रिजीम चेंज यानी सत्ता बदलने की मांग को लेकर आंदोलन करने वाले जेन जी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक नया फ़रमान जारी किया है। आंदोलन हिंसक होने पर सरकारी नौकरी के दरवाजे बंद हो सकते हैं।नए आदेश के मुताबिक अब पुलिस से प्रमाण पत्र मिले बिना सरकारी नौकरी में स्थायी नियुक्ति नहीं हो सकती है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनावों के ठीक पहले इस आदेश का क्या मतलब है ? नीट परीक्षा में धांधली, एस आई आर में गड़बड़ी जैसे मुद्दों पर मजबूत आंदोलन के बाद जेन जी इन दिनों रिजीम चेंज का नारा दे रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन का भी अब यही नारा है। इंडिया गठबंधन के साथ भी युवा वर्ग प्रदर्शनों में शामिल हो रहा है। क्या इन आंदोलनों में शामिल युवा उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरियों से वंचित रखे जायेंगे?
पुराने आदेश पर नया ठप्पा
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों के लिए कैरेक्टर वेरिफिकेशन (चरित्र सत्यापन) के नियमों को सख्त करते हुए एक नया आदेश जारी किया है। इसके तहत हिंसक प्रदर्शनों या “रिजीम चेंज” (सत्ता/व्यवस्था परिवर्तन) के उद्देश्य से हिंसा करने वाले लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है। यह आदेश 29 अक्टूबर 2026 को नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज द्वारा जारी किया गया। यह राज्य सरकार के विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती पर लागू होता है।
इसकी मुख्य बातों पर गौर कीजिए।
- - जो व्यक्ति ऐसे संगठन के सदस्य हैं, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसा के जरिए मौजूदा सामाजिक/राजनीतिक व्यवस्था को बदलना है, उन्हें सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जाएगा।
- - 21 साल की उम्र पूरी करने के बाद और सत्यापन की तारीख से तीन साल के अंदर ऐसी गतिविधियों में भाग लेना इस बात का प्रमाण माना जाएगा कि व्यक्ति अभी भी सक्रिय है। जब तक व्यवहार में बदलाव का ठोस सबूत न मिले तब तक वो किसी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
- -हालांकि इस आदेश में ये भी कहा गया है कि सिर्फ राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। केवल एफ आई आर दर्ज होना या जांच लंबित रहना अपने आप में अयोग्यता का आधार नहीं माना जाएगा लेकिन पुलिस सत्यापन अनिवार्य होगा।
- - हत्या, बलात्कार, डकैती, पेपर लीक, सॉल्वर गैंग, आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में शामिल लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी।
- - संवेदनशील पदों पर विस्तृत जांच अनिवार्य होगी। कुछ मामलों में अनंतिम (प्रोविजनल ) नियुक्ति हो सकती है।लेकिन पुलिस की जाँच के बाद ही नियुक्ति को स्थायी किया जाएगा।
- - यह भी कहा गया है कि पहले से नौकरी कर रहे कर्मचारियों पर यह लागू नहीं होगा।
नेपाल, बांग्लादेश का डर
सवाल ये है कि सरकार को इस वक्त यह आदेश इस समय जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी? जहां तक कैरेक्टर वेरिफिकेशन (चरित्र सत्यापन) और पुलिस वेरिफिकेशन का सवाल है तो इसके लिए कानून पहले से ही मौजूद है। क्या यह कदम हाल के प्रदर्शनों में “रिजीम चेंज” की मांग से डर कर उठाया गया है।क्या सरकार इन प्रदर्शनों से डर गयी है। नीट परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। लेकिन छात्र युवा आंदोलन इसके बाद भी रुका नहीं। एस आई आर में धांधली को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़ा की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया। और उसके बीच ही रिजीम चेंज यानी सरकार बदलने की मांग उठने लगी है।
बी जे पी के कई नेता आरोप लगाते रहे हैं कि भारत में भी नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका की तरह छात्र युवा आंदोलन के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की कोशिश की जा रही है। दुनिया के कई देशों में छात्र युवा आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोला। लोकतंत्र में इस तरह के आंदोलन को ग़लत नहीं कहा जा सकता है। आख़िर इन देशों में छात्र और युवा आंदोलन के लिए मजबूर क्यों हुए। सभी जगह एक जैसी समस्या दिखाई देती है। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं छात्र - युवा आक्रोश का मुख्य कारण बनती हैं। क्या भारत में ये समस्याएं मौजूद नहीं हैं।
हिंसक रिजीम चेंज
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों के लिए कैरेक्टर और एंटेसिडेंट्स (पूर्ववर्ती आचरण) की जाँच का प्रावधान 1958 के एक सरकारी आदेश से चला आ रहा है। इसमें उम्मीदवार का चरित्र सरकारी सेवा के लिए उपयुक्त है या नहीं, इसकी जांच की जाती है।लगभग सभी सरकारी भर्तियों (केंद्र और राज्य) में पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य रहा है। इसमें आपराधिक रिकॉर्ड, एफ आई आर , अदालत से सजा आदि की जाँच होती है। पुराने नियमों में भी गंभीर अपराधों (हत्या, बलात्कार आदि) में शामिल उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराया जा सकता था। नए आदेश में “हिंसक रिजीम चेंज”, पेपर लीक, सॉल्वर गैंग जैसे प्रावधान जोड़े गए हैं।
जांच को 30 दिनों में पूरा करने का निर्देश दिया गया है। सिर्फ एफ आई आर होने या जांच लंबित रहने से पहले भी आमतौर पर स्वतः अयोग्यता नहीं होती थी। अब इसे और स्पष्ट कर दिया गया है।इस आदेश में बताया गया है कि हिंसक तरीके से व्यवस्था बदलने की नीति पर चलने वाले संगठनों से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। ऐसी कौन सी संस्थाएं अब बची हैं। सरकार ने ख़ुद एलान किया है कि देश से नक्सलवादियों का सफाया कर दिया गया है। तो फिर बचा कौन?
बी जे पी की रणनीति
जब पुलिस जांच का नियम पहले से मौजूद है तो इस समय नए आदेश की जरूरत क्यों पड़ी? जे एन यू के प्रोफेसर अजय गुटवर्थी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियां हैं कहां? कुछ समय पहले चपरासी के 350 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकला तो करीब 22 लाख युवकों ने आवेदन कर दिया। करीब 650 पी एच डी युवकों ने भी इसके लिए आवेदन किया। इससे जाहिर होता है कि सरकारी नौकरी की क्या स्थिति है। उनका कहना है कि ये आदेश जेन जी प्रदर्शनों के डर से किया गया लगता है। बी जे पी पहले से ही “ आंदोलन जीवी “ और “दिमाग़ी नक्सल” जैसे मुहावरे गढ़ रही है। उत्तर प्रदेश सरकार का नया आदेश उसकी ही एक कड़ी लगती है। सरकार बेरोजगारी की समस्या को सुरक्षा की समस्या से जोड़ने की कोशिश कर रही है। साफ़ संकेत दिया जा रहा है कि बी जे पी और आर एस एस नेटवर्क में शामिल लोगों को ही सरकारी नौकरी और अन्य सुविधाएं मिलेंगी।
विपक्ष का रुख
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने कहा कि ऐसे आदेश ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में जारी होते थे। स्वतंत्र भारत में विरोध का अधिकार संवैधानिक गारंटी है। सत्ता परिवर्तन चुनावों के जरिए कानूनी प्रक्रिया से होता है। उन्होंने सरकार पर “डराने-धमकाने वाली मानसिकता” का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता राशिद अलवी ने कहा कि सरकार खुद जज बन रही है और जेन जी के प्रदर्शनों से डर रही है। कांग्रेस पार्टी की उत्तर प्रदेश अध्यक्ष आरधना मिश्रा ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर इसका असर नहीं होना चाहिए।