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फ़ोटो साभार: ट्विटर/हिमंत बिस्व सरमा

हिमंत बन तो गये हैं भावी मुख्यमंत्री, क्या चला पाएँगे असम?

हिमंत के सामने तुरंत कोई बड़ी चुनौती नहीं दिख रही, लेकिन असम चुनौतियों से भरा प्रदेश रहा है। सीएए और एनआरसी अपने आप में बड़ा मसला है ही। बीजेपी की उनसे अपेक्षा होगी कि वे इसे सख़्ती से लागू करें और अधिकाधिक मुसलमानों की नागरिकता साबित न होने दें ताकि उनके आधार पर देश भर में ध्रुवीकरण की राजनीति को गरमाया जा सके। 
मुकेश कुमार

आख़िर हिमंत बिस्व सरमा का असम का मुख्यमंत्री बनना सुनिश्चित हो गया है। चुनाव अभियान शुरू होने के समय से ही इसके साफ़ संकेत मिल रहे थे कि बीजेपी अगर दोबारा सत्ता में लौटी तो हिमंत बिस्व सरमा ही मुख्यमंत्री बनेंगे। चुनाव रणनीति बनाने और टिकटों के बँटवारे से लेकर प्रचार अभियान तक हर जगह सुपर मामा यानी हिमंत की छाप देखी जा रही थी।

हिमंत ने चुनाव के दौरान एक वीडियो जारी किया था जिसके बोल थे- आहिसे आहिसे, हिमंत आहिसे.....आखारे बातोरि लोई (आता है आता है हिमंत आता है, आशा का संदेश लाता है)। इसमें न सोनोवाल थे न कोई और। स्पष्ट है कि हिमंत अगर इस तरह का दावा कर रहे थे तो इसलिए कि उन्हें ऊपर से कोई भरोसा दिया गया था।

वास्तव में ऐसा लग रहा था कि बीजेपी हाईकमान ने हिमंत को चुनाव जिताने का ठेका दे रखा है और बदले में उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी दी जाएगी। हिमंत ने वह कर दिखाया और अब उन्हें असम की बागडोर सौंप दी गई है। इस बात को सभी ने नोटिस किया कि सोनोवाल को मुख्यमंत्री होने के बावजूद प्रोजेक्ट नहीं किया गया, जबकि उनकी छवि बहुत ख़राब नहीं थी। सोनोवाल ने भी अपने होंठ सी लिए थे, ज़ाहिर है कि उन्हें ऐसा करने के लिए कहा गया होगा। 

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असम का मुख्यमंत्री बनने के साथ ही हिमंत की वह हसरत भी पूरी हो गई है जिसके लिए उन्होंने कांग्रेस को तोड़ा था और उस पार्टी से जा मिले थे जिसे वे कभी अपनी सबसे बड़ी शत्रु मानते थे। दल बदल के पीछे और भी वज़हें रही होंगी मसलन, कई बड़े घोटालों में फँसा होना, मगर मुख्यमंत्री बनने की चाहत सबसे बड़ा फैक्टर था, ये सब जानते हैं। बल्कि कहा तो यहाँ तक जाता है कि वे इतने सत्ताकांक्षी हैं कि बिना सत्ता के वैसे ही नहीं रह सकते जैसे बिन पानी के मछली। उनकी हर गतिविधि सत्ता-केंद्रित होती है और इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं।

बीजेपी का नेतृत्व यह भली-भाँति जानता है कि अगर असम में बीजेपी सत्ता में आई थी तो हिमंत के कारण और दोबारा आई है तो उसकी भी वज़ह वही हैं। अगर 2016 में हिमंत बिस्व सरमा ने कांग्रेस को छोड़ा और तोड़ा न होता तो बीजेपी सत्ता विरोधी लहर होने के बावजूद न जीतती। हिमंत न केवल बीजेपी में शामिल हुए बल्कि विभीषण की तरह उन्होंने कांग्रेस की हार की पटकथा भी लिखी। बीजेपी की जीत का सेहरा उनके सिर पर ही गया, ये और बात है कि सर्बानंद सोनोवाल को भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया गया और फिर उन्हें सरकार का नेतृत्व भी सौंपा गया। 

हिमंत ने पूरे पाँच साल धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। इस दौरान वे सुपर मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हो गए। सोनोवाल सरकार ने जो भी अच्छे काम किए, वे उन्हीं के खाते में गए। धनशक्ति, संपर्कों और अपने न्यूज़ चैनलों के बूते वे अपनी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा करते रहे। उनके बढ़ते प्रभाव के सामने सोनोवाल लल्लू दिखलाई देने लगे। 

हिमंत ने दल ही नहीं बदला, अपने विचार भी बदल लिए। बीजेपी में आने के पहले कभी वे मुसलिम विरोधी और सांप्रदायिक नज़र नहीं आए, बल्कि उनके बीजेपी और मोदी के प्रति उनके तेवर तीखे होते थे।

सन् 2014 में जब मोदी ने असम को गुजरात बनाने का वादा किया था तो हिमंत ने उसके जवाब में बहुत ही तीखी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि हमें गुजरात की हक़ीक़त मालूम है, वहाँ पाइपों में मुसलमानों का ख़ून बहता है।

ये ऐसी टिप्पणी थी जिसे मोदी जैसे प्रतिशोधी नेता कभी नहीं भुलाते अगर उन्हें हिमंत से कोई बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद नहीं होती। बहरहाल, भाजपाई बनते ही हिमंत ने खुद को भगवा रंग में रंग लिया। मुसलिम आबादी उनके निशाने पर आ गई। मदरसों से उनकी नफ़रत सार्वजनिक होने लगी। वे असम में मुग़ल राज और औरंगज़ेब के शासन की बातें करके हौआ खड़ा करने लगे। हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश में वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने ऐलान कर दिया था कि उन्हें मियाओं के वोट नहीं चाहिए।

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यही नहीं, उन्होंने असम गण परिषद को विभाजित करके उसे पालतू बना लिया। बोडोलैंड में बीपीएफ़ को दरकिनार करके यूपीपीएल जैसी आज्ञाकारी पार्टी को साथ लिया और कामयाब रहे। सोनोवाल को न शासन आता था न राजनीतिक तिकड़में। हिमंत ने इसीलिए उन्हें बहुत पीछे छोड़ दिया। वे पूरे पूर्वोत्तर भारत में बीजेपी के संकटमोचक और रणनीतिकार बन गए। मणिपुर, मेघालय, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में उन्हीं के छल-छद्मों से बीजेपी की सरकारें बनीं या उसकी ताक़त बढ़ी। 

हिमंत ने हाल में दावा किया था कि असम जातीय परिषद और राइजोर दल को भी उन्होंने ही खड़ा किया था ताकि सीएए के ख़िलाफ़ ऊपरी असम में जो ग़ुस्सा है उसका फ़ायदा कांग्रेस को न मिले। राइजोर दल को लेकर उनकी कही बात में दम नहीं लगता लेकिन एजेपी आसू से निकली पार्टी है और वह पूरी तरह से असम गण परिषद तथा बीजेपी की योजना के तहत उसने काम किया होगा, यह लगभग सभी मानते हैं। एजेपी के कारण ऊपरी असम की 14 सीटें कांग्रेस के हाथ से फिसल गईं और यही सीटें चुनावी जीत में निर्णायक साबित हुई हैं।

फिर ये भी सब जानते हैं कि हिमंत के लोग लगभग सभी पार्टियों में हैं। कांग्रेस में उनको मानने वालों की कमी नहीं है, इसीलिए चुनाव प्रचार के दौरान उनका विरोध बहुत नहीं दिखा।

अगर इन्हीं कांग्रेसियों ने हिमंत के कहने पर एजेपी तथा राइजोर दल से गठजोड़ न होने दिया हो तो हैरत नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा बदरुद्दीन अजमल तो बीच चुनाव में कह चुके हैं कि उन्हें आश्चर्य नहीं होगा यदि उनकी पार्टी के कुछ उम्मीदवार हिमंत के हों।

बीजेपी के इतिहास में शायद ये पहला मौक़ा होगा जब उसकी सरकार का नेतृत्व एक पूर्व कांग्रेसी करेगा। कांग्रेस और दूसरी पार्टियों से बहुत सारे नेता पार्टी में शामिल हुए हैं, मगर उन्हें किसी सरकार की कमान नहीं सौंपी गई है। वह तो संघ-बीजेपी से निकले किसी नेता को ही मिलती रही है। 

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हालाँकि सोनोवाल भी बीजेपी वाले नहीं थे, वे भी असम गण परिषद से आए थे, लेकिन अगप को वैचारिक स्तर पर बीजेपी की बहन के तौर पर ही देखा जाता रहा है। 

दूसरे, हिमंत अब सरकार को स्थिर बनाने और असम गण परिषद पर निर्भरता कम करने के लिए एक और अभियान तोड़-फोड़ का चलाएंगे। उनके निशाने पर सबसे पहले कांग्रेस होगी। दूसरे वे असम गण परिषद को भी पूरी तरह ख़त्म करने से परहेज नहीं करेंगे।

यह ध्यान में रखना ज़रूरी होगा कि लंबे अरसे बाद निचले असम का कोई नेता मुख्यमंत्री बना है। पिछले लगभग चालीस वर्षों से असम का नेतृत्व ऊपरी असम करता रहा है। अब उसके हाथ से कमान छिनने की तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। ध्यान रहे कि सोनोवाल भी ऊपरी असम के थे और बीजेपी ने अधिकांश सीटें ऊपरी असम से ही जीती हैं।

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सोशल मीडिया पर कुछ दिलचस्प प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। ऊपरी असम में सोनोवाल पर ये कहते हुए हमले हो रहे हैं कि तुम्हें हमने जातीय नायक बनाया था, मगर सीएए के सवाल पर तुमने हमें धोखा दिया और अब बीजेपी ने तुम्हें बेदखल कर दिया है।

हालाँकि बीजेपी सोनोवाल को केंद्र में मंत्रिपद देकर उनकी प्रतिष्ठा कायम रखने और ऊपरी असम के ग़ुस्सा को शांत करने का उपाय ज़रूर करेगी, मगर राज्य का नेतृत्व एक दूसरी चीज़ है। ये बताना ज़रूरी है कि ऊपरी असम खुद को निचले असम से श्रेष्ठ मानता है और उसे ये क़तई रास नहीं आएगा। 

हिमंत के सामने तुरंत कोई बड़ी चुनौती नहीं दिख रही, लेकिन असम चुनौतियों से भरा प्रदेश रहा है। सीएए और एनआरसी अपने आप में बड़ा मसला है ही।

बीजेपी की उनसे अपेक्षा होगी कि वे इसे सख़्ती से लागू करें और अधिकाधिक मुसलमानों की नागरिकता साबित न होने दें ताकि उनके आधार पर देश भर में ध्रुवीकरण की राजनीति को गरमाया जा सके। अगर वे बीजेपी के इस खेल को खेलने में ज़रा भी चुके तो मुश्किल में फँस सकते हैं।

वैसे ये बात सब लोग मानते हैं कि हिमंत तिकड़मी ही नहीं हैं, बल्कि उनके पास प्रशासनिक क्षमता भी है। तरुण गोगोई के नेतृत्व में उनकी अच्छी ट्रेनिंग हुई और उसी समय वे एक काबिल मंत्री के रूप में सामने आए थे। अगर उन्होंने अपने इस कौशल का असम के सभी वर्गों के हित में इस्तेमाल किया तो राज्य के लोगों का भला हो सकता है।

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