डोनाल्ड ट्रम्प जब भी कोई नया विचार पेश करते हैं, दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में हलचल मच जाती है। इस बार उनका प्रस्ताव है—“बोर्ड ऑफ़ पीस।” नाम सुनकर लगता है कि यह कोई गंभीर संस्था होगी, लेकिन असल में यह शांति का मंच नहीं, सौदेबाज़ी का अखाड़ा है। सदस्यता की कीमत है एक अरब डॉलर प्रति देश। यानी शांति अब सब्सक्रिप्शन पर मिलेगी।  

इतिहास में देखें तो लीग ऑफ़ नेशंस 42 देशों से शुरू हुई थी। संयुक्त राष्ट्र ने 51 देशों के साथ शुरुआत की। ट्रम्प का बोर्ड सीधे 60 देशों से शुरू हो रहा है और वह भी 60 अरब डॉलर के निवेश के साथ। इससे बड़ा क्लब दुनिया ने कभी नहीं देखा। सवाल यह है कि क्या यह क्लब शांति का रक्षक बनेगा या काँच की दुकान में बैल की तरह सब कुछ तोड़ देगा।

काँच की दुकान का रूपक यहाँ बिल्कुल सटीक बैठता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ नाज़ुक होती हैं। नियम, परंपराएँ, समझौते- सब काँच के बर्तनों की तरह। इन्हें संभालकर रखना पड़ता है। ट्रम्प का अंदाज़ है कि दुकान में घुसो और बैल की तरह धावा बोल दो। बर्तन टूटेंगे, आवाज़ होगी, और वह गर्व से कहेंगे- देखो, मैंने बदलाव कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दशकों से आलोचना झेल रही है। स्थायी सदस्यता का ढांचा पुराना हो चुका है। भारत, जापान, जर्मनी, ब्राज़ील जैसे देश लंबे समय से सुधार की मांग कर रहे हैं। लेकिन सुधार का रास्ता कठिन है। ट्रम्प ने इस कठिनाई को शॉर्टकट से बदलने की कोशिश की- पैसा दो और सदस्य बन जाओ। यह विचार उतना ही खतरनाक है जितना हास्यास्पद।

भारत के सामने दुविधा है। शामिल हों तो स्वायत्तता खोने का खतरा। बाहर रहें तो अलग‑थलग पड़ने का डर। लेकिन इतिहास हमें बताता है कि हमारी ताक़त हमेशा संवाद और बहुलता में रही है। अशोक ने हिंसा छोड़कर सहिष्णुता का रास्ता चुना। अकबर ने सुलह‑ए‑कुल का सिद्धांत दिया। गांधी ने स्वराज को नैतिक शासन के रूप में देखा। इन सबका संदेश यही था—शांति खरीदी नहीं जाती, गढ़ी जाती है।

ट्रम्प की राजनीति का असली मज़ा उनके विरोधाभासों में है। वह कहते हैं कि दुनिया को शांति चाहिए, लेकिन शांति का टिकट बेचते हैं। वह कहते हैं कि संस्थाएँ कमजोर हैं, लेकिन खुद हर संस्था को कमजोर करते हैं। वह कहते हैं कि अमेरिका नेतृत्व करेगा, लेकिन नेतृत्व को नीलामी में बदल देते हैं।

दुनिया इस तमाशे को देख रही है। सहयोगी देशों को समझ नहीं आता कि अमेरिका पर भरोसा करें या नहीं। विरोधी देशों को मौका दिखता है। चीन धैर्य से अपनी चालें चल रहा है। बेल्ट एंड रोड पहल के ज़रिए उसने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में जाल बिछा दिया है। उसका तरीका बैल जैसा नहीं है। वह अजगर की तरह धीरे‑धीरे कसता है। जब तक शिकार समझे, तब तक निकलना असंभव हो जाता है।

रूस का खेल अलग है। व्लादिमीर पुतिन अनुभवी खिलाड़ी हैं। उन्हें पता है कि सीधी भिड़ंत महँगी पड़ती है। इसलिए वह असीमित युद्ध करते हैं- साइबर हमले, दुष्प्रचार, ऊर्जा का दबाव। उनका मक़सद है लोकतंत्रों को भीतर से खोखला करना। ट्रम्प का अमेरिका जब खुद ही लड़खड़ा रही है, पुतिन को बस इंतज़ार करना है।

यह सब देखकर सवाल उठता है- क्या लोकतंत्र इतने मज़बूत हैं कि ट्रम्प जैसे बैल को काबू कर सकें? अब तक तो संस्थाएँ कोशिश करती रही हैं- न्यायपालिका, प्रेस, संसद। लेकिन कोई भी उन्हें रोक नहीं पाया। असल में लोकतंत्र ही उन्हें रोक सकता है। अगर अमेरिकी लोकतंत्र जागा, तो बैल को काबू किया जा सकता है। अगर नहीं, तो काँच की दुकान टूटती रहेगी।

दुनिया एकजुट होकर इसका सामना कर सकती है। लेकिन यह संभावना कम है। हर देश अपनी सुविधा देखता है। गठबंधन टूटते हैं। एकता सबसे पहले बलि चढ़ती है। चीन अपना बड़ा खेल खेल रहा है। रूस अपनी चालाकी में लगा है। यूरोप बँटा हुआ है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका अपने संकटों में उलझे हैं। ऐसे में वैश्विक मोर्चा बनना मुश्किल है।

भारत को अपनी राह खुद चुननी होगी। हमें यह तय करना होगा कि शांति का बोर्ड हमारी गरिमा बढ़ाएगा या घटाएगा। हमें यह याद रखना होगा कि हमारी ताक़त हमेशा बहुलता और संवाद में रही है। अशोक, अकबर, गांधी- सबने यही कहा कि शांति खरीदी नहीं जाती, गढ़ी जाती है।

ट्रम्प की बैल वाली कूटनीति दुनिया को चोट पहुँचा सकती है। लेकिन यह लोकतंत्रों को अपनी ताक़त याद दिलाने का मौका भी देती है। सवाल यह नहीं है कि भारत या अमेरिका बढ़ेंगे या नहीं। सवाल यह है कि क्या वे बढ़ते हुए अपनी आत्मा बचा पाएँगे।

काँच की दुकान अभी भी खतरे में है। बैल दौड़ रहा है। बर्तन टूट रहे हैं। और हम सब देख रहे हैं। शायद यही समय है जब लोकतंत्र को अपनी असली ताक़त दिखानी होगी। वरना इतिहास हमें बताएगा कि हमने बैल को रोकने की कोशिश ही नहीं की।
(लेखक सतीश झा ने भारत में वन लैपटॉप पर चाइल्ड की शुरुआत की थी और वर्तमान में विद्याभारती फाउंडेशन ऑफ अमेरिका के बोर्ड पर हैं। वे भारत में लगभग 27,000 छात्रों को वन टैबलेट पर चाइल्ड (OTPC), पिंगल STEM प्रोग्राम और डिजिटल लर्निंग इकोसिस्टम के ज़रिए इंटरैक्टिव कक्षाओं में सहयोग देते हैं।)