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अयोध्या गोलीकांड, फ़्रंटलाइन की रिपोर्ट - जब मुर्दे वापस लौटे

रिपब्लिक भारत न्यूज़ चैनल ने 1990 में अयोध्या में हुए गोलीकांड पर तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन कर एक बिलकुल झूठी ख़बर से सिर्फ़ सनसनी फ़ैलाने की कोशिश है। हम आपको गोलीकांड के बाद फ़्रंटलाइन पत्रिका में 24 मई, 1991 को छपी रिपोर्ट के जरिये बता रहे हैं कि चैनल का स्टिंग ऑपरेशन आख़िर क्यों झूठा है। अर्नब गोस्वामी ने 28 साल पहले खारिज किए जा चुके झूठ को डिजिटल तकनीक पर नए सिरे से पुनर्जीवित करके रिपब्लिक भारत चैनल को जमाने का प्रयास किया है और ऐसा करना बेहद शर्मनाक है। ऐसा तब किया गया है कि जब इस झूठ की धज्जियाँ उड़ाने के सारे तथ्य मौजूद हैं। 

चंद्रशेखर ने बताया था, 15 लोग मरे

27 दिसंबर, 1990 को संसद में चंद्रशेखर सरकार ने अयोध्या के गोलीकांड पर बयान दिया था। सरकार ने कहा था कि मीडिया के एक हिस्से और कुछ ग़ैर- ज़िम्मेदार राजनीतिक और अपने को धार्मिक कहने वाले संगठनों ने इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में हुई मौतों के बारे में जो बेसिर-पैर की संख्याओं को मृतक बताकर दुष्प्रचार किया है, वह आपराधिक है, अक्षम्य है। उन्होंने 15 मृतकों की सूची पटल पर रखी और चुनौती दी कि सैकड़ों और हज़ारों की संख्या गिनाने वाले अपनी सूची जारी करें। 

वीएचपी ने कहा, 59 लोग ‘शहीद’ हुए 

क़रीब 2 महीने बाद 20 फ़रवरी, 1991 को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने दिल्ली में अपनी पहली सूची जारी की, जिसमें अयोध्या गोलीकांड में ‘शहीद’ हुए लोगों की संख्या 59 बताई गई। उनके नाम के आगे, उनके गाँव, कस्बे का भी जिक़्र था। वीएचपी के प्रेसनोट में इस संख्या का विवरण इस प्रकार दिया गया कि 30 अक्टूबर, 1990 और 2 नवंबर, 1990 को हुई पुलिस फ़ायरिंग के दौरान अयोध्या में 36 लोग मारे गए। 23 अन्य लोग देशव्यापी आंदोलन के दौरान अयोध्या के अलावा अन्य जगहों पर ‘शहीद’ हुए और 23 लोग ग़ायब हैं, जिनके बारे में सूचना इकट्ठी की जा रही है। वीएचपी की सूची में ग़ायब लोगों का नाम नहीं था।

झूठे दावे, कहाँ है सूची?

इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में वीएचपी ने दावा किया कि उनका संगठन ग़ायब लोगों के बारे में और अन्य मृतकों के बारे में दूसरी सूची जल्द ही प्रकाशित करेगा। लेकिन उन्होंने आज तक ऐसा नहीं किया। ग़ौरतलब है कि 1990 में गोलीकांड के हफ़्ते भर के भीतर 10 नवंबर को अयोध्या में वीएचपी ने कहा था कि उसके कार्यकर्ताओं ने स्वयं अयोध्या गोलीकांड में मारे गए 78 कारसेवकों की अंतिम रस्म अदा की है। 

भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई ने उसी दौरान प्रेस को दिए बयान में कहा था कि उनके पास 168 लोगों के मारे जाने की सूचना है। ये दोनों सूची कभी किसी फ़ोरम पर आज तक सामने नहीं आईं। 
उस जमाने के हिंदी अखबारों ने भी सैकड़ों और कुछ ने हज़ारों लोगों के गोली से मारे जाने के चीखते बैनर लगाए थे। उनमें से भी किसी ने कभी अपनी ख़बरों की पुष्टि के लिए कोई सूची कहीं जारी नहीं की।

बीजेपी को हुआ राजनीतिक फ़ायदा

1991 में जब चंद्रशेखर की सरकार से राजीव गाँधी ने समर्थन वापस ले लिया और आम चुनाव हुए तो बीजेपी ने बहुत शानदार प्रदर्शन किया और उसे 120 सीटें मिलीं, जो उसे तब तक किसी आम चुनाव में नहीं मिली थीं। यहाँ तक कि जब वह वी. पी. सिंह के जनता दल के साथ मिलकर लड़ी थी तब भी उसे 85 सीटें ही मिली थीं। 

मंदिर मुद्दा सिर्फ़ वोट बटोरने की मशीन

‘सत्य हिंदी’ पहले ही पर्दाफ़ाश कर चुका है कि राम मंदिर संघ परिवार के लिए चुनावों में वोट बटोरने की मशीन है। उसकी आस्था या आस्थावानों में दिलचस्पी इतनी भर है कि इसके नाम पर धर्मभीरू जनता बीजेपी के मत प्रतिशत में चुनाव दर चुनाव इजाफ़ा करती रहे। 

तकलीफ़देह यह है कि अपने को मीडिया कहने वाले कुछ लोग उनके लिए इस मुद्दे पर बिसातें बिछायें, झूठ गढ़ें और झूठ को बार-बार सच साबित करें।

अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिका फ़्रंटलाइन ने 24 मई, 1991 के अंक में वीएचपी की सूची की सच्चाईयों की छानबीन करती हुई एक कालजयी रिपोर्ट छापी थी। इस रिपोर्ट का शीर्षक था - ‘When the ‘dead’ came back, जब मुर्दे वापस लौटे’। संयोग ही था कि यह स्टोरी मैंने ही तब फ़्रंटलाइन के वरिष्ठ संवाददाता वेंकिटेश रामाकृष्णन के साथ मिलकर की थी। नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर पढ़ें फ़्रंटलाइन की ख़बर - 

जीवित मिले मृतक बताए गए लोग

अब सीधे तथ्यों से ही बात को शुरू करते हैं। 20 फ़रवरी, 1991 को अयोध्या गोलीकांड के मृतकों की जो सूची वीएचपी ने जारी की थी उसमें 11 नाम वही थे जो सरकारी सूची में भी थे। 23 लोगों को उत्तर प्रदेश के विभिन्न पतों का निवासी दिखाया गया था और 12 अन्य राज्यों से बताए गए थे। सूची जारी होने के बाद, अन्य राज्यों से बताए गए 12 लोगों में से 4 लोग विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में जीवित मिल गए। 

5 अन्य ऐसे थे, जिनका कारसेवा से कोई सीधा रिश्ता नहीं मिला और उनकी मौत गोली लगने से नहीं हुई थी। एक का नाम, पता तलाश करने पर मिला ही नहीं। इनमें से 2 लोग ज़रूर ऐसे थे जो कारसेवा के दौरान घायल तो हुए थे पर घर लौट गए थे और कई हफ़्तों बात उनकी मृत्यु हुई।

वीएचपी की ओर से जारी की गई सूची का पहला पेज

मथुरा से थे 3 ‘शहीदों’ के नाम

हम लोगों ने उत्तर प्रदेश, जहाँ से 23 लोगों के ‘शहीद’ होने का जिक़्र था और नाम-पते दिए गए थे उनकी पड़ताल की। उत्तर प्रदेश में सूची के पहले 3 नाम मथुरा से थे। किसी एक ज़िले से मृतकों की यह सबसे बड़ी संख्या थी। इसमें पहले मृतक के तौर पर दर्ज़ थे मथुरा के ‘राल’ नामक गाँव के 64 वर्षीय ठाकुर लाल सिंह। दूसरे थे वृंदावन के साधु आशुतोष दास और तीसरे थे गड़ाया गाँव के बाबा राघव दास। 

जब ‘शहीद’ अपने घर लौटे

ठाकुर लाल सिंह हमको अपने घर पर वहीं मिले जहाँ दिसंबर, 1990 में उनकी समाधि बनाने का प्रस्ताव एक बड़ी सभा में किया गया था। इस सभा को बीजेपी के स्थानीय विधायक रविकांत गर्ग ने संबोधित किया था। जीवन भर अविवाहित रहे ठाकुर लाल सिंह धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे (हमें जानकारी नहीं कि अब वह जीवित हैं या नहीं) और ज़्यादातर धार्मिक यात्राओं पर निकल जाया करते थे और महीनों बाद घर लौटते थे। 

बीजेपी, वीएचपी और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनकी समाधि के लिए चंदा जुटाने की रसीदें जारी कर दी थीं और 2 बोरे गेहूँ चंदा करके उनके छोटे भाई के परिवार को मदद के तौर पर पहुँचाया भी था। लेकिन जनवरी, 1991 में ठाकुर लाल सिंह महाराष्ट्र-गुजरात की अपनी धार्मिक यात्रा से वापस गाँव लौट आए। 

ठाकुर लाल सिंह के आते ही हड़कंप मच गया क्योंकि गाँव तो संघ परिवार के नेतृत्व में उनकी समाधि बनाने की पूरी तैयारी कर चुका था। ठाकुर लाल सिंह ने ख़ुद हमें बताया, ‘उन्हें जिंदगी में इतना बुरा कभी नहीं लगा, यह अधर्म है, धर्म नहीं।’

ठाकुर लाल सिंह की शोकसभा में शामिल उसी गाँव के निवासी कमल ने हमें बताया कि उन्हें शक तो हो रहा था, पर जब वीएचपी वालों ने जोर देकर कहा कि उन्हें पक्की जानकारी है और उनके कार्यकर्ताओं ने ही अयोध्या में उनकी अंतिम क्रिया की है तो उनकी बात मानने के अलावा कोई और चारा नहीं था। 

बाबा आशुतोष कभी गए ही नहीं अयोध्या

जन्म से बंगाली और धार्मिक चित्र बनाने के शौकीन वीएचपी की उत्तर प्रदेश सूची के दूसरे ‘शहीद’ बाबा आशुतोष दास कभी अयोध्या गए ही नहीं थे। वह वृंदावन में शंभु चरण पाठक के सेवा कुंड में रुका करते थे। हमारे तलाशने पर हमें राधा श्याम सुंदर मंदिर के एक छोटे से अंधेरे कमरे में सांस लेते, बोलते, चलते-फिरते जीवित मिले। 

‘भूत’ कहकर चिढ़ाते थे लोग 

बाबा आशुतोष दास इस बात से नाराज़ थे कि संघियों के चलते वृंदावन के शरारती बच्चे और लोग उन्हें ‘भूत’ पुकारकर चिढ़ाया करते थे। क्योंकि वीएचपी की ओर से जारी सूची मथुरा-वृंदावन के अख़बारों में भी छपी थी, जिसमें उनका ‘शहीदों’ में भी नाम था। उन्होंने बताया कि उनके वृद्ध माता-पिता कलकत्ते में रहते हैं, वह उनका हाल-चाल लेने उनके पास गए थे और वहाँ काफ़ी दिन रुक गए। इस बीच वीएचपी वालों ने उन्हें ‘शहीद’ बना दिया। 

वीएचपी ने दिया ग़लत पता

वीएचपी की सूची के तीसरे ‘शहीद’ बाबा राघव दास भी एक घुमंतू साधु थे। हम उनके बारे में दिए गए पते मथुरा के गड़ाया गाँव में गए। पता चला कि यह एक ग़लत पता था। उनका इस गाँव से इतना ही रिश्ता था कि वह गाँव के एक मंदिर में कभी-कभी आ जाया करते थे और एकाध दिन रुक लिया करते थे। यहाँ हमें मंदिर के पुरोहित दीनानाथ तिवारी मिले। पुराेहित ने बताया कि होली पर राघव दास यहाँ आए थे और वह बिलकुल ठीक-ठाक थे। उन्होंने बताया कि यह अफ़वाह है कि उनकी मृत्यु अयोध्या में हुए गोलीकांड में हो चुकी है। 

पड़ताल के दौरान मिली सूचनाएँ सिर चकरा देने वाली थीं। इसके बाद हमें रायबरेली में रामदेव यादव भी जीवित मिले जिनका नाम वीएचपी की अयोध्या की ‘शहीदों’ वाली सूची में था। रामदेव के लिए यह समझना मुश्किल था कि कैसे वे जीते जी ‘शहीद’ बना दिए गए।

यहाँ भी पकड़ा गया झूठ

फ़ैज़ाबाद के निवासी रहे माँगीलाल सत्यनारायण को भी सूची में ‘शहीद’ बताया गया था। जब हम उनके घर पहुँचे तो वहाँ उनकी वृद्ध पत्नी रश्मि देवी मिलीं। उन्होंने बताया, ‘उनके पति की मृत्यु 1974 में ही बीमारी से हो गई थी। हाँ, उनके लड़के महावीर प्रसाद की मृत्यु ज़रूर अयोध्या गोलीकांड में हुई।’

वीएचपी की सूची में महावीर प्रसाद का भी नाम था पर उसमें उसको गोंडा ज़िले का निवासी बताया गया था। इस बाबत पूछने पर पता चला कि महावीर प्रसाद की दो पत्नियाँ हैं। जिनमें से एक गोंडा में रहती है और एक फ़ैज़ाबाद में। अयोध्या गोलीकांड में मारे गए लोगों को राज्य सरकार ने एक-एक लाख रुपये का मुआवज़ा दिया था। उसकी दोनों पत्नियाँ इस मुआवज़े पर हक़ के लिए आपस में लड़ रही थीं। जिस पर कई बार पंचायत भी बैठी थी। 

स्वामी चिन्मयानंद बोले, कोई जानकारी नहीं

रघुवीर शर्मा का नाम भी वीएचपी की ‘शहीदों’ की सूची में था जिन्हें शाहजहाँपुर का निवासी बताया गया था। शाहजहाँपुर से वीएचपी के बड़े नेता और कई बार बीजेपी के टिकट पर सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद से हमने उसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, ‘हमारे शाहजहाँपुर से अयोध्या गोलीकांड में किसी कारसेवक के मारे जाने की मुझे कोई जानकारी नहीं है।’ इस सूचना पर चौंककर हम जब सूची में दिए गए पते पर पहुँचे तो वह स्थानीय बीजेपी दफ़्तर का पता निकला। दफ़्तर और आस-पड़ोस का कोई व्यक्ति किसी रघुवीर शर्मा का जानकार तक नहीं मिला। 

झूठी निकली वीएचपी की सूची 

हम सारी सूची की पड़ताल तो कर नहीं सकते थे और न ही इसकी ज़रूरत थी। क्योंकि जितनी सूचनाएँ हम जुटा सके उनसे यह साबित हो गया था कि वीएचपी के कार्यकारी अध्यक्ष विष्णु हरि डालमिया और उसके संयुक्त महासचिव आचार्य गिरिराज किशोर ने बड़े शोर-शराबे से दिल्ली में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके अयोध्या गोलीकांड के ‘शहीदों’ की जो सूची जारी की है, उसकी बुनियाद नितांत झूठी है। 

वीएचपी की सूची में ज़्यादातर ऐसे लोगों के नाम थे जो घूमंतू और साधु प्रवृत्ति के धार्मिक लोग थे और जो तमाम जगहों पर तीर्थाटन के लिए यात्राएँ करते रहते हैं। वीएचपी को भरोसा रहा होगा कि कोई पत्रकार इनकी तलाश का जोख़िम नहीं उठाएगा।

चुप क्यों बैठे रहे परिजन

फ़्रंटलाइन की इस रिपोर्ट का खंडन आज तक न तो कभी विश्व हिंदू परिषद ने किया और न ही संघ परिवार के किसी और संगठन ने। बार-बार दावा करते रहने के बावजूद संघ परिवार के लोग मृतकों की कोई प्रामाणिक सूची पिछले 28 सालों में जारी नहीं कर पाए। यदि अयोध्या में 1990 में बड़ी संख्या में कारसेवक मारे गए थे, तो उनके परिवार अब तक चुप क्यों बैठे रहे जबकि इन 28 सालों में ऐसे कई मौक़े आए जब प्रदेश में और केंद्र में बीजेपी की सरकारें आती-जाती रहीं। 

शीतल पी. सिंह
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