पटना की बांकीपुर सीट पर उपचुनाव के लिए मतदान पूरा हो गया। क्या प्रशांत किशोर बीजेपी के इस पुराने किले को भेद पाएंगे? पढ़िए, पटना से समी अहम का विश्लेषण, क्या है चुनावी समीकरण और हार-जीत के मायने।
प्रशांत किशोर या पीके का अपना चुनावी पेपर तो हो गया लेकिन बिहार में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का अपना पुराना गढ़ भारतीय जनता पार्टी उपचुनाव के बाद बचा पाएगी या नहीं। इस सीट पर मतदान का प्रतिशत अक्सर कम ही रहता है लेकिन गुरुवार को उपचुनाव के लिए वोटिंग का प्रतिशत और नीचे आ गया जो भारतीय जनता पार्टी के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
शाम 5:00 तक 33.5% वोटिंग ही हो पाई थी। वोटिंग की रफ्तार शुरू से ही कम थी और दोपहर एक बजे तक केवल 20% लोगों ने अपना मतदान किया था। तीसरे पहर 3:00 तक भी 27.90 प्रतिशत वोटिंग हो पाई थी। चुनाव परिणाम 3 अगस्त को आना है।
बांकीपुर बीजेपी का गढ़
इस सीट पर पिछले तीन दशक से भारतीय जनता पार्टी की ओर से नवीन किशोर सिन्हा और नितिन नवीन की पिता-पुत्र की जोड़ी का कब्जा रहा है। पिछली बार राजद की रेखा गुप्ता मुख्य प्रतिद्वंद्वी थीं लेकिन इस बार प्रशांत किशोर ने चुनावी मैदान में उतर कर सारा समीकरण बदल दिया है। राजद ने एक बार फिर रेखा गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया जो वैश्य समुदाय से आती हैं। एक ओर जहां यह समझा जाता है कि बीजेपी को परंपरागत रूप से ऊंची जातियों के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समर्थक जातियों का वोट मिलता है तो वैश्य समुदाय का वोट उम्मीदवार यानी रेखा गुप्ता और पार्टी यानी बीजेपी के बीच बंटता है। जेन जी से बीजेपी चिंतित?
आज हुए मतदान के बारे में जमीनी स्तर से यह पता चला है कि प्रशांत किशोर ने राजद के परंपरागत वोट बैंक यानी ‘एम-वाई’ समूह में काफी हद तक सेंधमारी करने में कामयाबी हासिल की है लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि वह सिर्फ इस वोट की बुनियाद पर चुनाव नहीं जीत सकते। इधर बीजेपी के खेमे में इस बात को लेकर चिंता देखी गई कि जेन जी माने जाने वाले वोटरों का रुझान उनकी तरफ कितना रहेगा।
दूसरी तरफ प्रशांत किशोर के समर्थकों का कहना है कि उन्हें इस बार भारतीय जनता पार्टी के परंपरागत सवर्ण समुदाय की जातियों से भी वोट मिले हैं। प्रशांत किशोर के बारे में बहुत से मतदाताओं की यह राय थी कि उन्हें तो अच्छे वोट मिलेंगे लेकिन चुनाव परिणाम के बारे में स्पष्ट रूप से कहने से वह भी कतराते रहे। बहुत से लोगों ने यह भी कहा कि चुनाव परिणाम बहुत हद तक चुनाव आयोग के रवैये पर भी निर्भर करता है।
प्रशांत किशोर के समर्थकों का कहना है कि दोपहर से पहले तक तो उनकी पार्टी को भरपूर वोट मिला लेकिन दोपहर के बाद उनके मतदाताओं को वोट देने से तरह-तरह से रोका गया। इस बारे में चुनाव आयोग की ओर से अब तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है।
पटना की इस बेहद प्रतिष्ठित सीट पर उपचुनाव नीट पेपर लीक को लेकर छात्रों के आंदोलन के तुरंत बाद हुआ है। पटना में छात्र-नौजवानों का आंदोलन इसी विधानसभा क्षेत्र के बड़े हिस्से में हुआ है जिसका प्रभाव चुनाव परिणाम में भी देखने को मिल सकता है। इसके साथ भोजपुर में हुए एनकाउंटर में भरत तिवारी की मौत को लेकर काफी विवाद हुआ है और सवर्ण समुदाय इस मामले में भारतीय जनता पार्टी से खिन्न बताया जा रहा है। हालाँकि इस सीट पर कायस्थ समुदाय का वोट बीजेपी के लिए अटूट रहता है लेकिन इस उपचुनाव में सबसे बड़ा अंतर प्रशांत किशोर को माना जा रहा है जिन्होंने पिछले साल के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के शून्य पर आउट होने के बाद खुद उम्मीदवार बनने का फ़ैसला किया।
प्रशांत किशोर की तैयारी कैसी?
प्रशांत किशोर के बारे में यह बताया गया कि नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद इस सीट के लिए होने वाले उपचुनाव के मद्देनजर अपनी तैयारी बहुत पहले से शुरू कर दी थी और वोटिंग के ठीक पहले वाली रात भी वह थाने में लड़ते-भिड़ते दिखे। प्रशांत किशोर की शिकायत थी कि जक्कनपुर थाना में उनके कार्यकर्ताओं को पकड़ कर लाया गया और फिर वहां से कहां भेजा गया इसकी कोई जानकारी वहां के थानाध्यक्ष नहीं दे रहे थे। इस मामले में थानेदार और प्रशांत किशोर के बीच काफी देर तक बहस होती रही। बाद में बिहार पुलिस ने स्पष्टीकरण जारी कर बताया कि उन लोगों को हिरासत में लिया गया था जो इस विधानसभा क्षेत्र के मतदाता नहीं होने के बावजूद इधर सक्रिय थे।इस उपचुनाव में अगर भारतीय जनता पार्टी हारती है तो न केवल उसका गढ़ ढह जाएगा बल्कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के राजनीतिक नेतृत्व पर भी सवाल खड़े होंगे क्योंकि यह पद संभालने के बाद उनके लिए पहला चुनाव है। यही बात पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पर भी लागू होती है क्योंकि बीजेपी ने उन्हें जब यह कमान दी है तो उनसे यह भी उम्मीद कर रही होगी कि वह यहां से जीत दिलवाएंगे।
दूसरी ओर अगर प्रशांत किशोर को इस सीट से जीत नहीं मिलती तो यह उनके राजनीतिक जीवन का व्यक्तिगत तौर पर सबसे बड़ा धक्का होगा क्योंकि इससे पहले उनकी जन सुराज पार्टी न केवल सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव हार चुकी थी बल्कि वह अपने उस दावे के लिए भी सवालों के घेरे में थे जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर नीतीश कुमार की पार्टी को 25 से अधिक सीट आई तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे।