गांधी विचार के विरोधियों ने जिस तरह से गांधी के शरीर की हत्या की थी उसी तरह से लोकतंत्र के विरोधियों ने लोकतंत्र के शरीर की हत्या कर दी। हालांकि यह बात नेता प्रतिपक्ष और दूसरे तमाम पत्रकार और पूर्व अधिकारी लंबे समय से कह रहे थे लेकिन ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार की व्यवस्थित खोजी रपट के बाद शीशे की तरह साफ हो गई है। नेता प्रतिपक्ष का यह सवाल बहुत वाजिब है कि लोकतंत्र में नेताओं की लोकप्रियता घटती बढ़ती रहती है और ऐसा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समेत सभी नेताओं के साथ हुआ। यहां तक कि महात्मा गांधी जैसे कालजयी नेता भी विभाजन के बाद अपनी घटती लोकप्रियता के संकट से जूझ रहे थे। जहां लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकारें होती हैं और पारदर्शी तरीके से जनमत बनाया जाता है और चुनाव होते हैं वहां एक अवधि के बाद बेहद लोकप्रिय नेता और उसकी पार्टी भी अलोकप्रिय हो जाती है और चुनाव हार जाती है।
ऐसा राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रांतीय स्तरों तक तब से होता रहा है जब से भारतीय लोकतंत्र कायम हुआ। ऐसा दुनिया के सभी लोकतंत्रों को बारे में कहा जा सकता है। इसी को एंटीइनकमबेंसी कहते हैं। ऐसा भारतीय जनता पार्टी के पहले के शासनों में भी हुआ करता था। जब अल्पमत की बहुदलीय सरकार चला रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने इंडिया शाइनिंग के आधार पर चुनाव जीतने की योजना बनाई तो वे विफल रहे। लेकिन ऐसा क्या हो गया कि अब नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता के विरुद्ध किसी तरह का एंटी इनकमबैंसी काम ही नहीं कर रही है। और उनके सहयोगी दावा कर रहे हैं कि अगले तीस सालों तक हमें कोई सत्ता से उतार ही नहीं सकता। अब भाजपा के कार्यकर्ताओं को महज जीत जीत ही दिखाई पड़ेगी।
वास्तव में यह एक किस्म का चुनावी नियतिवाद है जो लूटप्रियता और लूटतंत्र के माध्यम से भारतीय समाज और लोकतंत्र पर थोपा दिया गया है। इस लूटप्रियता के बारे में पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक मुहावरा चलता है—थोर करैं काली माई, ढेर करैं किर्तनियां। यानी नेता अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए उतना नहीं करता जितना उसके चारों ओर बना हुआ व्यवस्थित तंत्र करता है। मौजूदा निजाम ने वह तंत्र अच्छी तरह से बना लिया है। वे किसी एक रणनीति पर स्थिर नहीं रहते। बल्कि उसे बदलते रहते हैं। वे कभी दिखाते हैं कि देखो हमने जो वादा किया था वह पूरा कर दिया, इसलिए जनता हमें विकल्पहीन मान रही है।
वे कभी अपनी विचारधारा को राष्ट्रवाद और देशभक्ति से जोड़कर ऐसा प्रस्तुत करते हैं जैसे कि जनता ने उसी को आत्मसात कर लिया है। कभी राम के नाम पर कभी श्याम के नाम पर, कभी हिंदू के नाम पर कभी सनातन के नाम पर और कभी मुसलमानों के नाम पर उनकी लोकप्रियता अपने शिखर पर हिलती डुलती जरूर है लेकिन वहां से उतरने को तैयार ही नहीं है। उनके कीर्तनियां मंडली मूड आफ इंडिया जैसे बार बार किए जाने वाले सर्वेक्षणों के माध्यम से ऐसा दर्शाती है जैसे कुछ भी हो जाए लेकिन जनता को हजारों साल बाद एक विलक्षण, ईमानदार और कर्मठ शासक मिला है, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहती।
लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने यह बता दिया है कि यह सारा खेल दरअसल मतदाता सूची में हेराफेरी और ईवीएम मशीन में जोड़तोड़ करके बहुत व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है। जब भी किसी एक ट्रिक पर लोगों की निगाह जाती है तो ट्रिक बदल दी जाती है। लेकिन लूटप्रियता और लूटतंत्र के माध्यम से लोकप्रियता का गुब्बारा सदैव हवा में उठाए ही रखा जाता है। बेचारा लोकतंत्र इस बलि की बेदी पर सौ सौ बार कुर्बान किया जाता है और लूटप्रियता में डूबी हुई जनता उफ तक नहीं करती। बल्कि और जोर से झांझ बजाती रहती है यह सोच कर कि कुछ न कुछ प्रसाद तो मिलेगा ही।
वास्तव में लूटप्रियता में यकीन करने वालों का दर्शन यह है कि प्रेम, युद्ध और चुनाव में सब कुछ जायज है। कुछ लोग तो चुनाव को विश्व युद्ध मानते हैं। वह यह भी मानते हैं कि लोकतंत्र नेता के लिए, नेता के द्वारा और नेता का होता है। लोकतंत्र में जनता नेता नहीं बनाती और न ही चुनती है बल्कि नेता अपनी जनता चुनता है और अपना राष्ट्र चुनता है। वह जिसे राष्ट्र का हित बताता है, वही राष्ट्र का हित होता है और जिसे राष्ट्र की सीमा बताता है, वही सीमा होती है और जिसे राष्ट्र का दुश्मन बताता है वही दुश्मन होता है।
लूटप्रियता का दर्शन यह भुला देता है कि लोकतंत्र जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता का होता है। लूटप्रियता के दर्शन को इस बात से कोई लेना देना नहीं कि संवैधानिक लोकतंत्र साधन की पवित्रता में यकीन करता है और वह उचित साधनों के माध्यम से बिना खून खराबे के सत्ता परिवर्तन का सिद्धांत है।
हमें समझना होगा कि लूटप्रियता का यह दर्शन रचा किन लोगों ने है। इसकी एक झलक हम राहुल गांधी की उस प्रेस कांफ्रेंस में देख सकते हैं जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सर संघचालक और मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ देश और दुनिया के दो जाने माने पूंजीपतियों को भी रखा था। वास्तव में लूटप्रियता का यह दर्शन पूंजीवाद और हिंदुत्व के गठजोड़ से निर्मित हुआ है और राज्य की संस्थाएं उसकी चेरी के तौर पर काम कर रही हैं। इस बीच में संविधान कभी कभी विधवा प्रलाप की तरह से अपनी व्यथा व्यक्त कहता है लेकिन न्यायपालिका से लेकर राज्य की दूसरी संस्थाएं उस पर गौर नहीं करतीं। जनता उस संविधान को संपूर्ण रूप से समझने के बजाय अंधों के गांव में गए हाथी की तरह महसूस करती है। किसी को अपने जातिगत आरक्षण से मतलब है तो किसी को धर्म की आजादी से और किसी को अपनी व्यापार करने की आजादी से। लेकिन संविधान की मूल भावना और उसके पीछे नब्बे साल तक चले स्वाधीनता संग्राम से ज्यादातर लोगों का कुछ लेना देना नहीं है।
संविधान नागरिकों के घर में बिन बुलाए मेहमान की तरह से पड़ा हुआ है। लोग कहते भी हैं कि संविधान हमारा सगा रिश्तेदार थोड़े ही है। अब तो लूटप्रियता को मानने वालों ने समझ लिया है कि संविधान उस अहिंसक गांधीवाद की तरह से है जिसे जब चाहो शरीर की हत्या कर दो और जब चाहो उसकी आत्मा को कैद कर लो। क्योंकि वह जनता और दलों को छोड़कर चंद अदालतों, कुछ सेमिनारों और शैक्षणिक व सामाजिक संस्थाओं में बीमार पड़ा हुआ है। लेकिन संविधान नामक बूढ़े चौकीदार और उसके बहाने जागते रहो जागते रहो की एक लोकतांत्रिक आवाज न गूंजें इसके लिए भी वैचारिक और व्यावहारिक इंतजाम किए जा रहे हैं। दो साल पहले गुजरे भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार विवेक देवराय ने कहा भी था कि भारत में लोकतंत्र बहुत अधिक हो गया है और इतने लोकतंत्र में कोई देश आर्थिक तरक्की नहीं कर सकता। अगर भारत को आर्थिक तरक्की करनी है तो लोकतंत्र पर अंकुश लगाना होगा और इस संविधान को हटाना होगा। क्योंकि कहीं भी संविधान की आयु 25-30 साल से अधिक नहीं होती।
उनके इस बयान पर बहुत बवाल मचा था और सरकार ने उसे उनका निजी विचार कहा था। लेकिन बाद में प्रधानमंत्री ने किसानों के लिए आंदोलनजीवी शब्द कह कर यह साबित कर दिया था कि उनकी सोच भी उनसे मिलती है। हाल में उस सोच को उन्होंने लाल किले से दिमागी नक्सल कह कर नया आयाम दिया और उसी के चलते देश में स्वतंत्र भारद्वाज जैसी प्रतिभाओं का जन्म हो रहा है।
विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) ने अल्पसंख्यकों, महिलाओं और गरीब वर्ग का तो नुकसान किया है, उसने सबसे अधिक नुकसान जेन जी यानी युवा पीढ़ी का किया है। फार्म 6 दरअसल नए लोगों को ही मतदाता सूची में प्रवेश दिलाने का पासपोर्ट है। उसमें परिवर्तन करके माता पिता और दादा दादी की मतदाता सूची मांग कर चुनाव आयोग ने उनके मतदाता बनाए जाने के सहज मार्ग को बंद कर दिया है।
स्पेशल समरी रिवीजन यानी विशेष त्वरित संशोधन की जो प्रकिया 1958 से चल रही है जिसके तहत नए लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया जाता था उसे रोक दिया गया है। ईसीआई नेट नामक केंद्रीकृत डाटा प्रणाली ने तानाशाही के हाथ में ईवीएम के बाद दूसरा बड़ा औजार दे दिया है। आगे आने वाले समय में जब एआई के माध्यम से बहुत सारी चीजें संचालित होंगी तब चुनाव, न्याय और प्रशासन में कितनी बड़ी धांधली होगी इसकी महज कल्पना ही की जा सकती है।
जाहिर है कि जिस तरह गांधी के शरीर की हत्या की गई थी वैसे ही लोकतंत्र के शरीर की हत्या में हिंदुत्व, पूंजीवाद और प्रौद्योगिकी ने सांठगांठ कर ली है। गांधी को मारने के लिए बरिटा नामक पिस्तौल लाई गई थी तो लोकतंत्र के लिए धर्म, पूंजी और प्रौद्योगिकी है। यह प्रौद्योगिकी ऊपर के स्तर पर ईवीएम और ईसीआई नेट के रूप में है और नीचे के स्तर पर,एके 47, बुलडोजर, करंट मारने वाले डंडे और पैलेट गन के रूप में। लेकिन लोकतंत्र भी भावना इस देश में मरी नहीं है जैसे कि गांधी का शरीर चला गया लेकिन उनका विचार किसी न किसी रूप में जिंदा रहा और उनके हत्यारों को लंबे समय तक सत्ता से दूर रहना पड़ा। देखना है लूटप्रियता के दर्शन और एक्शन से देश कैसे लड़ता है।