ईरान के इसी जहाज को भारतीय उपमहाद्वीप के जल क्षेत्र में डुबोया गया।
पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध में भारत की भूमिका ने यह दर्शा दिया है कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान बहुत कमजोर हो चुका है। ऐसा नहीं कि यह कमजोरी पिछले बारह वर्षों के दौरान ही आई है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इन दो दशकों ने उसे संस्थागत रूप दे दिया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसकी हिंदुत्व की विचारधारा के प्रभाव में डबल और ट्रिपल इंजन की राष्ट्रीय और प्रांतीय सरकारें राष्ट्रीय सुरक्षा, आक्रामक विदेश नीति और भारत-बोध का दिखावा तो खूब करती हैं लेकिन हकीकत में जब कोई मौका आता है तो वे या तो खामोश हो जाती हैं या किसी विश्व शक्ति के समक्ष संप्रभुता और स्वाभिमान को गिरवी रखती हुई नजर आती हैं। निश्चित तौर पर ऐसा होने में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का भी योगदान होता है लेकिन अगर राजनीतिक दलों और जाग्रत समाज के भीतर वास्तव में भारत-बोध और राष्ट्रीय स्वाभिमान हो तो इसे हर स्थिति में बचाया और दर्शाया जा सकता है।
भारत के नेतृत्व ने जिस तरह ईरान पर हमले के ठीक दो दिन पहले, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नरसंहार के अपराधी घोषित, इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के साथ मैत्री का प्रदर्शन किया और वहां की संसद नेसेट का सम्मान ग्रहण किया उससे यह पता चलता है कि हम अपने देश को अंतरराष्ट्रीय अपराधी समूहों की सेवा में समर्पित करने को तैयार हैं। क्या भारत का वास्तविक हित या भारत का स्वाभिमान ऐसा करने की इजाजत देता है? शायद नहीं। अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर हमला, वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और सैन्य अधिकारियों की हत्या और फिर 165 स्कूली बच्चों का नरसंहार यह सब ऐसी घटनाएं हैं जिन पर भारत जैसे महान देश की चुप्पी भारत ही नहीं पूरी दुनिया को आहत करती है।
भारत की चुप्पी उस समय भी अखरती है जब भारत की मेजबानी से लौट रहा ईरान का नौसैनिक बेड़ा आइरिस डेना भारतीय सामुद्रिक सीमा के ठीक पार हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा डुबो दिया जाता है। उस बेड़े के बचे हुए सैनिकों की मदद करने का साहस श्रीलंका जैसा छोटा सा द्वीप राष्ट्र करता है और भारत के बौद्धिक और नीति निर्माता यह साबित करने में लगे रहते हैं कि भारत की कोई जवाबदेही नहीं थी। भारत का आहत स्वाभिमान उस समय भी प्रदर्शित होता है जब हार्मुज जलडमरूमध्य से तेल के परिवहन को ईरान द्वारा रोक दिए जाने के बाद भारत अमेरिका से याचना करता है कि उसे खाड़ी देशों से अलग रूस से तेल खरीदने की इजाजत दी जाए।
उस इजाजत की भाषा सुनकर किसी भी स्वाभिमानी भारतवासी का सिर शर्म से गड़ सकता है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट भारत को रूस से तीस दिन के लिए तेल खरीदने की इजाजत दिए जाने का एलान करते हैं। वे कहते हैं कि यह एक किस्म की तात्कालिक व्यवस्था है इससे ईरान की पाबंदी से पैदा हुआ तनाव कम होगा और रूस को कोई विशेष लाभ नहीं होगा। पिछले साल यानी अगस्त 2025 में अमेरिका ने रूस से तेल आयात करने के अपराध में भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त कर लगा दिया था और इस तरह भारत के सामानों के आयात पर अमेरिका द्वारा लगाए गए कुल कर की सीमा 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। बाद में जब भारत ने रूस से तेल न लेने का वायदा किया और व्यापार समझौते का एलान होने लगा तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक्स अकाउंट ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि भारत के प्रधानमंत्री ने रूस से तेल लेना बंद कर दिया है और अब वह अमेरिका और वेनेजुएला से तेल लेगा। कुल मिलाकर भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए संप्रभु नहीं है। उसका निर्णय अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी हितों के लिहाज से लेते हैं।
हमारे राष्ट्रीय नीति निर्माता, भारत बोध पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करने वाले, सुबह पार्कों में लाठी भांजने वाले और इसराइल को पितृभूमि और अमेरिका को पुण्यभूमि मानने वाले मध्यवर्गीय लोग कह सकते हैं कि भारत ने हफ्ते भर बाद ही सही लेकिन अपने विदेश सचिव को ईरानी दूतावास भेजा तो, भारतीय नौसेना ने ईरानी बेड़े की खामोश मदद की तो थी। भारतीय विदेश मंत्री ने ईरानी विदेश मंत्री से बाद तो की। वे यह भी कह सकते हैं कि अब भारत और क्या करे क्या युद्ध में कूद पड़े जबकि भारत के लाखों लोग उन खाड़ी देशों में फंसे हैं जहां पर ईरान हमले कर रहा है। वे मध्ययुग में आए ईरान के आक्रांताओं की कहानियां चला रहे हैं ताकि भारत के हिंदुत्ववादी लोग खुश हो सकें कि देखो कैसे अमेरिका और इसराइल मिल कर ईरान से नादिरशाह का वह ऐतिहासिक बदला ले रहे हैं।
लेकिन हर वाक्य में पांच बार राष्ट्र राष्ट्र उच्चरित करने वाले यह लोग भूल जाते हैं कि कोई भी स्वाभिमान अपने समय में कायम होता है। वह अतीत के गौरवगान से नहीं बनता और न ही भविष्य के खोखले दावों से। वह सिर्फ विपक्षी नेताओं और अपने नेहरू जैसे पुरखों को गालियां देने से भी नहीं बनता।
अगर आप अपने समय में शुतुरमुर्ग की तरह तूफान से बचने के लिए रेत में गर्दन डाले हुए हैं तो उस कायरता का बचाव अतीत की वीर गाथाओं से नहीं किया जा सकता। वास्तव में संघ परिवार की वैचारिकी ऐतिहासिक हीनता ग्रंथियों से निकली है। वह हीनता ग्रंथि से उबरने और राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने की निकट अतीत की सबसे शानदार विरासत को बांटना और नकारना चाहती है। वह उससे कोई सबक सीखना नहीं चाहती। हमारे प्रधानमंत्री ने इस हीनता ग्रंथि का प्रदर्शन उस समय भी किया था जब 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस पर भारत के विशिष्ट अतिथि बने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना नाम लिखा हुआ दस लाख का सूट पहन कर उनका स्वागत किया था। उस पर ओबामा की टिप्पणी मजाक उड़ाने वाली थी।
ध्यान देने की बात है कि भारत के स्वाभिमान को जगाने वाले और यूरोपीय सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहने वाले महात्मा गांधी ने सारे प्रोटोकाल को धता बताते हुए 5 नवंबर 1931 को ब्रिटिश सम्राट किंग जार्ज पंचम से बकिंघम पैलेस में लंगोटी पहनकर मुलाकात की थी। और बातचीत में न सिर्फ राष्ट्रीय आंदोलन की गरिमा प्रदर्शित की थी बल्कि बाद में पत्रकारों से यह भी कहा था कि आप के बादशाह ने हम सब के कपड़े पहन रखे हैं। वही गांधी जो कि वर्धा-सेवाग्राम की झोपड़ी से बकिंघम पैलेस को चुनौती देते थे। यह था अहिंसक राष्ट्र का स्वाभिमान जिसमें गुलामी का प्रतिकार था, प्रतिपक्षी को वैचारिक चुनौती थी, लेकिन उसके प्रति नफरत नहीं थी। वही अहिंसक स्वाभिमान जिसमें हिटलर को पत्र लिखने का साहस भी था।
उसी अहिंसक राष्ट्रीय स्वाभिमान का विस्तार करते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1950-53 के खूनी कोरियाई युद्ध को रुकवाया था। 1954 में चीन और वियतनाम के संघर्ष को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण आयोग की अध्यक्षता की थी और 1960-64 के बीच कांगो युद्ध रुकवाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में वहां तैनात शांति सेना में अपना योगदान दिया था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी उसी अहिंसक राष्ट्रीय स्वाभिमान का विस्तार था। वे बर्टेंड रसेल और आइंस्टीन के साथ विश्व शांति के अभियान में लगे भी हुए थे। यह सही है कि 1954 में भारत ने चीन के साथ जिस पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए थे उसे 1962 में चीन ने खंड खंड कर दिया लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन ने जिस तरह का राष्ट्रीय स्वाभिमान विकसित किया था उसका लाभ दुनिया के कम से कम सौ देशों को मिला।
आज दुनिया जटिल स्थिति में फंस चुकी है। अमेरिका और इसराइल ने संयुक्त राष्ट्र के महत्त्व को खंडित कर दिया है और रूस जैसे देशों ने भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी है। निश्चित तौर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण ने भी राष्ट्रीय संप्रभुताओं को पिछले तीस सालों में कमजोर किया है। लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि आज भी दुनिया को एक विश्व व्यवस्था की जरूरत है जो राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता दे सके। वह काम पूंजीवाद और उसका जुड़वां भाई साम्राज्यवाद किसी भी कीमत पर नहीं कर सकते। उसके लिए दुनिया को बांटने और राज करने वाली अमेरिका और यूरोप की दृष्टि से काम चलने वाला नहीं है। न ही वह काम हथियारों और युद्ध के बूते होगा। वह काम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से भी नहीं होगा। वह काम वैश्विक लोकतंत्र को कायम करने वाली एक वैश्विक संस्था से हो सकता है और वह संस्था कुछ खास देशों के लिए वीटो देने वाली न होकर वैश्विक प्रतिनिधित्व वाली होनी चाहिए। मानवीय गरिमा और मानवता के भविष्य के लिए चिंता करने वालों को शांति और अहिंसा के इस काम में लगना ही होगा।