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एनआरसी लिस्ट में जिनका नाम नहीं, उनका क्या होगा?

नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स यानी एनआरसी में जिन लोगों के नाम नहीं जुड़ पाएँगे, वे विदेशी घोषित कर दिए जाएँगे। लेकिन उसके बाद उनका क्या होगा? उनके लिए सरकार के पास क्या कोई कार्य योजना है? सरकार ने यह तो कहा है कि उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा। पर  क्या उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाएगा? क्या वे यहीं बने रहेंगे, बस उन्हें सरकारी सुविधाएँ नहीं मिलेंगी?

एनआरसी की इस सूची में उन लोगों के नाम होंगे, जिनके नाम पिछले साल 31 जुलाई को जारी एनआरसी सूची में नहीं था, न ही उसके बाद जाँच-पड़ताल करने के बाद जारी हुई सूची में था। ऐसे लोगों की तादाद तक़रीबन 42 लाख थी। 

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सरकार चुप है, पार्टी चुप है!

इन 42 लाख लोगों में से जिनके नाम इस बार भी छूट जाएँगे और एनआरसी फ़ाइनल सूची में शामिल नहीं किए जा सकेंगे, उनका क्या होगा, यह किसी को पता नहीं है। राज्य सरकार चुप है, केंद्र सरकार चुप है, भारतीय जनता पार्टी चुप है।
राज्य की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था असम साहित्य सभा ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें साहित्यकार और सिविल सोसाइटी के दूसरे गणमान्य लोग मौजूद थे। 

सरकार को चाहिए कि वह इन राज्यविहीन लोगों के भाग्य पर फ़ैसला करे क्योंकि उन्हें भी भारतीय संविधान के मुताबिक़ यहाँ सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।


असम साहित्य सभा

31 अगस्त के बाद क्या होगा?

जिन लोगों के नाम 31 अगस्त की सूची में शामिल नहीं होंगे, उन्हें इसकी छूट होगी कि वे 120 दिनों के अंदर फ़ॉरनर्स ट्राइब्यूनल्स में अपील करें। इनमें से जो लोग अदालत की लड़ाई हार जाएँगे, उन्हें असम समझौता 1985 के तहत दूसरे देश भेज दिया जाएगा।

इन्हें बांग्लादेश भेजेंगे?

लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि उन्हें किस देश भेजा जाएगा? यह सवाल भी उठता है कि यह काम कैसे होगा? समझा जाता है कि इनमें से ज़्यादातर लोग बांग्लादेश से आए हुए हैं। तो क्या उन्हें बांग्लादेश भेजा जाएगा? यह नामुमिकन है। बांग्लादेश उन्हें लेने से इनकार कर देगा और साफ़ तौर पर कह देगा कि ये लोग उसके नागरिक नहीं है। ढाका के ऐसा कहने में पूरा दम है। आप वर्षों या पीढ़ियों से अपने देश में रहने वाले को कैसे किसी दूसरे देश को लेने को कहेंगे? जिनका जन्म ही भारत में हुआ है, उन्हें आप कैसे  बांग्लादेश का नागरिक बता देंगे?
विदेशियों के ख़िलाफ़ लंबा आन्दोलन चलाने वाले असम स्टू़डेंट्स यूनियन का कहना है कि यदि विदेशियों की पहचान होने के बावजूद उनका नाम मतदाता सूची से नहीं काटा गया और उन्हें नहीं निकाला गया तो पूरा मामला ही बेकार साबित होगा।
सरकार ने 400 फ़ॉरनर्स ट्राइब्यूनल्स की स्थापना करने और 3,000 विदेशियों को बंदी शिविरों में रखने का फैसला किया है और शिविर बनाने शुरू कर दिए हैं। अब तक 6 शिविर बन चुके हैं और 1,145 लोगों को वहाँ रखा गया है।

पर क्या पूरे असम में 3,000 विदेशी ही होंगे? यदि 42 लाख लोगों में से कुछ लाख विदेशी निकले तो उन्हें कहाँ और कब तक रखा जाएगा?

ये सवाल ज़रूरी है, पर इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं है। और यह सबसे बड़ा सवाल है। 

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