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हिंदुत्व की लड़ाई में मुसलमान बना राजनीतिक अछूत

6 दिसंबर 1992 की तारीख़ भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव की तारीख़ है। इसी दिन अयोध्या में विवादित ढाँचे/बाबरी मसजिद को ढहाया गया था। आप इस मुद्दे पर जिस भी पाले में खड़े हों, लेकिन इससे इनकार नहीं कर सकते कि इस तारीख़ ने भारत की राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ दिया। अब यह दिशा देश के लिए अच्छी है या बुरी, इस पर बहस अब तक जारी है। यह राजनीति ही है जिसने अयोध्या मुद्दे का कोई सौहार्दपूर्ण हल नहीं निकलने दिया। मंदिर-मसजिद के मुद्दे से यह मसला साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का बन गया। 26 साल बाद एक बार यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है या कहना ज़्यादा सही होगा कि इसे फिर से विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास हो रहा है।

6 दिसम्बर की घटना के राजनीति आयाम को समझने के लिए बाबर या मीर बाक़ी तक जाने की ज़रूरत नहीं है। इसके लिए 1949 में भी जाने की ज़रूरत नहीं है जब मसजिद के मुख्य गुम्बद में मूर्तियाँ रखी गई थीं (पढ़ें - अयोध्या में कैसे 'प्रकट' हुए थे रामलला)। राजनीति की कहानी 1988 में हिमाचल प्रदेश के पालनपुर में हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से शुरू हुई। इसी बैठक में बीजेपी ने पहली बार तय किया कि वह राजनीतिक दल के तौर पर विश्व हिंदू परिषद के राम मंदिर आंदोलन का समर्थन करेगी। वह विहिप के आंदोलन में किस तरह और कितनी शिरकत करेगी, यह उस समय तय नहीं था। पर साल 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कीं तो बीजेपी के सामने राजनीतिक अस्तित्व बचाने की चुनौती आ गई। इसके जवाब में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा शुरू हुई।1990 में शुरू हुई रथयात्रा तो अयोध्या नहीं पहुँची लेकिन 1992 की 6 दिसम्बर को बाबरी मसजिद ढाँचा ढह गया। उसके बाद का इतिहास सबको पता है।

अलग-थलग पड़ गई थी बीजेपी

उसके बाद से देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति में जनसंघ/बीजेपी के साथ खड़े होने वाले दलों ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया। राजनीति कांग्रेस और ग़ैर-कांग्रेसवाद से धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता की राजनीति में बँट गई। बीजेपी अलग-थलग पड़ गई। इसके बावजूद बीजेपी ने राजनीति में धर्म के इस्तेमाल की नीति में बदलाव नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि 1991, 1996, 1998 और 1999 में लोकसभा में उसके सांसदों की संख्या बढ़ती रही। सांसदों की बढ़ती संख्या के साथ ही राम मंदिर के मुद्दे पर लोगों की उससे अपेक्षा भी बढ़ती रही।केंद्र में सत्ता में आने के बाद बीजेपी को समझ में आया कि विपक्षी दल के रूप में उसने जो मुद्दा उठाया, उसे सत्तारूढ़ दल के रूप में लागू करना आसान काम नहीं है। उसे सत्ता तब मिली जब उसने अपने मुख्य मुद्दे राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता को अलग रख दिया। बीजेपी को सत्ता तो मिली पर राम मंदिर मुद्दे पर मंदिर समर्थकों के बीच उसकी विश्वसनीयता ख़त्म हो गई। जातिगत आधार उसके पास था नहीं और साम्प्रदायिक मुद्दा उसके हाथ से निकल गया।

कांग्रेस भी गठबंधन मोड में

6 दिसम्बर की घटना ने केवल बीजेपी के राजनीतिक नज़रिए में ही परिवर्तन नहीं किया बल्कि देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस में भी बेचैनी महसूस की जाने लगी क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियाँ अपने जातीय आधार और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर सत्तारूढ़ होती रहीं। लेकिन साल 2004 में पहली बार गठबंधन की राजनीति में उतरी कांग्रेस को सत्ता हासिल हो गई और वह बेचैनी ख़त्म हो गई। दस साल के यूपीए शासन में कांग्रेस पहले से ज़्यादा मज़बूती से धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर लौट आई। देश की राजनीति में एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता की राजनीति राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन गई।पर इसी दौर में बीजेपी ने एक मुहिम चलाई कि कांग्रेस हिंदूविरोधी और मुसलिमपरस्त हो गई है। यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के साथ ही बीजेपी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इसे भी मुद्दा बनाया। नरेन्द्र मोदी के रूप में उसे एक ऐसा राष्ट्रीय नेता मिला, गुजरात दंगे से जिसकी हिंदू हृदय सम्राट की छवि बन चुकी थी। सो 30 साल बाद किसी पार्टी को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला।

कांग्रेस की हिंदूविरोधी छवि का प्रचार

लोकसभा चुनाव की हार और बीजेपी के 10 सालों के प्रचार अभियान का असर ऐसा हुआ कि कांग्रेस ख़ुद ही मानने लगी कि उसकी छवि हिंदूविरोधी और मुसलिमपरस्त हो गई है। लोकसभा चुनाव के बाद बनी ए.के. ऐंटनी कमिटी की रिपोर्ट ने इस धारणा को पुष्ट कर दिया। पार्टी हीनग्रंथि का शिकार हो गई। अब कांग्रेस का आगे का रास्ता क्या हो, यह तय करने में कांग्रेस को 3.5 साल लगे। गुजरात चुनाव के समय पार्टी अध्यक्ष बने राहुल गाँधी और उनके सलाहकारों ने तय किया, वे भाजपा को हिंदुत्व की राजनीति से जवाब देंगे। यह कांग्रेस की सबसे बड़ी हार थी। कांग्रेस के इस फ़ैसले से चुनाव में हार-जीत का मसला गौण हो गया। 1991 में जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी आर्थिक नीति को छोड़ कर पूँजीवादी आर्थिक नीति अपनाने के बाद कांग्रेस ने 2017 में नेहरू की धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को भी तिलांजलि दे दी। उसके बाद शुरू हुआ मंदिर दर्शन, जनेऊ और गोत्र का विमर्श। इस रास्ते पर चलने का फ़ैसला करके कांग्रेस ने बीजेपी की उस राजनीति को वैधता दे दी जिसकी देश के सारे धर्मनिरपेक्ष लोगों ने निंदा की थी।

कांग्रेस ने भी हिंदुत्व को अपनाया

अब समस्या बड़ी विकट हो गई है। देश की दो सबसे बड़ी पार्टियाँ एक ही तरह की राजनीति में एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रही हैं। धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का ज़िम्मा उन क्षेत्रीय दलों पर आ गया है जिनकी धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता इस बात से तय होती है कि सत्ता किधर है। तो 6 दिसम्बर की घटना ने कांग्रेस से धर्मनिरपेक्षता का चोला उतरवा दिया। बीजेपी के अंदर एक वर्ग जो साम्प्रदायिकता की राजनीति से थोड़ा असहज महसूस करता था उसे और हाशिए पर धकेल दिया। कांग्रेस में आए इस राजनीतिक बदलाव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक को छुआछूत से मुक्त कर दिया। 

कांग्रेस अपनी राजनीति के लिए कोई भी दिशा अपनाने के लिए स्वतंत्र है। पर इस देश के मुसलमान को समझ में नहीं आ रहा है कि वह किसकी तरफ़ देखे। 2014 के लोकसभा और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में बहुसंख्यवाद की राजनीति के सहारे बीजेपी ने मुसलिम वोट का न केवल वीटो खत्म कर दिया बल्कि चुनाव नतीजे की दृष्टि से उसे अप्रासंगिक भी बना दिया। ऐसे में जब कांग्रेस भी उसी रास्ते पर चल पड़ी है तो मुसलमान कहाँ जाएँ? क्या वे अब भी बीजेपीविरोधी दलों को वोट देने के लिए अभिशप्त रहेंगे? और रहेंगे तो कब तक? 6 दिसम्बर की घटना ने बीजेपी को राजनीतिक अछूत बनाया था। 26 साल बाद देश का मुसलमान राजनीतिक अछूत बन गया है। मुसलमानों का यह दर्द राज्यसभा में विपक्ष के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद के बयान से फूटा कि उनकी पार्टी के हिंदू नेता उन्हें चुनावी सभाओं में बोलने के लिए नहीं बुलाते।

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