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बिहार चुनाव: क्या क़ानून-व्यवस्था चुनाव में मुद्दा बनेगी?

बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख़ घोषित कर दी गई है। पंद्रह साल से नीतीश कुमार सत्ता में हैं। इन वर्षों में बिहार को क्या नीतीश कुमार स्वर्ग बना पाये? अगर पहले पाँच सालों को छोड़ दें तो नीतीश के सरकार का हिसाब निराशाजनक है। बिहार आज भी बहुत पिछड़ा है तो उसके लिये ज़िम्मेदार कौन है? नीतीश या लालू? नीतीश सरकार की क़ानून-व्यवस्था का आकलन।
समी अहमद

27 जनवरी 2005 को भागलपुर की एक चुनावी सभा में स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक दर्द भरा सवाल किया थाः कहाँ है मेरा किसलय। कोई हमारा किसलय लौटा दे।

किसलय उस समय 14 साल का था और पटना के पटेल नगर से स्कूल बस पकड़ने के लिए जाते समय उसका अपहरण हो गया था। तब पटना के एसएसपी नैयर हसनैन ख़ान को नियमित रूप से राष्ट्रपति भवन को रिपोर्ट भेजनी पड़ी थी कि किसलय को छुड़ाने के लिए क्या किया जा रहा है। इस बयान के दस दिन के बाद किसलय समस्तीपुर से मुक्त करा लिया गया और हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार किसलय आईआईटी खड़गपुर तक पहुँचे।

उस समय से बिहार में अब तक लगभग नब्बे हज़ार अपहरण हुए हैं। बहुत से छूटे, छुड़ाये गये और बहुतों की जान चली गयी। लेकिन यह सवाल कभी उस तरह से नहीं उठा कि ‘कहाँ है मेरा किसलय’।

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सन 2005 में नीतीश कुमार ने जब भारतीय जनता पार्टी के साथ जनता दल यूनाइटेड की सरकार बनायी तो सुशासन का बड़ा शोर था। क़ानून-व्यवस्था उनकी यूएसपी मानी गयी थी। इस यूएसपी की परख अख़बार के अंदर के पन्नों पर होती है जहाँ हर दिन अपराध की ख़बरें भरी रहती हैं, पहले ये पहले पन्ने पर होती थीं।

बिहार के पूर्व डीजीपी अभयनान्द ने सत्यहिन्दी से बातचीत में कहा कि लाॅ एंड ऑर्डर आँकड़ों से अधिक परसेप्शन की चीज होती है। आप आम आदमी से पूछ लें, उसकी जो राय है, उसी से क़ानून-व्यवस्था का अंदाज़ा लगा लें। उनका मानना है कि नीतीश कुमार की सरकार ने 2005 से 2010 तक जैसा काम किया उसे उसके आगे जारी नहीं रख सकी।

एक अन्य पुलिस अफ़सर के अनुसार शुरुआती वर्षों में पुलिस की मुस्तैदी के साथ-साथ जिस चीज ने काम किया वह था स्पीडी ट्रायल मगर यह सिलसिला कायम नहीं रह सका।

चूँकि बिहार में सरकारी तौर पर अपराध के रिकाॅर्ड इस साल जून के बाद से अपडेट नहीं है, इसलिए इस आलेख में 2019 के आँकड़े लिये गये हैं। 

सन 2005 में बिहार में सरकारी रिकाॅर्ड के अनुसार संज्ञेय अपराध की संख्या लगभग एक लाख पाँच हज़ार थी। 2019 में यह संख्या लगभग दो लाख 69 हज़ार थी।
एक पुलिस अधिकारी ने इसके दो संभावित कारण गिनाये। पहला तो यह कि आबादी बढ़ने के अनुपात में अपराध बढ़े और दूसरी बात यह है कि अपराध दर्ज करने की दर बढ़ी है।

'एक ही उद्योग फल फूल रहा है- अपहरण उद्योग'

हत्या के मामले में पंद्रह साल में बढ़ी आबादी को ध्यान में रखा जाए तो स्थिति कुछ बेहतर लगती है। 2005 में हत्याओं की संख्या 3423 थी, 2019 में यह संख्या 3138 थी। लालू-राबड़ी राज में अपहरण के क़िस्से इतने आम थे कि उसे याद कर अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस वक़्त मज़ाक़ में विपक्षी नेता कहते थे कि बिहार में एक ही उद्योग फल फूल रहा है- अपहरण उद्योग। मगर बिहार के सरकारी आँकड़ों के हिसाब से हालात बहुत बेहतर नहीं हैं। 2005 में अपहरण की संख्या 2226 थी। 2019 में यह संख्या 10925 थी। अलबत्ता फिरौती के लिए अपहरण में काफ़ी कमी दर्ज की गयी है। 2005 में यह संख्या 251 थी जो पिछले साल 43 दर्ज की गयी है।

हनीमून किडनैपिंग?

बिहार पुलिस ने कुछ साल पहले अपहरण के मामलों को एक अलग अंदाज़ में पेश करना शुरू किया। इस वर्गीकरण में हत्या के लिए अपहरण, शादी के लिए अपहरण, प्रेम प्रसंग में फरार और विविध मामलों में अपहरण को शामिल किया गया है। इसी सिलसिले में पुलिस ने 'हनीमून किडनैपिंग' का शोशा भी छोड़ा था। अपहरण का ऐसा रोमांटिक वर्णन बिहार पुलिस की सृजनशीलता का दर्शाता है। 

बिहार में अपराध के बारे में चर्चा के दौरान सरकार अक्सर यह कहती है कि जो घटनाएँ हो रही हैं, वह संगठित अपराध नहीं है।

पूर्व डीजीपी अभयानंद कहते हैं कि 2005 तक अपराध का भय बहुत था। अब अपराध का तौर-तरीक़ा बदला है। पहले अपहरण होता था, अब सीधे मर्डर होता है।

बिहार में ऐसी कई हत्याएँ हुई हैं जिनकी चर्चा कुछ ही दिन तक रही। मुज़फ़्फ़रपुर के पूर्व मेयर समीर कुमार को जिस तरह गोलियों से भून दिया गया था, यह परसेप्शन की ही बात है कि वह चर्चा का केन्द्र नहीं है। इसी तरह पटना में एक बिल्डर की कोतवाली थाने के सामने दोपहर में हत्या कर दी गयी मगर इसकी चर्चा भी बहुत दिनों तक नहीं रही।

सरकारी आँकड़े के हिसाब से बिहार में सड़क लूटपाट की संख्या काफ़ी बढ़ी है, हालाँकि इसकी चर्चा कम होती है। 2005 में यह संख्या 1310 थी लेकिन पिछले साल रोड राॅबरी की संख्या 2046 दर्ज की गयी।

इसी तरह 2005 में बिहार में रेप के 973 मामले दर्ज थे जबकि 2019 में यह संख्या 1450 थी।

देखिए वीडियो- सियासत के चतुर खिलाड़ी हैं नीतीश कुमार?

सामाजिक कार्यकर्ता रूपेश कुमार कहते हैं कि लाॅ एंड ऑर्डर देखना है तो नीतीश कुमार को नीतीश कुमार की कसौटी पर देखना चाहिए। नीतीश कुमार ने शुरुआती पाँच साल में जो बेहतर प्रदर्शन किया, उसे वह न सिर्फ़ कायम नहीं रख सके बल्कि उसके नीचे ही ले गये। उनका कहना है कि लालू से पहले नीतीश कुमार के शासन में शराब की दुकानें भूंजा दुकान की तरह खुली थीं। लालू के राजद के साथ सरकार बनाने पर नीतीश कुमार ने शराबबंदी की मगर राजद के हटते ही शराब की खेप बिहार में आसानी से पहुँचने लगी है।

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एक सीनियर पुलिस अधिकारी कहते हैं कि बिहार में अब व्हाइट काॅलर क्राइम है। ढाई दशक से क्राइम की ख़बरों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर कहते हैं कि अपराधियों के लिए 2005 से ‘रोज़गार‘ का तरीक़ा बदल गया। अब वे कमाने के लिए ठेकों में हिस्सा लेते हैं और आप उसे रंगदारी कहने से बचना चाहें तो यह आपकी पसंद है।

इसी तरह ज़मीन पर क़ब्ज़ा भी अपराधियों के ‘रोज़गार‘ का नया तरीक़ा बना है। उनका कहना है कि हाल के सालों में ज़मीनों की मिल्कियत कितनी तेज़ी से बदली है, यह पता लगाने की बात है। पहले प्राॅपर्टी डीलर की इतनी हत्या नहीं होती थी, अब इसमें इज़ाफा हुआ है। 

प्रेक्षकों का कहना है कि 2010 का चुनाव नीतीश कुमार ने लाॅ एंड ऑर्डर में अपने परफाॅर्मेंस के आधार पर जीता था, प्राॅमिस पर नहीं। परंतु 2020 में एक बार फिर वे प्राॅमिस यानी वादे पर चुनाव लड़ना चाहते हैं और इसके लिए वह एक बार फिर 2005 और लालू-राबड़ी राज की याद दिलाना चाहते हैं।

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