मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि दरअसल यह आंदोलन शुरू होने के पहले ही खत्म हो गया। इसलिए क्योंकि जिस संगठन ने सिर्फ पांच दिन के अंदर 2 करोड़ लोगों को अपने अकाउंट से जोड़ा, वह वाकई में अपने आप में एक जबरदस्त घटना थी। एक ऐसी सनसनीखेज घटना थी जिसके बारे में लोगों ने पहले कभी नहीं सुना था। इतने कम समय में इतने ज्यादा फॉलोअर्स का सोशल मीडिया पर जुड़ना किसी दूसरी तरकीब से संभव नहीं है, जब तक कि लोग खुद उससे जुड़ना ना चाहें।

अन्ना आंदोलन से तुलना और शुरुआती संदेह

वैसे में जब उन्होंने कहा कि 6 जून को वे दिल्ली पहुंचेंगे और दिल्ली पहुंचने के बाद जंतर-मंतर पर एक बड़ा आंदोलन या बड़ा प्रदर्शन करेंगे, तो लोगों को यह लगा कि शायद इस बार अन्ना आंदोलन की कोई पृष्ठभूमि दोबारा से शुरू हो या दोबारा से रिपीट हो। मुझे इस बारे में शुरू से ही थोड़ा सा संदेह था और इसलिए मैं एक तरीके से चुप था और कुछ कहने की स्थिति में नहीं था।

जंतर-मंतर पर भीड़ का आकलन

लेकिन आज जब सुबह से इस पर मेरी नजर गई और मैंने यह देखा कि वहां चंद दो-चार सौ लोग ही इकट्ठा हैं, अगर हजार लोग भी मान लें, जिसमें से ज्यादातर लोग यूट्यूबर्स हैं और कुछ सुरक्षाकर्मी हैं। तो एक तरीके से आप मानकर चलें कि मैक्सिमम लोग जो वहां जुड़े हैं, वे तकरीबन 400 या 500 लोग ही होंगे, जिनमें बहुत बड़ी संख्या यूट्यूबर्स की है।

सोशल मीडिया का क्रेज बनाम फ्लॉप शो

एक कॉकरोच जनता पार्टी, जिसने एक बड़ी सनसनी मचा दी थी और लोग अचानक उसके बारे में बात करने लगे थे, उसकी हवा निकल गई। कल भी मैं एक कार्यक्रम में था और वहां भी लोग सिर्फ इसी बारे में चर्चा कर रहे थे कि 6 तारीख को जब जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के लोग इकट्ठा होंगे तो कितनी भीड़ आएगी, किस तरीके के मुद्दे उठाए जाएंगे और क्या इसका कोई भविष्य अन्ना आंदोलन की तरह है या नहीं। तमाम तरीके की चर्चाएं और अटकलों का बाजार गर्म था, तरह-तरह की थ्योरीज दी जा रही थीं।

लेकिन जब वहां पर लोगों को मैंने आज देखा तो मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई और थोड़ी निराशा भी हुई। निराशा इस बात को लेकर हुई कि बड़े-बड़े दावे करने वाली बातें आखिर इस कदर फ्लॉप शो में क्यों बदल गई। 

और मैं जब इसे 'फ्लॉप शो' कह रहा हूं, तो थोड़ा दुखी अंदाज में कह रहा हूं; क्योंकि मेरा मानना यह है कि जन आंदोलन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं, कमजोर नहीं करते।

सरकार की अनुमति और खुफिया एजेंसियों का इनपुट

लेकिन मेरा माथा सुबह उस वक्त ठनका था जब यह पता चला कि अभिजीत दीपके, जो इसके फाउंडर हैं, जब एयरपोर्ट पर पहुंचे तो वहां पुलिस पहुंची और पुलिस ने खुद जाकर उनको कहा कि आपको आंदोलन करने की परमिशन दी जाती है। अब आप सोचिए, एक वह सरकार जो चार लोगों को जंतर-मंतर पर किसी तरीके की आंदोलन की परमिशन नहीं देती है, जो लोग वहां आंदोलन करने जाते हैं उन्हें जबरदस्ती उठाकर फेंक दिया जाता है। आपने वे तस्वीरें देखी थीं कि किस तरीके से बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ जब महिला पहलवानों ने आंदोलन किया था, तो उन्हें किस तरीके से घसीटकर उठाया गया था। कई सांसद जब प्रदर्शन करने जाते हैं तो पुलिस उनको बस में भर देती है। वह सरकार अचानक इतनी सदाशय, इतनी सहनशील, इतनी दयालु और इतनी उदार हो जाती है कि खुद ही जाकर उनको परमिशन दे रही है कि भाई आप जाकर आंदोलन करो!

अगर सरकार को जरा सा भी इस बात का अंदाजा होता कि दरअसल यह एक बड़ा आंदोलन हो सकता है और सरकार के खिलाफ एक बड़ी मुहिम बन सकती है, तो सरकार कभी भी इस आंदोलन को अनुमति नहीं देती। खुद जाकर अनुमति देने का सीधा सा अर्थ था कि सरकार को इससे किसी तरीके का कोई डर नहीं है। सरकार की जो खुफिया एजेंसियां हैं, उन्होंने इसकी तैयारी को लेकर जो कुछ भी इनपुट सरकार को दिए होंगे, उसके आधार पर सरकार पूरी तरह आश्वस्त थी कि इसका कोई बड़ा असर होने वाला नहीं है। सरकार ने सोचा- इन्हें करने दो, इनकी खुद ही अपने आप हवा निकल जाएगी, जो गुब्बारा फूला हुआ है वह अपने आप फट जाएगा। और मुझे लगता है कि अभी भयंकर गर्मी में भीड़ का इकट्ठा ना होना और कोई कंस्ट्रक्टिव चीज निकलकर ना आना इस बात का प्रमाण है कि यह आंदोलन शुरू होने के पहले ही एक तरीके से फ्लॉप शो साबित हो गया।

क्या आगे कुछ और करेंगे?

मुझे नहीं लगता कि इसका कोई बहुत ज्यादा भविष्य दिखाई पड़ रहा है। बार-बार इस आंदोलन की तुलना अन्ना के आंदोलन से की जाती है, लेकिन लोग इस बात को भूल जाते हैं कि अन्ना का आंदोलन एक बिल्कुल अलग तरीके का आंदोलन था। तीन ऐसे महत्वपूर्ण कारण हैं जिसकी वजह से यह कभी अन्ना का आंदोलन नहीं बन सकता।

'कॉकरोच' बनाम अन्ना आंदोलन

अन्ना के आंदोलन की शुरुआत दरअसल अरविंद केजरीवाल ने की थी और अभिजीत दीपके कोई अरविंद केजरीवाल नहीं हैं। अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन शुरू होने के पहले या जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू करने के पहले महीनों तक तैयारी की थी। देश भर के तमाम सोशल एक्टिविस्ट और सिविल सोसाइटी के लोगों को इकट्ठा करके एक टीम बनाई थी। ये वे लोग थे जिनका समाज में बहुत सम्मान था। खुद अरविंद केजरीवाल तब तक रमन मैग्सेसे अवार्ड जीत चुके थे। उनके साथ प्रशांत भूषण, श्री श्री रविशंकर, किरण बेदी और जस्टिस संतोष हेगड़े जैसे लोग थे, जो अपने-अपने फील्ड में बड़ी शख्सियतें थीं। वहां लंबी तैयारी थी, एक अच्छी टीम थी और एक बहुत वेल-डिफाइंड एजेंडा था, जिसे अरविंद केजरीवाल जैसा शख्स लीड कर रहा था, जिसे मैं मानता हूं कि वह एक 'जीनियस' हैं।

अन्ना आंदोलन के लिए जमीन तैयार थी

साल 2010-11 का जो समय था, वह ऐसा वक्त था जब पूरी दुनिया के अंदर 2008 की मंदी की वजह से एक सामाजिक और आर्थिक बेचैनी दिखाई पड़ रही थी। ट्यूनेशिया में 'जैस्मिन क्रांति' चल रही था जिसकी वजह से वहां के डिक्टेटर को हटना पड़ा। इजिप्ट (मिस्र) में तानाशाह होस्नी मुबारक को 26 साल बाद अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसके अलावा वेस्टर्न कंट्रीज में ऑस्ट्रेलिया से लेकर न्यूयॉर्क तक 'ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट' मूवमेंट चल रहा था। वह एक ऐसी पृष्ठभूमि थी जिससे लगता था कि जमीन आंदोलन के लिए पूरी तरह तैयार थी।

मीडिया की भूमिका

तब मीडिया की भूमिका बड़ी जबरदस्त थी। नेशनल मीडिया तब सरकार के कंट्रोल में नहीं था, वह स्वतंत्र था। उस स्वतंत्रता की वजह से सुबह से शाम तक उस आंदोलन को एक बड़े आंदोलन के तौर पर लगातार दिखाया गया। मीडिया का एक सहानुभूति पूर्ण रवैया था, जिसका असर यह हुआ कि पूरे देश के अंदर एक राष्ट्रवादी माहौल बन गया।

सीजेपी की प्लानिंग क्या?

आज की तारीख में ना तो मुझे इस आंदोलन में किसी तरीके की तैयारी दिखाई पड़ती है, ना कोई प्लानिंग दिखाई पड़ती है और ना ही सिविल सोसाइटी के बड़े लोगों के चेहरे दिखाई पड़ते हैं (सोनम वांगचुक या एक-दो लोगों को छोड़ दें)। और मीडिया तो पूरी तरीके से गायब है। ऐसे में इस आंदोलन की तुलना अन्ना आंदोलन से करना एक तरीके से अन्याय होगा। हां, छात्रों के अंदर एक नाराजगी है इसलिए युवा वहां इकट्ठा जरूर हुआ है, लेकिन अगर इसको ठीक से प्लानिंग करके किया गया होता तो शायद इसका कुछ इम्पैक्ट होता।
लेकिन जहां तक इस कॉकरोच आंदोलन का सवाल है, अगर मान लीजिए कि यहां अचानक 10,000 या 5,000 लोग इकट्ठा हो जाते, फिर वाटर कैनन चलता और पुलिस लाठीचार्ज करती, तब तो इसे दिखाना मीडिया की मजबूरी हो जाता। लेकिन जब वहां सिर्फ कुछ सौ लोग ही इकट्ठा हैं, तो जाहिर सी बात है कि मीडिया उसे क्यों कवरेज देगा? जितनी कौतूहल वश कवरेज देनी थी, उतनी उन्होंने दे दी। जब इनके आने और जाने से कोई फर्क ही नहीं पड़ने वाला है और ना ही कोई ऐसा इवेंट क्रिएट हो रहा है जिसमें कोई न्यूज़-वर्दीनेस हो, तो उसे उस तरीके से नहीं दिखाया गया।

अन्ना का आंदोलन जिस तरीके से हुआ था, उसमें रात में कैंडल लाइट मार्च होते थे और वह सिर्फ दिल्ली में नहीं, बल्कि देश के हर शहर में दिखाई देता था। उस समय भारत ने क्रिकेट का वर्ल्ड कप भी जीता था, तो उसका भी एक राष्ट्रवादी माहौल था। इसलिए मुझे अब इस कॉकरोच आंदोलन से कोई बहुत ज्यादा उम्मीद दिखाई नहीं देती।