बिहार एमएलसी चुनाव के नतीजों ने जेडीयू और बीजेपी के बीच तनाव पैदा कर दिया है। निर्दलीय विजेता बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज, उनके बीजेपी कनेक्शन और गठबंधन में विश्वासघात के आरोपों ने एनडीए की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार
बिहार विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीट के लिए हुए चुनाव के रिजल्ट के बाद जनता दल यूनाइटेड को भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन का कड़वा प्याला पीना पड़ रहा है। इसकी वजह खासतौर पर वह दो निर्दलीय उम्मीदवार हैं जिन्होंने जीत हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का ऐलान किया लेकिन विधान परिषद की सदस्यता जाने के खतरे के मद्देनजर फिर इसे केवल समर्थन बताया।
मामला यहां तक पहुंच गया कि जदयू समर्थित जो दो उम्मीदवार अपनी हार के बाद इस मुद्दे पर सोमवार को प्रेस कांफ्रेंस करने वाले थे उन्हें इससे रोकने के लिए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस बारे में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू समर्थित प्रत्याशी और जदयू के प्रवक्ता अभिषेक झा ने कहा कि वह मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा का फोन आने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस स्थगित कर रहे हैं। अभिषेक झा जदयू समर्थित एक और पराजित उम्मीदवार आनंद पुष्कर के साथ प्रेस को संबोधित करने वाले थे। वह अब 5 नवंबर को जदयू की समीक्षा बैठक में अपनी बात रखने के बाद मीडिया से बात करेंगे।
विधान परिषद के लिए तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय बंशीधर बृजवासी और सारण शिक्षक क्षेत्र से ‘भाजपा से निष्कासित’ निर्दलीय लड़े राहुल राज ने जीत हासिल की थी। आमतौर पर यह माना गया कि दरअसल यह दोनों उम्मीदवार जदयू के उम्मीदवार को हराकर आए हैं और उन्हें पार्टी में शामिल कर कर या बाद में इसे समर्थन बात कर भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन धर्म नहीं निभाया। यही शिकायत जनता दल यूनाइटेड के कई वरिष्ठ नेता कर रहे हैं।
जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने भाजपा के इस रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस नेता को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित किया गया था उसे चुनाव जीतने के तुरंत बाद फिर से पार्टी में क्यों शामिल कराया गया? इसी तरह जदयू के वरिष्ठ नेता श्याम रजक और दूसरे कई नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी के इस रवैए पर सवाल खड़े किए। इससे यह समझा जा सकता है कि कैसे नीतीश कुमार की पार्टी को भारतीय जनता पार्टी से आए जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा के नेतृत्व में एनडीए के प्रमुख घटक दल भारतीय जनता पार्टी से चुपचाप भितरघात सहना पड़ा है।
इस मामले में तिरहुत स्नातक क्षेत्र से दूसरे स्थान पर रहने वाले जदयू समर्थित उम्मीदवार अभिषेक झा ने मुखर तौर पर विरोध जताया था। यहां से जीत हासिल करने वाले बंशीधर ब्रजवासी को 28390 वोट मिले जबकि अभिषेक झा को 22685 वोट मिले। अभिषेक झा ने अपनी हार के बाद सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट लिखकर बिना नाम लिखे यह जता दिया कि कैसे उन्हें बीजेपी का समर्थन नहीं मिला जिसकी वजह से उनकी हार हुई।
अभिषेक ने खुद की तुलना अभिमन्यु से करते हुए लिखा कि क्या वह “अपने ही राजनीतिक परिवार एनडीए के भीतर रचे गए चक्रव्यूह में अकेले” पड़ गए थे? इसके अलावा अभिषेक झा ने यह दावा भी किया कि उन्हें मिले चार हजार सात सौ वोट इसलिए रद्द कर दिए गए कि उनके नाम के आगे सही का निशान लगा हुआ था। लेकिन अभिषेक का कहना है कि क्या यह सामान्य घटना है कि जो नागरिक जागरूक मतदाता हैं वह उनके नाम के आगे टिक लगाएंगे। उनका इशारा यह है कि दरअसल यह प्रशासनिक तौर पर धांधली का मसला है।
इसी तरह बिहार विधान परिषद के सारण शिक्षक क्षेत्र में एनडीए समर्थित जदयू प्रत्याशी आनंद पुष्कर को दूसरी वरीयता के 3150 मतों के साथ दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। दूसरी वरीयता में 4965 वोट लेकर राहुल राज ने जीत हासिल की। राहुल राज भारतीय जनता पार्टी में प्रदेश स्तर के पदाधिकारी थे लेकिन पार्टी से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था।
इस क्षेत्र से राहुल राज ने जब निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की तो भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन जब राहुल राज जीत गए तो भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया और यही बात जनता दल यूनाइटेड को कांटे की तरह चुभ रही है। जदयू के बहुत से नेता और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक दरअसल इसमें भारतीय जनता पार्टी की साजिश देख रहे हैं क्योंकि यह आरोप लग रहा है कि दरअसल उस सीट पर भाजपा का अपना घोषित उम्मीदवार तो नहीं था लेकिन उसने ‘पार्टी से निष्कासित’ राहुल राज की मदद की।
आनंद पुष्कर 2023 के उपचुनाव में सीपीआई समर्थित प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे लेकिन इस बार उन्हें जनता दल यूनाइटेड ने अपना समर्थन दिया था। ध्यान रहे कि आनंद पुष्कर मशहूर दिवंगत वामपंथी नेता केदारनाथ पांडे के पुत्र हैं। पुष्कर के बयान से ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने उनकी वामपंथी पृष्ठभूमि को बहाना बनाकर उन्हें समर्थन नहीं दिया जबकि उनका कहना है कि उनके पिता को पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दिवंगत भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी का भरपूर सहयोग मिला था।
पुष्कर पहले भी हारे थे और इस बार भी उनकी हार हुई लेकिन इस बार की हार के बाद एनडीए गठबंधन को लेकर उनकी कड़वाहट भी सामने आई। दरअसल इस सीट पर तो चुनाव की शुरुआत में ही गठबंधन धर्म पर सवाल उठे थे क्योंकि तब उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से संबंध रखने वाले रामपुकार सिन्हा ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी जिन्हें उनकी पार्टी के तीन विधायकों ने समर्थन दिया था। हालांकि बाद में राम पुकार सिन्हा ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी।
आनंद पुष्कर ने चुनाव परिणाम आने के बाद यह सवाल पूछा कि क्या गठबंधन धर्म का पालन केवल जदयू करेगा? उन्होंने अपनी हार के बाद राहुल राज को बीजेपी में शामिल कराए जाने पर भी सवाल खड़े किए और इस बारे में उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट पर अपना दर्द बयान किया।
आनंद पुष्कर ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा कि पूरे चुनावी घटनाक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं की भूमिका और उनके द्वारा गठबंधन धर्म के पालन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उनका कहना है कि जो बातें अब तक पर्दे के पीछे थीं वह अब धीरे-धीरे सामने आ रही हैं। उन्होंने छपरा के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी की भूमिका पर भी सवाल उठाया और कहा कि जब उन्हें खुद वोट लेने की जरूरत होती है तो वह नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में हुए विकास कार्यों को रखकर जनता से समर्थन मांगते हैं। उन्होंने सवालिया यह लहजे में लिख, “जब गठबंधन के एक समर्पित कार्यकर्ता और जदयू समर्थित प्रत्याशी के साथ खड़े होने की बारी आती है तब गठबंधन धर्म की मर्यादा कहां चली जाती है?” उन्होंने इसी तरह के सवाल भाजपा के एक और सांसद राधा मोहन सिंह की भूमिका को लेकर भी उठाए हैं।
अब यह देखना है कि 5 नवंबर को जदयू की बैठक के बाद अभिषेक झा और आनंद पुष्कर का क्या रवैया रहता है और भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन धर्म का सवाल किस दिशा में जाता है।