एक रिसर्च थिंक-टैंक की स्टडी ने सुझाव दिया है कि बिहार में शराबबंदी ख़त्म होनी चाहिए। इसमें रेवेन्यू का भारी नुकसान बताया गया है और कहा गया है कि यह रोक महिलाओं के खिलाफ अपराध कम करने जैसे अपने लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही है।
सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार
एक शोध में बिहार में शराबबंदी को हटाने की सिफारिश से एक नई बहस शुरू हो गई है। देश के प्रमुख आर्थिक शोध संस्थानों में शामिल नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च यानी NCAER की एक स्टडी में राज्य में शराब की पूरी तरह बिक्री पर लगी रोक हटाकर इसे नियंत्रित तरीके से बेचने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में शराबबंदी से होने वाले बड़े राजस्व नुकसान और इसके अपने मक़सद में विफल रहने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इस रिपोर्ट के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी के नेतृत्व वाली सम्राट चौधरी सरकार शराबबंदी को ख़त्म करने का क़दम उठाएगी और क्या नीतीश कुमार का जेडीयू ऐसा होने देगा?
हालाँकि, ताज़ा शोध की इस सिफारिश के सामने आने के बाद बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर शराबबंदी खत्म करने को लेकर फिलहाल कोई सहमति दिखाई नहीं दे रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने साफ़ कर दिया है कि शराबबंदी की समीक्षा या इसे ख़त्म करने का सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर शराबबंदी से राज्य को राजस्व का नुक़सान हो रहा है तो क्या बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार इस नीति को बदलने का जोखिम उठाएगी? इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले यह जान लीजिए कि शोध में क्या कहा गया है।
NCAER की स्टडी में क्या कहा गया?
NCAER की यह स्टडी बिहार में पूर्ण शराबबंदी के करीब 10 साल पूरे होने के दौरान तैयार की गई। इसके निष्कर्ष पिछले सप्ताह इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश किए गए। 'बिहार की विकास उपलब्धियों का बड़ा परिप्रेक्ष्य: अधूरा एजेंडा और आगे की राह' नाम की इस स्टडी को अर्थशास्त्रियों की एक टीम ने तैयार किया है, जिसकी अगुवाई रत्ना सहाय ने की।
स्टडी में बिहार सरकार को शराब की पूरी तरह बिक्री पर लगी रोक ख़त्म करने और उसकी जगह शराब की बिक्री को नियंत्रित करने की नीति अपनाने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि शराबबंदी के बाद राज्य में अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है। इसके साथ ही दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में भी बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, क़ानूनी शराब की बिक्री बंद होने के बाद शराब की तस्करी, अवैध बिक्री और दूसरे नशीले पदार्थों की खपत बढ़ी है।
हर साल राजस्व का 14-15 फ़ीसदी नुक़सान?
स्टडी में दावा किया गया है कि शराबबंदी के कारण बिहार को हर साल अपने राजस्व का क़रीब 14 से 15 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ रहा है। इसके अनुसार अगर शराब पर दोबारा एक्साइज ड्यूटी लगाकर नियंत्रित बिक्री शुरू की जाए तो सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। शोध में कहा गया है कि राजस्व के इस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोजगार जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। स्टडी का एक अहम सुझाव यह भी है कि शराब की अवैध बिक्री पर निगरानी और कार्रवाई में लगने वाले सरकारी संसाधनों को कम किया जा सकता है।
शराबबंदी महिलाओं पर अपराध कम करने में फेल?
बिहार में शराबबंदी लागू करने के पीछे कई उद्देश्य बताए गए थे। इनमें महिलाओं और परिवारों पर शराब के नकारात्मक प्रभाव को कम करना और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में कमी लाना भी शामिल था। लेकिन NCAER की स्टडी का कहना है कि करीब एक दशक बाद भी शराबबंदी इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल नहीं हुई है।
यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने पूर्ण प्रतिबंध की जगह शराब की बिक्री को नियंत्रित और विनियमित करने की नीति अपनाने की सिफारिश की है। हालांकि, गौर करने वाली बात यह भी है कि स्टडी का निष्कर्ष शराबबंदी के सभी सामाजिक प्रभावों पर अंतिम फ़ैसला नहीं है। यह मुख्य रूप से आर्थिक और नीतिगत नज़रिए से इस व्यवस्था का मूल्यांकन करती है।
JDU ने शराबबंदी पर क्या कहा?
NCAER की सिफारिश के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू शराबबंदी हटाने के पक्ष में नहीं है। जेडीयू के वरिष्ठ नेता और एमएलसी नीरज कुमार ने मंगलवार को न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से कहा कि शराबबंदी की समीक्षा का कोई सवाल ही नहीं है। उन्होंने कहा कि यह क़ानून नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते लागू किया गया था और इसका ग्रामीण महिलाओं के जीवन पर बड़ा असर पड़ा है।नीरज कुमार ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिहार में लागू शराबबंदी की सराहना की थी। यानी फिलहाल जेडीयू का रुख पूरी तरह साफ़ है कि शराबबंदी जारी रहेगी और इसे ख़त्म करने पर विचार नहीं किया जा रहा है। जदयू का आधिकारिक रुख शराबबंदी के पक्ष में है, लेकिन पार्टी के कम से कम एक नेता शराबबंदी हटाने के पक्ष में दिखे। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार सीतामढ़ी से पार्टी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने समीक्षा की मांग की। उन्होंने कहा, 'शराबबंदी कहीं भी सफल नहीं हुई।'
जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल की बात क्यों की?
हालाँकि, शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था को लेकर एनडीए के भीतर अलग-अलग राय सामने आती रही है। केंद्रीय मंत्री और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने हाल में शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन में मौजूद खामियों की ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने कहा था कि कानून में मौजूद कमियों के कारण स्थिति बिगड़ रही है और बिहार को शराबबंदी के मामले में गुजरात मॉडल अपनाने पर विचार करना चाहिए।
मांझी का तर्क शराबबंदी पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसके क्रियान्वयन को ज्यादा प्रभावी बनाने पर केंद्रित है। एनडीए में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी शराबबंदी को पूरी तरह खत्म करने का समर्थन नहीं किया है। उनका कहना है कि बिहार सरकार को राजस्व बढ़ाने के रास्ते जरूर तलाशने चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि शराबबंदी को खत्म कर दिया जाए।इससे साफ है कि एनडीए के भीतर शराबबंदी को लेकर एकराय नहीं है, लेकिन प्रमुख सहयोगी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने फिलहाल इसे पूरी तरह ख़त्म करने का समर्थन नहीं किया है।
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अगर NCAER की रिपोर्ट के आधार पर बिहार में शराबबंदी ख़त्म करने या इसमें बड़ा बदलाव करने का फ़ैसला लिया जाता है तो बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती भी होगी। शराबबंदी को नीतीश कुमार की प्रमुख राजनीतिक नीतियों में गिना जाता है। इसे खास तौर पर ग्रामीण महिलाओं के समर्थन से जोड़कर देखा जाता रहा है।
ऐसे में शराबबंदी ख़त्म करने का फ़ैसला सरकार के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हो सकता है। दूसरी ओर, अगर शराबबंदी जारी रहती है तो सरकार को अवैध शराब के कारोबार, तस्करी और संभावित राजस्व नुक़सान जैसे सवालों का जवाब देना होगा।
विपक्ष को भी मिला सरकार को घेरने का मौक़ा
NCAER की स्टडी ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक नया मुद्दा दे दिया है। राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता ने कहा कि अध्ययन राज्य सरकार की 'पूरी विफलता' को दिखाता है। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, 'राज्य में सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर शराबबंदी लागू की थी। हम अभी भी शराबबंदी के पक्ष में हैं। अध्ययन साफ बताता है कि सरकार पूरी तरह फेल हो गई है। सिर्फ हर साल राजस्व का नुकसान ही नहीं हो रहा, बल्कि अवैध शराब का पूरा काला बाजार भी बन गया है। ऐसी रिपोर्ट्स से लगता है कि राज्य सरकार धीरे-धीरे शराबबंदी को आंशिक या पूरी तरह हटा सकती है।'
अब विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि अगर शराबबंदी को इतने लंबे समय तक लागू करने के बावजूद अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है और सरकार को राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा है, तो क्या मौजूदा नीति की समीक्षा नहीं होनी चाहिए? वहीं, शराबबंदी समर्थक पक्ष का तर्क है कि सिर्फ राजस्व के आधार पर शराबबंदी को खत्म नहीं किया जा सकता। महिलाओं, परिवारों और समाज पर इसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा।
शराबबंदी खत्म होने की संभावना कितनी?
मौजूदा राजनीतिक संकेतों से बिहार में तत्काल शराबबंदी खत्म होने की संभावना कम दिखाई देती है। एक तरफ NCAER की स्टडी पूर्ण प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित बिक्री की सिफारिश कर रही है तो दूसरी तरफ जेडीयू ने साफ़ तौर से इसका विरोध किया है। चिराग पासवान भी सीधे तौर पर शराबबंदी हटाने के पक्ष में नहीं हैं, जबकि जीतन राम मांझी कानून को खत्म करने के बजाय गुजरात मॉडल जैसी सख्त व्यवस्था की बात कर रहे हैं।
इसलिए फिलहाल बहस का केंद्र 'शराबबंदी खत्म हो या नहीं' से ज्यादा इस सवाल पर दिखाई देता है कि अगर शराबबंदी जारी रहती है तो उसे ज्यादा प्रभावी कैसे बनाया जाए और अवैध शराब के कारोबार पर कैसे रोक लगाई जाए। बिहार सरकार के सामने आने वाले समय में दोहरी चुनौती होगी। एक तरफ शराबबंदी से जुड़े सामाजिक और राजनीतिक वादों को बनाए रखना और दूसरी तरफ राजस्व, अवैध कारोबार तथा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े सवालों का जवाब देना।