता है। लेकिन इन उद्देश्यों का नाम लेकर कोई भी चुनाव स्वतः सही साबित नहीं होता। यदि प्रतिनिधित्व चयन का आधार है, तो वक्तव्य में उसका उल्लेख हो; यदि उल्लेखनीय न्यायिक कार्य और दक्षता आधार हैं, तो उनका संक्षिप्त सार हो। किसी वरिष्ठ उम्मीदवार को न चुनने के लिए उसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाने वाले गोपनीय आरोप प्रकाशित करना आवश्यक नहीं है। चयनित नामों के पक्ष में सकारात्मक, जाँचने योग्य कारण देना संभव है। इसी कसौटी पर 28 सितंबर का एक पन्ने का बयान कमजोर पड़ता है। वह तीन प्रतिष्ठित न्यायाधीशों के नाम बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि तुलना में किन गुणों, आवश्यकताओं और प्रतिनिधित्व के सवालों ने निर्णायक भूमिका निभाई। 2017 के कॉलेजियम का कारण बताने का संकल्प और 2023 के विस्तृत प्रस्ताव को सामने रखें तो यह चुप्पी अधिक स्पष्ट दिखती है।
सोशल मीडिया की वरिष्ठता सूची को प्रमाण मान लेने के बजाय आधिकारिक सूची और चयन की कसौटी सामने आनी चाहिए। जजों के बारे में निराधार संदेह फैलाए बिना भी कॉलेजियम से यह प्रश्न पूछा जा सकता है। सरकार की जवाबदेही इस प्रश्न से अलग नहीं है। सिफारिशें रोकना, लौटाना या एक ही समूह के नामों को चुन-चुनकर मंजूर करना भी भविष्य की वरिष्ठता और अदालत की बनावट बदल सकता है।
इसलिए ‘जज ही जज चुनते हैं’ कहकर सारा दोष न्यायपालिका पर डालना पर्याप्त नहीं है; ‘स्वतंत्रता’ कहकर कॉलेजियम को सार्वजनिक कारणों से मुक्त करना भी उचित नहीं है। न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब कार्यपालिका के दबाव से मुक्ति है; जवाबदेही से मुक्ति नहीं।
सरकार को अपनी आपत्ति तय समय में और नियमों के अनुसार रखनी चाहिए। कॉलेजियम को अपने चुनाव की मुख्य वजहें दर्ज और प्रकाशित करनी चाहिए। चार जजों की 2018 की चेतावनी का सार यही था कि संस्थाओं को केवल उनके पदाधिकारियों की नीयत पर नहीं छोड़ा जा सकता। नियम, रिकॉर्ड और सार्वजनिक विश्वास ज़रूरी हैं। आठ वर्ष बाद, जब तीन नामों की सिफारिश पर देश फिर पूछ रहा है कि वरिष्ठता कैसे तौली गई, कॉलेजियम के पास अपने पुराने वादे को निभाने का अवसर है। सवाल यह नहीं कि वरिष्ठतम तीन को हर हाल में नियुक्त किया जाए। सवाल यह है कि जिन्हें चुना गया, उन्हें क्यों चुना गया- और उस फ़ैसले को जनता के सामने समझाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?