बिहार में निर्दलीय जीते दोनों विधायक।
बिहार विधान परिषद के चुनाव का रिजल्ट आए अभी चार दिन भी नहीं बीते थे कि निर्दलीय जीत हासिल करने वाले दो सदस्यों को बीजेपी में शामिल करा लिया गया। हालाँकि, दिलचस्प बात यह है कि बाद की ख़बरों में सदस्यता ग्रहण करने की बात को खारिज कर दिया गया और दावा किया गया कि उन्होंने समर्थन दिया है। ध्यान रहे कि अभी दोनों नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ भी नहीं दिलाई गई है।
इस तरह स्पष्ट रूप से दल बदल कानून के तहत बिहार विधान परिषद की सदस्यता रद्द किए जाने का मामला बनता था लेकिन इसे समर्थन का रूप देकर भारतीय जनता पार्टी ने यह कोशिश जरूर की है कि कोई कार्रवाई न हो। विधान परिषद के मामले में तो सभापति को फैसला लेना है लेकिन हर्ष फायरिंग के मामले में हाईकोर्ट से सजा बरकरार रखने के एक महीने बाद भी भारतीय जनता पार्टी के विधानसभा सदस्य राजू सिंह पर विधानसभा अध्यक्ष ने कोई कार्रवाई नहीं की है और उनकी सदस्यता बनी हुई है।
MLC बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज
विधान परिषद के लिए चुने गए ये दो सदस्य हैं- बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज। बंशीधर ने तिरहुत स्नातक सीट से जबकि राहुल राज ने सारण शिक्षक सीट से जीत हासिल की। दोनों निर्दलीय चुनाव जीते लेकिन शनिवार की शाम यह खबर आई कि दोनों को बीजेपी के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवाई।
विवाद बढ़ा तो समर्थन देने का दावा कर दिया
सुबह होते-होते यह खबर आई कि दरअसल दोनों ने भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया है। बयान में यह चालाकी भरा बदलाव इसलिए लाया गया क्योंकि कानूनी रूप से निर्दलीय जीते उम्मीदवार किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ले सकते। लेकिन सवाल यह है कि जब एक बार औपचारिक रूप से इन दोनों ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली तो क्या अब इस सफाई के बाद उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी या उनकी सदस्यता बरकरार रह सकती है? यह सफाई भी अभी खबरों के माध्यम से आई है और इसका कोई स्रोत नहीं बताया गया है।
शनिवार के कार्यक्रम में इन दोनों निर्दलीय विजेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी। इस सदस्यता ग्रहण का वीडियो सबने देखा और बाद में राहुल राज से जब यह पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि हां उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली है। ध्यान रहे कि राहुल राज पहले भारतीय जनता पार्टी के ही सदस्य थे लेकिन विधान परिषद की शिक्षक सीट के लिए पार्टी का समर्थन न मिलने पर वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े थे।
इन दोनों निर्दलीय सदस्यों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद कई हलकों से यह सवाल उठाया जाने लगा कि जब निर्दलीय सदस्य किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ले सकते तो इन दोनों को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता कैसे दिलाई गई और अब तत्काल उनकी सदस्यता रद्द होनी चाहिए।
तेजस्वी यादव का हमला
बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर इस मामले को जोरदार ढंग से उठाया। तेजस्वी ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “इस प्रकार स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने का उनका कृत्य भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में वर्णित दल-बदल विरोधी कानून के स्पष्ट प्रावधानों के अंतर्गत आता है।”
तेजस्वी ने लिखा कि इस संदर्भ में संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के प्रावधान के अनुसार, यदि कोई सदस्य किसी राजनीतिक दल द्वारा उम्मीदवार घोषित किए बिना अर्थात स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होता है और निर्वाचन के पश्चात किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाएगा।
तेजस्वी ने लिखा कि दसवीं अनुसूची के पैरा 6 (1) के प्रावधान के अंतर्गत दल-बदल के आधार पर सदस्य की अयोग्यता से संबंधित प्रश्न पर निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदन के सभापति को प्राप्त है। इस समय बिहार विधान परिषद के कार्यकारी सभापति जदयू के रामवचन राय हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इस पर क्या कार्रवाई करते हैं। उन्होंने दावा किया कि उपरोक्त तथ्यों एवं संवैधानिक प्रावधानों के आलोक में श्री बंशीधर ब्रजवासी एवं डॉ. राहुल राज को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के पश्चात भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के कारण संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के अंतर्गत अयोग्य घोषित होना तय है। तेजस्वी ने मांग की कि संविधान के अनुसार दोनों सदस्यों के विरुद्ध दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता संबंधी कार्यवाही बिना अनावश्यक विलंब के तत्काल प्रभाव से पूरी की जाए।
साहेबगंज विधायक राजू सिंह पर भी आपत्ति
तेजस्वी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने संविधान का मजाक बना दिया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी-आरएसएस संविधान और लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि बीजेपी के विधायक को कोर्ट से सजा होती तो स्पीकर उसकी सदस्यता रद्द नहीं करते हैं। तेजस्वी के ऐसा कहने का कारण यह है कि मुजफ्फरपुर जिले की साहेबगंज सीट से विधायक राजू सिंह को हर्ष फायरिंग के मामले में निचली अदालत ने दोषी करार देते हुए सजा दी थी जिसे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा और इस तरह उनकी सदस्यता कब की चली जानी चाहिए थी।तेजस्वी ने लिखा, “जब विपक्षी दलों के विधायकों को जानवरों की तरह बोली लगाकर अपने पाले में बैठाते हैं तब भी अनेक बार लिखित में देने पर भी उनकी सदस्यता रद्द नहीं करते हैं और अब निर्दलीय को बीजेपी में शामिल करने पर वही लोग मनमर्जी से कानून को हांक रहे हैं।”
तेजस्वी दरअसल उस घटना की ओर इशारा कर रहे हैं जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़ने का फ़ैसला कर एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाने का फैसला किया था। उस समय राजद और कांग्रेस के पांच विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हुए पाला बदल लिया था और वह नीतीश कुमार के पक्ष में एनडीए के साथ हो गए थे। उसके लगभग सवा साल तक विधानसभा अध्यक्ष ने दल बदल कानून के तहत उन पर कार्रवाई नहीं की और नए चुनाव का वक्त आ गया। इस तरह साफ तौर पर दल बदल कानून का उल्लंघन करने वाले सदस्यों की सदस्यता विधानसभा अध्यक्ष की मनमर्जी से बनी रही।
याद रखने की बात यह है कि जब भाकपा माले के अगियांव विधायक मनोज मंजिल को स्थानीय अदालत से सजा हुई थी तो उस समय के विधानसभा अध्यक्ष ने तत्काल उनकी सदस्यता रद्द कर दी और चुनाव आयोग ने जल्द ही वहां चुनाव की तारीख की घोषणा की और चुनाव करवा भी लिए गए। इस तरह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि जब विपक्षी सदस्यों की सदस्यता रद्द करने का मामला होता है तो विधानसभा अध्यक्ष तत्काल कार्रवाई करते हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी के मामले में वह बिल्कुल निष्क्रिय हो जाते हैं और दोषी करार दिए गए विधानसभा सदस्यों को बेमियादी छूट देते हैं।