प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराइल यात्रा और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तारीफ़ ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2017 में मोदी की ऐतिहासिक इसराइल यात्रा के दौरान दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी भरी मुलाक़ात और तारीफ़ों के पुल बांधने ने दुनिया का ध्यान खींचा था। हाल ही में 25-26 फ़रवरी को हुई मोदी की दूसरी यात्रा के दौरान भी इसराइली संसद क्नेसेट में दिए गए भाषण में उन्होंने इसराइल का "पूर्ण समर्थन" जताया, सभ्यतागत संबंधों, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी की सराहना की, लेकिन ग़ज़ा में चल रहे संघर्ष पर चुप्पी साध ली। उनका ये क़दम भारत की पारंपरिक फ़लस्तीन-समर्थक नीति से मेल नहीं खाता। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि क्या मोदी का 'निजी नज़रिया' बरसों से चली आ रही विदेश नीति पर हावी हो गया है? भारत हमेशा से फ़लस्तीन के साथ खड़ा रहा है। लेकिन मोदी युग में इसराइल से निकटता बढ़ी है। क्या यह सिर्फ एक रणनीतिक बदलाव है या नैतिक समझौता?
फ़लस्तीन के साथ भारत का पुराना रिश्ता
भारत की विदेश नीति की जड़ें स्वतंत्रता संग्राम और उपनिवेशवाद-विरोधी भावना में हैं। महात्मा गांधी ने 1938 में फ़लस्तीन मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा था कि "फ़लस्तीन अरबों का है, जैसे इंग्लैंड अंग्रेज़ों का या फ्रांस फ्रांसीसियों का।" गांधी ने यहूदियों के साथ सहानुभूति जताई, लेकिन फ़लस्तीन के अधिकारों का समर्थन किया। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया। 1947 में संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन विभाजन योजना के ख़िलाफ़ भारत ने वोट किया, हालांकि 1950 में इसराइल को मान्यता दी गई। लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 तक स्थापित नहीं हुए, क्योंकि भारत फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) और यासिर अराफ़ात के साथ मज़बूती से खड़ा रहा।इंदिरा-राजीव का फ़लस्तीन को समर्थन
1970-80 के दशक में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों ने फ़लस्तीन को समर्थन दिया। भारत ने इसराइल को "क़ब्ज़ा करने वाली ताक़त" माना और फ़लस्तीनी राज्य की वकालत की। 1988 में भारत ने फ़लिस्तीन को राज्य के रूप में मान्यता दी, और रामल्लाह में दूतावास खोला। यह नीति गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) पर आधारित थी। भारत की यह स्थिति नैतिक थी, क्योंकि यह उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ थी। लेकिन 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ विदेश नीति में व्यावहारिकता आई। पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने 1992 में इसराइल से पूर्ण संबंध स्थापित किए, लेकिन फ़लस्तीन समर्थन जारी रहा। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर में भी संतुलन बना रहा। इसराइल से रक्षा सहयोग बढ़ा, लेकिन फ़लस्तीन के लिए सहायता और दो-राज्य समाधान की वकालत जारी रही।
मोदी युग: इसराइल से निकटता, फ़लस्तीन से दूरी?
2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की मध्य पूर्व नीति में उल्लेखनीय बदलाव आया। मोदी ने "डी-हाइफेनेशन" नीति अपनाई, जिसमें इसराइल और फ़लस्तीन से संबंध अलग-अलग रखे जाते हैं। इसका मतलब है कि इसराइल से रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना, लेकिन फ़लस्तीन का समर्थन बनाए रखना। लेकिन व्यवहार में, इसराइल की तरफ़ झुकाव साफ़ दिखता है। 2017 में मोदी की इसराइल यात्रा ऐतिहासिक थी। पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री इसराइल गया और वह भी फ़लस्तीन की यात्रा के बिना। बेन गुरियन एयरपोर्ट पर नेतन्याहू ने मोदी का गले लगाकर स्वागत किया। दोनों ने भूमध्य सागर के किनारे घूमते हुए बातें की। पीएम मोदी ने नेतन्याहू को "मेरा दोस्त" कहा और इसराइल की "शानदार सफलता" की तारीफ़ की। इस यात्रा में रक्षा, कृषि, प्रौद्योगिकी और जल प्रबंधन पर समझौते हुए।
नेतन्याहू की तारीफ़ नई नीति का प्रतिबिंब
अपने पहले इसराइली दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहाँ के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जमकर तारीफ़ की थी। यह तारीफ़ सिर्फ व्यक्तिगत नहीं थी, यह भारत की बदलती नीति का प्रतिबिंब थी। मोदी ने इसराइल को "एक महत्वपूर्ण साझेदार" बताया और दोनों देशों के बीच "रणनीतिक साझेदारी" को ऊंचाई दी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे फ़लस्तीन का समर्थन कमज़ोर हुआ। हालांकि मोदी ने 2018 में फ़लस्तीन जाकर संतुलन बनाने की कोशिश की, जहां उन्हें "ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फ़लस्तीन" सम्मान भी मिला। लेकिन इसराइल से बढ़ते रक्षा सौदे- जैसे स्पाइक मिसाइल, ड्रोन और मिसाइल सिस्टम ने सवाल उठाए कि क्या भारत इसराइल के हथियारों से फ़लस्तीनी संघर्ष में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो रहा है।
2023-2026: ग़ज़ा युद्ध और भारत का रुख
अक्टूबर 2023 में हमास के इसराइल पर हमले के बाद मोदी ने तुरंत "आतंकवाद" की निंदा की और इसराइल के साथ "पूर्ण एकजुटता" जताई। उनका यह बयान भारत की पारंपरिक संतुलित नीति से अलग था। यहीं से इसराइल और फ़लस्तीन को लेकर भारत की नीति में बदलाव शुरू हुआ। सवाल उठने पर बाद में विदेश मंत्रालय ने संघर्ष में नागरिकों की मौत पर चिंता जताई, संयम बरतने और बातचीत से समाधान की अपील की, लेकिन हमले को स्पष्ट रूप से आतंकवादी कार्रवाई बताया। ग़ज़ा में इसराइली हमलों में 72000 से ज्यादा फ़लिस्तीनियों की मौत हुई, लेकिन भारत ने शुरू में UNGA में "मानवीय ट्रूस" पर एब्स्टेन किया। बाद में दिसंबर 2023 और 2024 में सीज़फ़ायर प्रस्तावों के पक्ष में वोट किया, लेकिन इसराइल पर हथियार प्रतिबंध की मांग वाले प्रस्ताव से दूर रहा।
2026 में मोदी की इसराइल यात्रा ने इन सवालों को फिर से हवा दी। इसराइल की संसद क्नेसेट में मोदी ने कहा, "भारत इसराइल के साथ दृढ़ता से खड़ा है, इस समय और उसके बाद भी।" उन्होंने नेतन्याहू को "भाई से ज्यादा" बताया और दोनों देशों के बीच "आयरन अलायंस" की बात की। लेकिन ग़ज़ा में नरसंहार पर एक शब्द भी नहीं बोला। यह इसराइल के अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बीच नेतन्याहू के लिए राजनीतिक बूस्टर था। विदेश मंत्रालय ने दो-राज्य समाधान का समर्थन दोहराया, लेकिन व्यावहार में भारत ने इसराइल से रक्षा सौदे बढ़ाए और फ़लिस्तीन सहायता सीमित रखी।
क्या मोदी की तारीफ़ नीति से मेल खाती है?
यहाँ मुख्य सवाल है: क्या मोदी का नेतन्याहू की तारीफ़ भारतीय विदेश नीति से मेल खाती है? एक तरफ़, मोदी सरकार का तर्क है कि यह "व्यावहारिक दृष्टिकोण" है। इसराइल से प्रौद्योगिकी, रक्षा और कृषि में लाभ हैं – भारत इसराइल का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात बाजार है। (इंडिया-इसराइल-यूएई-यूएस) और IMEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर) जैसे पहल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए हैं। मोदी का नज़रिया राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित है, जहां इसराइल "इस्लामी चरमपंथ" के खिलाफ साझेदार है।
दूसरी तरफ़, आलोचक कहते हैं कि यह पारंपरिक नीति से विचलन है। भारत की उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत फ़लिस्तीन के साथ है, लेकिन मोदी के हाथों में देश की बागडोर आने के बाद यह कमज़ोर हुई। ग़ज़ा में चुप्पी और इसराइल का समर्थन दुनिया भरम में भारत की नैतिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है। क्या मोदी का निजी नज़रिया बरसों से चली आ रही विदेश नीति से अलग है? मोदी और नेतन्याहू की व्यक्तिगत केमिस्ट्री–हिंदुत्व और जियोनिज्म की वैचारिक समानता–नीति को प्रभावित करती लगती है। लेकिन विदेश मंत्रालय दो-राज्य समाधान पर क़ायम है, जो बताता है कि नीति में निरंतरता है, लेकिन ज़ोर इसराइल पर ज़्यादा है।
संतुलन या झुकाव?
मोदी की नेतन्याहू की तारीफ़ ने भारत की विदेश नीति पर बहस छेड़ दी है। पारंपरिक रूप से फ़लिस्तीन-समर्थक भारत अब इसराइल से क़रीब है, लेकिन दो-राज्य समाधान का समर्थन छोड़ा नहीं। क्या यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी नज़रिया है? शायद ऐसा ही है। मोदी समर्थक इसे राष्ट्रीय हितों से जुड़ा मानते हैं। उनका मानना है कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को नैतिकता और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाना होगा। अगर मोदी की यही नीति जारी रही, तो भविष्य में इसराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी से दोनों देशों को बड़ा फ़ायदा होगा लेकिन फ़लिस्तीन के साथ भारत का ऐतिहासिक बंधन और कमज़ोर हो जाएंगे। विदेश मामलों के ज्यादातर जानकारों का मानना है कि भारत की विदेश नीति बहुपक्षीय होनी चाहिए। ऐसी नीति जहां फ़लिस्तीन के अधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता मुखर होकर सामने आए और इसराइल की सुरक्षा का भी सम्मान हो।